श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 188, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ अध्याय परमेश्वरसे सद्बुद्धिके लिये प्रार्थना गहनत्वादस्यार्थस्य भूयो भूयो | [ प्रस्तुत ] विषय गम्भीर होनेके | कारण इसका पुनः-पुनः निरूपण। वक्तव्य इति चतुर्थोऽध्याय | करना आवश्यक है, इसलिये अब | चतुर्थ अध्याय आरम्भ किया आरभ्यते— | जाता है— य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगा- द्धर्णाननेकान्निहितार्थो दधाति । वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देवः स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु ॥ १ ॥ सृष्टिके आरम्भमें जो एक और निर्विशेष होकर भी अपनी शक्तिके द्वारा बिना किसी प्रयोजनके ही नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष रूप) धारण करता है तथा अन्तमें भी जिसमें विश्व लीन हो जाता है वह प्रकाश- स्वरूप परमात्मा हमें शुभ बुद्धिसे संयुक्त करे ॥ १ ॥ य एक इति । य एकोऽद्वि- | ‘य एको’ इत्यादि । जो तीयः परमात्मावर्णो जात्यादि- | परमात्मा सृष्टिके आरम्भमें एक— रहितो निर्विशेष इत्यर्थः । बहुधा | अद्वितीय और अवर्ण—जाति नानाशक्तियोगाद्वर्णाननेकान्नि- | आदिसे रहित अर्थात् निर्विशेष | होनेपर भी शक्तिके योगसे निहितार्थ हितार्थोऽगृहीतप्रयोजनः स्वार्थ- | —कोई प्रयोजन न लेकर अर्थात् निरपेक्ष इत्यर्थः । दधाति विदधा- | स्वार्थकी अपेक्षा न करके बहुधा— | नाना प्रकारके अनेकों वर्ण (विशेष-