श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ११५ सर्वभूतस्थमात्मानं प्राप्त कर लेता है। जिसकी सर्वत्र सर्वभूतानि चात्मनि । समदृष्टि है वह योगयुक्त पुरुष ईक्षते योगयुक्तात्मा अपने आत्माको सम्पूर्ण भूतोंमें और सर्वत्र समदर्शनः ॥” सम्पूर्ण भूतोंको अपने आत्मामें स्थित (गीता ६ । १०, २८, २९) देखता है।” “इस प्रकार सर्वत्र समान “समं पश्यन्हि सर्वत्र भावसे स्थित ईश्वरको समानरूपसे समवस्थितमीश्वरम् । देखता हुआ वह स्वयं अपना घात न हिनस्त्यात्मनात्मानं नहीं करता, और फिर परमगतिको ततो याति परां गतिम्॥” प्राप्त होता है।” इत्यादि स्मृतिवाक्य (गीता १३ । २८) इसमें प्रमाण हैं ॥११॥ इति स्मृतेः ॥ ११ ॥ ब्रह्मकी ज्ञातव्यता यस्माज्ज्ञानानन्तरं परमपुरुषा- क्योंकि ज्ञानके पश्चात् परम र्थसिद्धिस्तस्मात्— पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, इसलिये— एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थं नातः परं वेदितव्यं हि किञ्चित् । भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत् ॥१२॥ अपने आत्मामें स्थित इस ब्रह्मको सर्वदा ही जानना चाहिये । इससे बढ़कर और कोई ज्ञातव्य पदार्थ नहीं है। भोक्ता (जीव), भोग्य (जगत्) और प्रेरक (ईश्वर)—यह तीन प्रकारसे कहा हुआ पूर्ण ब्रह्म ही है--ऐसा जानना चाहिये ॥ १२ ॥ एतत्प्रकृतं केवलात्माकाश- इस प्रकृत विशुद्ध आत्माकाशस्वरूप ब्रह्मरूपं नित्यं नियमेन ज्ञेयम् । ब्रह्मको नित्य—नियमसे जानना