श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
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अध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १६१
कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वाति | किन्तु जीव उसीको जानकर मृत्युमेति ? इत्युच्यते— | मृत्युको कैसे पार कर लेता है ? सो | बतलाया जाता है— यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चि- द्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम् ॥ ९ ॥ जिससे उत्कृष्ट और कोई नहीं है, तथा जिससे छोटा और बड़ा भी कोई नहीं है वह यह अद्वितीय परमात्मा अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके समान निश्चलभावसे स्थित है, उस पुरुषने ही इस सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है ॥ ९ ॥ यस्मादिति । यस्मात्परं पुरु- | 'यस्मात्' इत्यादि । जिस षात्परमुत्कृष्टमपरमन्यन्नास्ति, य- | पुरुषसे उत्कृष्ट अन्य कोई नहीं है, स्मान्नाणीयोऽणुतरं न ज्यायो | तथा जिससे अणीयस्—न्यूनतर और महत्तरं वास्ति । वृक्ष इव स्तब्धो | ज्यायस्—महत्तर भी कोई नहीं है निश्चलो दिवि द्योतनात्मनि स्वे | वह अद्वितीय परमात्मा दिवि अर्थात् महिम्नि तिष्ठत्येकोऽद्वितीयः पर- | अपनी द्योतनात्मक महिमामें वृक्षके मात्मा तेनाद्वितीयेन परमात्मनेदं | समान स्तब्ध-निश्चलभावसे स्थित है। सर्वं पूर्णं नैरन्तर्येण व्याप्तं पुरुषेण | उस अद्वितीय परमात्मा पूर्ण पुरुषने पूर्णेन ॥ ९ ॥ | इस सबको पूर्ण--निरन्तरतासे व्याप्त | कर रखा है ॥ ९ ॥
इदानीं ब्रह्मणः पूर्वोक्तकार्य- | अब पहले बतलायी हुई ब्रह्मकी कारणतां दर्शयञ्ज्ञानिनाममृतत्व- | कार्य-कारणता दिखलाकर श्रुति | ज्ञानियोंको अमृतत्व और अन्य सबको मितरेषां च संसारित्वं दर्शयति- | संसारित्वकी प्राप्ति प्रदर्शित करती है—