भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 126

११२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

संस्कृत (मूल एवं टीका)हिन्दी अनुवाद
उपदिष्टः । “तमेवं विद्वानमृतउपदेश किया है । तथा “उसे
इह भवति” ( नृ० पू० ता० १ ।इस प्रकार जाननेवाला यहाँ अमर हो
६) इति विदुषोऽर्चिरादिगमनंजाता है” इस वाक्यसे विद्वान्‌को
विनेहैवामृतत्वप्राप्तिं दर्शयति ।अर्चिरादिमार्गसे बिना गये यहीं
“अथाकामयमानः” इत्यारभ्य “नअमृतत्वकी प्राप्ति दिखलायी है ।
तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैवऔर “जो कामनारहित है” यहाँसे
सन्ब्रह्माप्येति” (बृ० उ० ४।४।६)लेकर “उसके प्राण उत्क्रमण नहीं
इत्यादिना विनैवोक्रान्तिं विदुषोकरते, वह ब्रह्मस्वरूप हुआ ही
मोक्ष उपदिष्टः । “उदस्मात्प्राणाःब्रह्ममें लीन हो जाता है” यहाँतक
क्रामन्त्यहो नेति नेति होवाचउत्क्रमणके बिना ही विद्वान्‌के मोक्ष-
याज्ञवल्क्यः” (बृ० उ० ३ । २ ।का उपदेश किया है । तथा “इसके
११) इति प्रश्नपूर्वकमुत्क्रान्त्य-प्राण उत्क्रमण करते हैं या नहीं ?
भावो दर्शितः ।इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं” इस
प्रकार बृहदारण्यक श्रुतिने प्रश्नपूर्वक
विद्वान्‌के उत्क्रमणका अभाव
दिखलाया है ।
तथा च ब्राह्मे पुराणे जीव-इसी प्रकार ब्राह्मपुराणमें भी
न्मुक्तिं गत्यभावं च दर्शयति—जीवन्मुक्ति और उत्क्रान्तिका अभाव
“यस्मिन्काले स्वमात्मानंये दोनों दिखलाये गये हैं--“जिस
योगी जानाति केवलम् ।समय योगी आत्माको शुद्धस्वरूप
तस्मात्कालात्समारभ्यजान लेता है उसी समयसे वह
जीवन्मुक्तो भवेदसौ ॥जीवन्मुक्त हो जाता है। जिस परार्द्ध-
मोक्षस्य नैव किञ्चित्स्या-स्थायी [ ब्रह्मलोकरूप ] अन्य
दन्यत्र गमनं क्वचित् ।स्थानपर ध्यानयोगी जाते हैं, उसके
स्थानं परार्ध्यमपरंमोक्षके लिये ऐसे किसी स्थानपर
यत्र गच्छन्ति योगिनः ॥जानेकी आवश्यकता नहीं होती ।