भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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१८६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ❦ ══════════════════════════════ ❦ प्रकृतस्य परमेश्वरस्य रज्ज्वाद्यधि- | परमेश्वरके, रज्जु आदि अधिष्ठानोंमें ष्ठानेषु कल्पितसर्पादिस्थानीयैः | कल्पित सर्पादिरूप मायिक अवयवोंसे मायिकैः स्वावयवैरध्यासद्वारेदं | अध्यासद्वारा यह भूर्लोकादि सम्पूर्ण भूरादि सर्वं व्याप्तमेव पूर्णमित्ये- | जगत् व्याप्त यानी पूर्ण है । यहाँ भी तत् । तुशब्दस्त्ववधारणार्थः॥१०॥ | 'तु' शब्द निश्चयार्थक ही है॥१०॥ ───────────ꕥꕥ─────────── कारण-ब्रह्मके साक्षात्कारसे परम शान्तिकी प्राप्ति मायातत्कार्यादियोनेः कूट- | माया और उसके कार्यादिका | मूलभूत कूटस्थ ब्रह्म अपने स्वतन्त्र- स्थस्य स्ववशतोऽधिष्ठातृत्वं विय- | रूपसे सबका अधिष्ठाता है तथा दादिकार्याणामुत्पत्तिहेतुत्वं तेनैव | आकाशादि कार्योंकी उत्पत्तिका हेतु | है और उस शुद्धस्वरूपसे ही उसके सर्वाधिष्ठातृत्वोपलक्षितसच्चिदान- | सर्वाधिष्ठातृत्वसे उपलक्षित होनेवाले | सच्चिदानन्दस्वरूपसे 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा न्दवपुषा ब्रह्मास्मीत्येकत्वज्ञाना- | एकत्व-ज्ञान होनेसे मुक्ति होती है; न्मुक्तिं च दर्शयति— | यह बात श्रुति दिखलाती है— यो योनिं योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं स च वि चैति सर्वम् । तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥११॥ जो अकेला ही प्रत्येक योनिका अधिष्ठाता है, जिसमें यह सब सम्यक् प्रकारसे लीन होता है और फिर विविधरूप हो जाता है उस सर्व- नियन्ता, वरदायक, स्तवनीय देवका साक्षात्कार करके साधक इस परम शान्तिको प्राप्त होता है ॥११॥