श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 143, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २ ] शाङ्करभाष्यार्थ १२९ सह" (क० उ० २।३।१०) इति । | ( ज्ञानेन्द्रियाँ ) रुक जाती हैं" विप्रस्य विशेषेण व्याप्तस्य बृहतो | इत्यादि । विप्र—विशेषरूपसे महतो विपश्चितः सर्वज्ञस्य | व्यापक, बृहत्—महान् एवं देवस्य सवितुर्मही महती परिष्टुतिः | विपश्चित्—सर्वज्ञ सवितृदेवकी महती कर्तव्या । कैर्विप्रैः । | स्तुति करनी चाहिये । किन्हें पुनरपि तमेव विशिनष्टि— | करनी चाहिये ?—ब्राह्मणोंको । वि होत्रा दधे होत्राः क्रिया यो | फिर भी उस सवितृदेवके ही विदधे वयुनाविप्रज्ञावित्सर्वज्ञाना- | विशेषण दिये जाते हैं—'वि होत्रा त्साक्षिभूत एकोऽद्वितीयः । ये | दधे' जिसने होत्रा यानी यज्ञक्रियाओं- विप्रा मनआदिकरणानि विषयेभ्य | का विधान किया है और जो वयुना- उपसंहृत्यात्मन्येव योजयन्ति तै- | वित्—प्रज्ञावित् अर्थात् सब कुछ र्विप्रस्य बृहतो विपश्चितो महती | जाननेके कारण साक्षिस्वरूप है, वह परिष्टुतिः कर्तव्या । होत्रा विदधे | [सविता देवता] एक—अद्वितीय है । वयुनाविदेकः सविता ॥ ४ ॥ | अर्थात् जिसने यज्ञक्रियाओंका विधान किया वह प्रज्ञानवान् सविता एक ही है। अतः जो ब्राह्मण मन आदि इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर आत्मामें ही लगाते हैं उन्हें इस महान् एवं सर्वज्ञ विप्र ( विशेषरूपसे व्यापक ) सविताकी महती स्तुति करनी चाहिये ॥४॥ किञ्च— | तथा— युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभि- र्विश्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥ ५ ॥