भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 144, कुल 276 में से

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पृष्ठ 144

१३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २ [ हे इन्द्रियवर्ग और इन्द्रियाधिष्ठातृ देवगण ! ] मैं तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले पुरातन ब्रह्ममें नमस्कार ( चित्त-प्रणिधान आदि ) द्वारा मन लगाता हूँ । सन्मार्गमें विद्यमान विद्वान्की भाँति मेरा यह कीर्तनीय श्लोक ( स्तुतिपाठ ) लोकमें विस्तारको प्राप्त हो । जिन्होंने सब ओरसे दिव्य धामोंपर अधिकार कर रखा है वे अमृत ( हिरण्यगर्भ ) के पुत्र विश्वेदेवगण श्रवण करें ॥५॥ युजे वामिति । युजे वां समा- | 'युजे वाम्' इत्यादि। इन्द्रिय और | उनके अनुग्राहक देवगण ! तुम दधे वां युवयोः करणानुग्राहकयोः | दोनोंके द्वारा प्रकाश्यनीय होनेके | कारण तुमसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्रह्ममें संबन्धि प्रकाश्यत्वेन तत्प्रकाशितं | मैं मनको नियुक्त—समाहित करता | हूँ; तात्पर्य यह है कि ब्रह्म इनके ब्रह्मेत्यर्थः । अथवा वामिति बहु- | द्वारा प्रकाशित है । अथवा 'वाम्' | इस शब्दका यदि बहुवचनमें अर्थ वचनार्थे युष्माकं करणभूतं ब्रह्म | किया जाय तो 'तुम्हारे करणभूत | पूर्वतन—चिरकालीन ब्रह्ममें मैं चित्त पूर्व्यं पूर्वं चिरन्तनं समादधे । | समाहित करता हूँ' ऐसा अर्थ होगा। | [ किस प्रकार चित्त समाहित करता नमोभिर्नमस्कारैश्चित्तप्रणिधाना- | हूँ ? ] नमस्कारोंद्वारा अर्थात् चित्त- दिभिः । | प्रणिधान (मनोनियोग) आदिके द्वारा। एष एवं समाधानस्य मम | इस प्रकार चित्तसमाधान करने- | वाले मेरा कीर्तितव्य श्लोक ( स्तोत्र- श्लोकः कीर्तितव्य एतु विविधमेतु | पाठ ) सन्मार्गमें वर्तमान विद्वान्‌के | समान विविधरूप (विस्तारको प्राप्त) पथ्येव सूरेः पथि सन्मार्गे । | हो जाय । अथवा [ 'पथ्या इव' | ऐसा पदच्छेद करके ] पथ्याका अर्थ अथवा पथ्या कीर्तिरित्येतद्वाक्यं | कीर्ति करना चाहिये । अर्थात्