भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२३ अथवाऽऽत्मविद्या च तपश्च अथवा ऐसा भी अर्थ हो सकता यस्यात्मलाभे मूलं हेतुरिति । है—आत्मविद्या और तप ये जिस आत्माकी प्राप्तिके मूल यानी कारण तथा च श्रुतिः—"विद्ययामृत- हैं, जैसा कि श्रुति कहती है— मश्नुते" (ई० उ० ११)। "तपसा "ज्ञानसे अमृतकी प्राप्ति होती है" ब्रह्म विजिज्ञासस्व" (तै० उ० ३। "तपसे ब्रह्मको जाननेकी इच्छा २। १) इति च। ब्रह्मोपनिषत्प- करो" इत्यादि । 'ब्रह्मोपनिषत्परम्'— रमुपनिषण्णमस्मिन्परं श्रेय इति । जिसमें परम श्रेय उपनिषण्ण (आश्रित) है । तात्पर्य यह है कि जो सत्यादि- यः सत्यादिसाधनसंयुक्तः स एनं साधनसम्पन्न है वही जो दूधमें घृतके सर्वव्यापिनमात्मानं क्षीरे सर्पि- समान सर्वगत और आत्मविद्या एवं तपका मूल है तथा जो ब्रह्मोपनिषत्पर रिवार्पितमात्मविद्यातपोमूलं तद्ब्र- है, उस सर्वव्यापी आत्माको देखता है । अर्थात् आत्मदर्शी पुरुष इस ह्मोपनिषत्परमनुपश्यति सर्वगतं सर्वगत ब्रह्मको आत्मामें ही देखता ब्रह्मात्मदर्शिनात्मन्येव गृह्यते ना- है, जो असत्यादियुक्त और अन्न- सत्यादियुक्तेन परिच्छिन्नब्रह्मान्न- मयादिरूपसे परिच्छिन्न देहमें ही आत्मबुद्धि करनेवाला है उसे ब्रह्मकी मयाद्यात्मना । श्रूयते च— उपलब्धि नहीं होती । श्रुति भी कहती है—"यह आत्मा सर्वदा "सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सत्य, तप, सम्यग्ज्ञान और ब्रह्मचर्य- सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् । के द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, तथा जिनमें कुटिलता, असत्य और न येषु जिह्ममनृतं न माया च" कपट नहीं होता वे ही इसे प्राप्त कर (प्र० उ० १।१६) इति। द्विर्वचन- सकते हैं ।" यहाँ 'ब्रह्मोपनिषत्परम्' मध्यापरिसमाप्त्यर्थम् ॥ १६॥ इसका दो बार पाठ अध्यायकी समाप्ति सूचित करनेके लिये है॥१६॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कर- भगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥