श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 113, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ९९
इत्याशङ्क्य दृष्टान्तपूर्वकं व्यवस्थां | दृष्टान्तपूर्वक व्यवस्था दिखलाते हैं— दर्शयति— | “जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न “एकस्तु सूर्यो बहुधा | जलाधारोंमें अनेकरूप दिखायी देता जलाधारेषु दृश्यते । | है उसी प्रकार समस्त उपाधियोंमें आभाति परमात्मा च | स्थित परमात्मा भी अनेकवत् भासता सर्वोपाधिषु संस्थितः ॥ | है । वह परब्रह्म समस्त शरीरोंके ब्रह्म सर्वशरीरेषु | बाहर और भीतर भी स्थित है । बाह्ये चाभ्यन्तरे स्थितम् । | जिस प्रकार आकाश पञ्चभूतोंमें आकाशमिव भूतेषु | ओतप्रोत है उसी प्रकार समस्त बुद्धावात्मान चान्यथा॥ | बुद्धियोंमें एक ही आत्मा अनुस्यूत एवं सति यथा बुद्ध्या | है, और किसी प्रकार नहीं । ऐसी देहोऽहमिति मन्यते । | स्थितिमें अनात्मामें आत्मत्वकी भ्रान्ति अनात्मन्यात्मताभ्रान्त्या | हो जानेसे वैसी बुद्धिके द्वारा वह जीव सा स्यात्संसारबन्धिनी ॥ | जो ऐसा मानने लगता है कि 'मैं देह सर्वैर्विकल्पैर्हीनस्तु | हूँ' यह मति ही उसे संसारमें बाँधने- शुद्धो बुद्धोऽजरोऽमरः । | वाली है । किन्तु इन समस्त प्रशान्तो व्योमवद्व्यापी | विकल्पोंसे रहित वह शुद्ध, बुद्ध, चैतन्यात्मासकृत्प्रभः ॥ | अजर, अमर, अत्यन्त शान्त, धूमाभ्रधूलिभिर्व्योम | आकाशके समान व्यापक, चैतन्य- यथा न मलिनायते । | स्वरूप और नित्यज्योतिःस्वरूप है । प्राकृतैरपरामृष्टो | जिस प्रकार धूम, मेघ और धूलि विकारैः पुरुषस्तथा ॥ | आदिसे आकाश मलिन नहीं होता यथैकस्मिन्घटाकाशे | उसी प्रकार पुरुष प्रकृतिके विकारोंसे जलैर्धूमादिभिर्युते । | असंग है । जिस प्रकार एक घटा- नान्ये मलिनतां यान्ति | काशके जल या धूमादिसे युक्त दूरस्थाः कुत्रचित्क्वचित् ॥ | होनेपर उससे दूर रहनेवाले अन्य | सब घटाकाश कभी किसी भी