भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

१२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ न्द्रियाणां च ऐकाग्र्यं परमं तपः" | इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है।" इति स्मरणात् । एनमात्मानं | अतः इन सत्य और तपके द्वारा जो योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥ | इस आत्माको देखता है [ उसे इसकी उपलब्धि होती है ] ॥ १५ ॥ कथमेनमनुपश्यति ? इत्यत | इस परमात्माको किस प्रकार देखता है ? सो बताते हैं— आह— | सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पिरिवार्पितम् । आत्मविद्यातपोमूलं तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥ तद्ब्रह्मोपनिषत्परम् ॥१६॥ जो आत्मविद्या और तपका मूल है तथा जिसमें परम श्रेय आश्रित है उस सर्वव्यापी आत्माको दूधमें विद्यमान घृतके समान देखता है ॥१६॥ सर्वव्यापिनमिति । सर्वं प्रकृ- | 'सर्वव्यापिनम्' इत्यादि । जो त्यादिविशेषान्तं व्याप्यावस्थितं | केवल देहेन्द्रियादि अध्यात्ममात्रमें न देहेन्द्रियाद्यध्यात्ममात्रावस्थि- | ही स्थित नहीं है अपि तु प्रकृतिसे तमात्मानं क्षीरे सर्पिरिव सारत्वेन | लेकर पञ्चभूतपर्यन्त सबको व्याप्त निरन्तरतयात्मत्वेन सर्वेष्वर्पित- | करके स्थित है, उस आत्माको दूधमें मात्मविद्यातपोमूलं कारणम् । | साररूपसे स्थित घीके समान सबमें श्रूयते च—"एष ह्येव साधुकर्म | अखण्ड आत्मभावसे विद्यमान तथा कारयति।" (कौषी० उ० ३।८) | आत्मविद्या और तपके मूल यानी "ददामि बुद्धियोगं तं येन | कारणरूपसे देखते हैं । श्रुति भी मामुपयान्ति ते" ( गीता १० । | कहती है—"यही शुभ कर्म कराता १०) इति । | है", तथा [स्मृति कहती है—] "मैं उन्हें वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर लेते हैं।"