श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 201, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १८७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰
[संस्कृत-शारीरकभाष्यम्]
यो योनिमिति । यो माया- विनिर्मुक्तआनन्दैकघनः परमेश्वरो योनिं योनिमिति वीप्सया मूल- प्रकृतिर्मायावान्तरप्रकृतयो विय- दादयश्च सूचितास्ताः प्रकृतीः सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेनाधिष्ठाय तिष्ठ- त्यन्तर्यामिरूपेण । “य आकाशे तिष्ठन्” ( बृ० उ० ३ । ७ । १२ ) इत्यादि श्रुतेः । एको- ऽद्वितीयः । यस्मिन्मायाद्यधिष्ठात- रीश्वर इदं सर्वं जगदुपसंहारकाले समेति संगच्छते लयं प्राप्नोति । पुनः सृष्टिकाले विविधमेत्या- काशादिरूपेण नाना भवति । तं प्रकृतमधिष्ठातारमीशानं नियन्तारं वरदं मोक्षप्रदं देवं द्योतनात्मक- मीड्यं वेदादिभिः स्तुत्यं निचाय्य निश्चयेन ब्रह्माहमस्मीत्यपरोक्षी- कृत्य सुषुप्त्यादौ प्रत्यक्षीकृता या सर्वोपरमलक्षणा सर्वजनीना शान्तिः सेदमा दर्शिता तां प्रसिद्धामिमां शान्तिं सर्वदुःख- विनिर्मुक्तसुखैकतानस्वरूपां मुक्ति-
[हिन्दी-भाष्यार्थ]
‘यो योनिम्’ इत्यादि । जो मायातीत विशुद्धानन्दघन परमेश्वर योनि-योनिको—‘योनिं योनिम्’ इस द्विरुक्तिसे मूलप्रकृतिरूपा माया और अवान्तर प्रकृतिरूप आकाशादि—ये दोनों प्रकृतियाँ ( योनियाँ ) सूचित होती हैं उन दोनों प्रकारकी प्रकृतियोंको सत्ता-स्फूर्तिप्रदरूपसे अधिष्ठित करके अन्तर्यामीरूपसे स्थित है जैसा कि “जो आकाशमें स्थित है” इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध होता है । जो एक—अद्वितीय है । जिस मायादिके अधिष्ठाता ईश्वरमें यह सम्पूर्ण जगत् प्रलयकालमें संगत— लयको प्राप्त होता है और फिर सृष्टि- कालमें विविधताको प्राप्त होता अर्थात् आकाशादिरूपसे नानाकार हो जाता है उस प्रस्तुत अधिष्ठाता, ईशान— नियन्ता, वरद—मोक्षप्रद, देव— प्रकाशस्वरूप और ईड्य—वेदादि- द्वारा स्तुत्यको अनुभव कर ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार निश्चयरूपसे प्रत्यक्ष कर सुषुप्ति आदिमें अनुभव की हुई जो सर्वोपरतिरूपा सर्वजनहितकारिणी शान्ति है वह यहाँ ‘इदम्’ शब्दसे— ‘इमाम्’ इस संकेतसे दिखायी गयी है, उस इस प्रसिद्ध शान्तिको अर्थात् सर्व- दुःखशून्यसुखैकतानतारूपा मुक्तिको