श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८५
प्रकृति और परमेश्वरका स्वरूप तथा उनकी सर्वव्यापकता पूर्वोक्तायाः प्रकृतेर्मायात्वं पूर्वोक्त प्रकृति माया है और तदधिष्ठातृसच्चिदानन्दरूपब्रह्मण- उसका अधिष्ठाता सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म उस ( मायारूप ) उपाधिके स्तदुपाधिवशान्मायित्वं च चिद्रू- कारण मायावी है तथा उस चिद्रूप पस्य मायावशात्कल्पितावयव- ब्रह्मके मायाके कारण कल्पित हुए भूतैः कार्यकारणसंघातैः सर्वं अवयवरूप कार्य-कारणसंघातसे यह दिखायी देता हुआ भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादीदं परिदृश्यमानं जगद्व्याप्तं जगत् व्याप्त है—इस आशयसे श्रुति चेत्याह— कहती है— मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस्तु व्याप्तं सर्वमिदं जगत् ॥१०॥ प्रकृतिको तो माया जानना चाहिये और महेश्वरको मायावी । उसीके अवयवभूत [ कार्य-कारणसंघात ] से यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है ॥ १० ॥ मायां त्विति । जगत्प्रकृति- ‘मायां तु’ इत्यादि । पीछे जिसका जगत्की प्रकृति ( कारण ) त्वेनाधस्तात्सर्वत्र प्रतिपादिता रूपसे सर्वत्र प्रतिपादन किया गया प्रकृतिर्मायैवेति विद्याद्विजानी- है—वह प्रकृति माया ही है— ऐसा जाने । यहाँ ‘तु’ शब्द यात् । तुशब्दोऽवधारणार्थः । निश्चयार्थक है। जो महान् और ईश्वर महांश्चासावीश्वरश्चेति महेश्वरस्तं होनेके कारण महेश्वर है उसे मायावी —मायाको सत्ता-स्फूर्ति आदि मायिनं मायायाः सत्तास्फूर्त्यादि- देनेवाला तथा अधिष्ठानरूपसे उसे प्रेरित करनेवाला जानना चाहिये— प्रदं तथाधिष्ठानत्वेन प्रेरयितारमेव इस प्रकार इसका पूर्वोक्त ‘विद्यात्’ विद्यादिति पूर्वेण संबन्धः । तस्य क्रियासे सम्बन्ध है । उस प्रकृत