भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९१ ❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧❧

[Sanskrit Text][Hindi Translation]
तुशब्दोऽवधारणे । परममेवोत्कृ-सर्वोत्कृष्ट ही है । मूलमें ‘तु’ शब्द
ष्टमेव । संसारधर्मानास्कन्दित-निश्चयार्थक है । परमेव अर्थात्
त्वात् । उद्गीतत्वेन ब्रह्मणसर्वोत्कृष्ट ही है, क्योंकि वह समस्त सांसारिक धर्मोंसे अनाक्रान्त है ।
उत्कृष्टत्वात् । “तं यथा यथो-उद्गीतरूप होनेसे ब्रह्म उत्कृष्ट है ।
पासते” इति न्यायेनोत्कृष्टब्रह्मो-“उसे जो जिस प्रकार उपासना करता है” इस न्यायसे उत्कृष्ट ब्रह्मकी
पासनादुत्कृष्टमेव फलं मोक्षाख्यंउपासना करनेसे मोक्षरूप उत्कृष्ट
भवत्येवेत्यभिप्रायः ।फल ही होता है ऐसा अभिप्राय है ।
नन्वेवं तर्हि ब्रह्मणः प्रपञ्चा-ऐसा होनेपर तो यदि ब्रह्म
(हाशिया: प्रपञ्चस्य स्वातन्त्र्यम् आशङ्क्य तन्निरसनम्*)* संस्पृष्टत्वे प्रपञ्च-प्रपञ्चसे असङ्ग है और ब्रह्मका भी
स्यापि ब्रह्मासंसर्गा-प्रपञ्चसे कोई संसर्ग नहीं है तो
त्सांख्यवाद इवसांख्यवादके समान प्रपञ्च भी पृथक् सिद्ध होनेके कारण स्वतन्त्र होनेसे
प्रपञ्चस्यापि पृथक्सिद्धत्वेन स्व-“विकार वाणीसे आरम्भ होनेवाला
तन्त्रत्वाद् “वाचारम्भणं विकारोनाममात्र है” इस वाक्यके अनुसार
नामधेयम्” (छा०उ०६।१।४) इतिप्रपञ्चकी परतन्त्रता स्वीकार कर
पारतन्त्र्याभ्युपगमेन मिथ्यात्वोप-उसका मिथ्यात्व बतलाते हुए
देशपूर्वकमद्वितीयब्रह्मात्मत्वेनोप-अद्वितीय ब्रह्मरूपसे उपदेश करना
देशोऽनुपपन्नश्चेत्याशङ्क्याह-अनुचित ही होगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—
तस्मिंस्त्रयमिति । यद्यपि ब्रह्म‘तस्मिंस्त्रयम्’ इत्यादि । यद्यपि ब्रह्म-
प्रपञ्चासंस्पृष्टं स्वतन्त्रं च तथापिका प्रपञ्चसे संसर्ग नहीं है और वह
प्रपञ्चो न स्वतन्त्रः । अपि तुस्वतन्त्र है तथापि प्रपञ्च स्वतन्त्र नहीं
तस्मिन्नेव ब्रह्मणि त्रयं प्रतिष्ठितंहै; अपि तु भोक्ता, भोग्य और प्रेरिता—
भोक्ता भोग्यं प्रेरितारमितिऐसा कहकर जिनका आगे वर्णन