भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८५


मनसः सर्वहेतुत्वं दर्शयति— | उसको। तथा मन ही सबका हेतु है— “मनोविजृम्भितं सर्वं | यह इस वाक्यसे दिखाते हैं— यत्किंचित्सचराचरम् । | जितना कुछ स्थावर-जंगम है वह मनसो ह्यमनीभावे | सब मनका ही विलास है। मनके द्वैतं नैवोपलभ्यते ॥” | मननशून्य होनेपर द्वैतकी उपलब्धि इति । पञ्च शब्दादयो विषया | ही नहीं होती ।” शब्दादि पाँच आवर्तस्थानीयास्तेषु विषयेषु प्रा- | विषय आवर्तरूप हैं, उन विषयोंमें णिनो निमज्जन्तीति यस्यास्तां | प्राणी डूब जाते हैं, इसलिये वे पञ्चावर्ताम् । पञ्च गर्भदुःखजन्म- | जिसके आवर्त हैं उस पाँच आवर्त- दुःखजरादुःखव्याधिदुःखमरण- | वालीको, गर्भदुःख, जन्मदुःख, जरा- दुःखान्येवौघवेगो यस्यास्तां पञ्च- | दुःख व्याधिदुःख और मरणदुःख ये दुःखौघवेगाम् । अविद्यास्मिता- | पाँच जिसके ओघवेग ( जलराशिके रागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेश- | प्रवाह ) हैं उस पाँच दुःखरूप भेदाः पञ्च पर्वाण्यस्यास्तां पञ्च- | ओघवेगवालीको; तथा अविद्या, पर्वामिति ॥ ५ ॥ | अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश | ये पाँच क्लेश ही जिसके पाँच पर्व हैं | उस पाँच पर्वोंवाली संसारनदीको | [ हम जानते हैं ] ॥ ५ ॥


जीवके संसार-बन्धन और मोक्षके कारणका निर्देश

एवं तावन्नदीरूपेण ब्रह्म- | इस प्रकार यहाँतक तो नदी- चक्ररूपेण च कार्यकारणात्मकं | रूपसे और ब्रह्मचक्ररूपसे प्रपञ्च- ब्रह्म सप्रपञ्चमिहाभिहितम् । | सहित कार्य-कारणरूप ब्रह्मका वर्णन इदानीमस्मिन्कार्यकारणात्मक- | किया गया । अब, इस कार्य- ब्रह्मचक्रे केन वा संसरति केन | कारणात्मक ब्रह्मचक्रमें किस हेतुसे | जीवको संसारकी प्राप्ति होती है और

श्वेता० ४—