श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 198, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१८४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ हितक्रियाश्च यज्ञाः । ज्योतिष्टोमा- | हैं, ज्योतिष्टोमादि याग क्रतु हैं, तथा दयः क्रतवः । व्रतानि चान्द्रायणा- | चान्द्रायणादि व्रत हैं । भूत--जो दीनि । भूतमतीतम् । भव्यं | बीत चुका है, भव्य—जो होनेवाला भविष्यत् । यदिति तयोर्मध्य- | है । 'यत्' यह पद उनके मध्यवर्ती वर्ति वर्तमानं सूचयति । चशब्दः | वर्तमानका सूचक है और 'च' शब्द समुच्चयार्थः । यज्ञादिसाध्ये | सबका समुच्चय करनेके लिये है । कर्मणि प्रपञ्चे भूतादौ च वेदा | तात्पर्य यह है कि यज्ञादिसाध्य कर्म एव मानमित्येतत् । यच्छब्दः | और भूतादि प्रपञ्चमें वेद ही प्रमाण सर्वत्र संबध्यते । अस्मात्प्रकृता- | हैं । मूलमें 'यत्' शब्दका सबके दक्षरब्रह्मणः पूर्वोक्तं सर्वमुत्पद्यत | साथ सम्बन्ध है । इसका सम्बन्ध इति संबन्धः । | इस प्रकार है कि जो कुछ पहले अविकारिब्रह्मणः कथं प्रपञ्चो- | कहा गया है सब इस प्रकृत अक्षर पादानत्वम्? इत्यत आह-मायीति। | ब्रह्मसे ही उत्पन्न होता है । कूटस्थस्यापि स्वशक्तिवशात्सर्व- | अविकारी ब्रह्म किस प्रकार स्रष्टृत्वमुपपन्नमित्येतत् । विश्वं | प्रपञ्चका उपादान कारण हो सकता पूर्वोक्तप्रपञ्चं सृजत उत्पादयति। | है ? ऐसा प्रश्न होनेपर श्रुति कहती स्वमायया कल्पिते तस्मिन्भूता- | है—'मायी सृजते' इत्यादि। तात्पर्य दिप्रपञ्चे माययैवान्य इव संनि- | यह है कि कूटस्थ ब्रह्मका भी अपनी रुद्धः संबद्धोऽविद्यावशगो भूत्वा | शक्तिके द्वारा सबका रचयिता होना संसारसमुद्रे भ्रमतीत्यर्थः ॥ ९ ॥ | सम्भव ही है । वह विश्व अर्थात् | पूर्वोक्त प्रपञ्चको उत्पन्न करता है । | तथा अपनी मायासे कल्पित हुए उस | भूतादि प्रपञ्चमें वह मायासे ही अन्य- | सा होकर बँध गया है, अर्थात् | अविद्याके वशीभूत होकर संसार- | समुद्रमें भटकता रहता है ॥ ९ ॥