श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 128, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ व्यगमनादिभेदप्रत्यस्तमयाद्विनैवो- | गन्तव्य और गमनादि सम्पूर्ण भेदकी त्क्रान्तिं देवयानं च ब्रह्म- | निवृत्ति हो जानेसे उत्क्रान्ति और ज्ञानसमनन्तरं जीवन्मुक्तो ब्रह्म- | देवयानमार्गके बिना ही ब्रह्मज्ञानके ज्ञानसमनन्तरं ब्रह्मानन्दमनुभूय | अनन्तर जीवन्मुक्त हो जाता है। आत्मरतिरात्मतृप्त आत्मनैवान्तः- | वह ब्रह्मज्ञानके पश्चात् ब्रह्मानन्दका सुखोऽन्तरारामोऽन्तर्ज्योतिरात्म- | अनुभव कर आत्मरति और आत्मतृप्त क्रीड आत्मरतिरात्ममिथुन | हो अपने आत्मामें ही आन्तरिक आत्मानन्द इहैव स्वाराज्ये | सुख, रमण एवं प्रकाशका अनुभव भूम्नि स्वे महिम्न्यमृतोऽवतिष्ठते । | करता हुआ आत्मक्रीड, आत्मरति, तद्धेतुत्वाद्वाह्यविषयपरित्यागेन | आत्ममिथुन और आत्मानन्द होकर ब्रह्मण्याधाय वाङ्मनःकायनिष्पाद्यं | इसी लोकमें स्वाराज्य अर्थात् अपनी श्रौतस्मार्तलक्षणं कर्म कृत्वा | सार्वभौम महिमामें अमृतरूपसे स्थित विशुद्धसत्त्वो योगारूढो भूत्वा | हो जाता है। वह बाह्य विषयोंको शमादिसाधनसंपन्नः । | त्यागकर मन, वाणी और शरीरसे “योगी युञ्जीत सतत- | होनेवाले सम्पूर्ण श्रौत-स्मार्त कर्मोंको मात्मानं रहसि स्थितः । | ब्रह्मार्पण करके अनुष्ठान करता हुआ एकाकी यतचित्तात्मा | शुद्धचित्त और योगारूढ होकर निराशीरपरिग्रहः ॥ | शमादि साधनोंसे सम्पन्न हो जाता एवं युञ्जन्सदात्मानं | है, क्योंकि ये ही साधन ब्रह्मज्ञानकी योगी विगतकल्मषः । | प्राप्तिके हेतु हैं। सुखेन ब्रह्मसंस्पर्श- | “ध्यानयोगीको एकान्तमें अकेले मत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ | ही स्थित हो सब प्रकारकी आशा और | परिग्रहका त्याग कर शरीर और मनका | निग्रह करते हुए निरन्तर योगका | अभ्यास करना चाहिये । इस प्रकार | सर्वदा योगसाधनमें लगा हुआ वह | पापहीन योगी सुगमतासे ही ब्रह्म- | साक्षात्काररूप अत्यन्त उत्कृष्ट सुख