श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 114, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ तथा द्वन्द्वैरनेकैस्तु | स्थानमें मलिन नहीं होते उसी प्रकार जीवे च मलिनीकृते । | एक जीवके अनेकों द्वन्द्वोंसे अभिभूत एकस्मिन्नापरे जीवा | होनेपर भी अन्य जीव कहीं भी मलिनाः सन्ति कुत्रचित् ॥” | मलिन नहीं हो सकते।” तथा च शुकशिष्यो गौड- | इसी तरह शुकदेवजीके शिष्य पादाचार्यः— | श्रीगौडपादाचार्य कहते हैं—“जिस “यथैकस्मिन्घटाकाशे | प्रकार एक घटाकाशके धूलि और रजोधूमादिभिर्युते । | धूमादिसे युक्त होनेपर अन्य सब न सर्वे संप्रयुज्यन्ते | घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते, उसी तद्वज्जीवाः सुखादिभिः॥” | तरह [ एक जीवके ] सुखादिसे सब (माण्डू० का० ३। ५) इति। | जीव भी युक्त नहीं होते।” तस्मादद्वितीये परमात्मन्यु- | अतः अद्वितीय परमात्मामें उपाधि- [जीवगतदुःख-] पाधितो जीवेश्वर- | से ही जीव, ईश्वर और जीवोंके [सुखादेरीश्वरे-] योर्जीवानां च भेद- | पारस्परिक भेदकी व्यवस्था सिद्ध [ऽप्राप्तिः] व्यवस्थायाः सिद्ध- | होनेसे विशुद्ध सत्त्वमयी उपाधिवाले त्वान्न विशुद्धसत्त्वोपाधेरीश्वरस्या- | ईश्वरको अशुद्ध उपाधिवाले जीवके विशुद्धोपाधिजीवगताः सुख- | सुख, दुःख, मोह एवं ज्ञानादि प्राप्त दुःखमोहाज्ञानादयः । तथा च | नहीं हो सकते । ऐसा ही भगवान् भगवान्पराशरः— | पराशरजी कहते हैं—“समस्त “ज्ञानात्मकस्यामलसत्त्वराशे- | जीवोंके अन्तःकरणोंमें स्थित ज्ञान- रपेतदोषस्य सदा स्फुटस्य । | स्वरूप, विशुद्ध सत्त्वराशि, सर्वदोष- किं वा जगत्यस्ति समस्तपुंसा- | निर्मुक्त और नित्य प्रकाशस्वरूप मज्ञातमस्यास्ति हृदि स्थितस्य ॥” | परमात्माको संसारमें कौन वस्तु (विष्णुपु० ५। १७।३२) इति। | अज्ञात है ?” नापि जीवान्तरगतसुखदुःख- | इसके सिवा किसी बद्ध या मुक्त | जीवान्तरका किसी अन्य जीवके