भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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१२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २

सविता प्रसुवाति तान्करणानि । | उन इन्द्रियोंको सवितृदेव अनुज्ञा देता यथा करणानि विषयेभ्यो निवृत्ता- | है। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियाँ | विषयोंसे निवृत्त हो आत्माभिमुखी न्यात्माभिमुखान्यात्मप्रकाशमेव | होकर जिस प्रकार आत्माको ही | प्रकाशित करें वैसी अनुज्ञा (सामर्थ्य) कुर्युस्तथानुजानातु सवितेत्यर्थः॥३॥ | उन्हें सवितादेवता प्रदान करे ॥३॥

तस्यैवमनुजानतो महती परि- | इस प्रकार अनुज्ञा देनेवाले उस ष्टुतिः कर्तव्येत्याह— | देवकी महती स्तुति करनी उचित है | —इस अभिप्रायसे श्रुति कहती है— युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः । वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः ॥ ४ ॥ जो विप्रगण मन और इन्द्रियोंको परमात्मामें लगाते हैं उनको चाहिये कि जिस एक प्रज्ञावित्ने होतृसाध्य [ यज्ञादि ] क्रियाओंका विधान किया है उस महान्, सर्वज्ञ और विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सवितृदेवकी महती स्तुति करें ॥ ४ ॥ युञ्जत इति । युञ्जते योज- | 'युञ्जते' इत्यादि । जो विप्र- यन्ति ये विप्रा मन उत युञ्जते | ब्राह्मण, मन एवं अन्य इन्द्रियोंको धिय इतराण्यपि करणानि । धी- | परमात्मामें लगाते हैं। इन्द्रियाँ बुद्धि- हेतुत्वात्करणेषु धीशब्दप्रयोगः । | जनित हैं इसलिये उनके लिये 'धी' | शब्दका प्रयोग किया गया है। ऐसा तथा च श्रुत्यन्तरम्—"यदा | ही एक दूसरी श्रुति भी कहती है पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा | —"जब मनके सहित पाँच ज्ञान

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