भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११३

अज्ञानवन्धभेदस्तु | अज्ञानरूप बन्धनकी निवृत्ति और मोक्षो ब्रह्मलयस्त्विति ॥” | ब्रह्ममें लीन हो जाना-यही उसका मोक्ष है।” तथा लैङ्गे विदुषो जीवन्मुक्तिं दर्शयति— | तथा लिङ्गपुराणमें भी ज्ञानीकी जीवित रहते हुए ही मुक्ति दिखायी “इह लोके परे चैव | है—“क्योंकि ब्रह्मवेत्ता परमार्थतः कर्तव्यं नास्ति तस्य वै। | जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता जीवन्मुक्तो यतस्तस्माद् | है, इसलिये उसके लिये इस लोक ब्रह्मवित्तपरमार्थतः॥” | और परलोकमें कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता।” शिवधर्मोत्तरे— | शिवधर्मोत्तरमें कहा है—“ज्ञानीकी “वाञ्छात्ययेऽपि कर्तव्यं | समस्त कामनाएँ निवृत्त हो जाती किञ्चिदस्य न विद्यते। | हैं, इसलिये उसका कुछ भी कर्तव्य इहैव स विमुक्तः | नहीं रहता। वह पूर्णकाम और सम- स्यात्संपूर्‍णः समदर्शनः॥” | दर्शी होनेसे इसी लोकमें मुक्त हो जाता है।” तस्मादुपासको देहादुत्क्रम्या- | अतः उपासक तो देहसे उत्क्रमण [उपासक-विदुषोर्गंत्युप-संहारः] र्चिरादिना देवया- | कर अर्चिरादि देवयानमार्गसे सर्वै- नेन विश्वैश्वर्यं ब्रह्म | श्वर्यपूर्ण कारणब्रह्मको प्राप्त हो सब प्राप्य विश्वैश्वर्यमनु- | प्रकारका ऐश्वर्य भोगनेके अनन्तर भूय तत्रैव केवलं प्रत्यस्तमित- | वहीं सम्पूर्ण भेदसे रहित पूर्णानन्द- भेदपूर्णानन्दाद्वितीयब्रह्मात्मानं | स्वरूप अद्वितीय केवल शुद्ध ब्रह्मको ज्ञात्वा केवलात्मकामो मुक्तो | आत्मभावसे जानकर केवल आत्म- भवति। विद्वान्निर्विरोषपूर्णानन्दा- | कामी होकर मुक्त हो जाता है। द्वितीयब्रह्मविज्ञानादशेषगन्तृगन्त- | तथा विद्वान् निर्विशेष पूर्णानन्दा-द्वितीय ब्रह्मका ज्ञान हो जानेसे गन्ता,