भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

९२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १


[बायाँ स्तम्भ]

वक्ष्यमाणं भोग्यभोक्तृनियन्तृ- लक्षणम् । “अजा ह्येका भोक्तृ- भोग्यार्थयुक्ता” इति वक्ष्यमाणं भोक्तृ- भोग्यार्थरूपं चान्यद्वेदं श्रुतिसिद्धं विराट् सूत्राभ्यां कृतं नामरूपकर्म- विश्वतैजसप्राज्ञजाग्रत्स्वप्नसुषुप्ति- रूपस्वरूपं प्रतिष्ठितं रज्ज्वामिव सर्पः । यत एतस्मिन्सर्वं भो- क्त्रादिलक्षणं प्रपञ्चरूपं प्रति- ष्ठितम् , अत एवास्य भोक्त्रादि- त्रयात्मकस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्म सुप्र- तिष्ठा शोभनप्रतिष्ठा । ब्रह्मणो- ऽन्यस्य चलनात्मकत्वाच्चलप्रति- ष्ठान्यत्र । ब्रह्मणोऽचलत्वादत्रा- चलप्रतिष्ठा । नन्वेवं तर्हि विकारभूत- [पार्श्व-टिप्पणी: ब्रह्मणः प्रपञ्चाश्रयत्वेऽपि नित्यत्वसमर्थनम्] प्रपञ्चाश्रयत्वेन परि- णामित्वादद्ध्यादिव- दनित्यं स्यादि- त्याशङ्कयाह—अक्षरं चेति । यद्यपि विकारः प्रपञ्चाश्रय- स्तथाप्यक्षरं न क्षरतीत्यक्षरम् ।


[दायाँ स्तम्भ]

किया है वे भोक्ता, भोग्य और नियन्ता तीनों उस ब्रह्ममें ही स्थित हैं। अथवा “अजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थ- युक्ता” इस वाक्यसे कहे जानेवाले भोक्ता, भोग्य और भोग, किंवा श्रुति-प्रतिपादित विराट् और हिरण्य- गर्भद्वारा रचे हुए नाम, रूप और कर्म अथवा विश्व, तैजस, प्राज्ञ या जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति ये तीनों उसमें रज्जुमें सर्पके समान प्रतिष्ठित हैं । क्योंकि इसमें भोक्तादिरूप सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है, इसीसे ब्रह्म इस भोक्तादि त्रयरूप प्रपञ्चकी सुप्रतिष्ठा अर्थात् उत्तम आश्रयस्थान है । ब्रह्मसे भिन्न और सब चलायमान (अस्थायी) हैं, इसलिये अन्य सब चलप्रतिष्ठा हैं; ब्रह्म अचल है, इसलिये इसमें उनकी अचल प्रतिष्ठा है। यदि ऐसा है तब तो विकारभूत प्रपञ्चका आश्रय होनेसे परिणामी होनेके कारण दधि आदिके समान ब्रह्म भी अनित्य सिद्ध होगा—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— ‘अक्षरं च ।’ यद्यपि प्रपञ्चका आश्रय होना विकार है तथापि वह अक्षर है। जो स्वरूपसे च्युत नहीं होता उसे अक्षर कहते हैं।