श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
ज्ञानसे द्वैत-निवृत्तिका उपदेश
कालत्रयेऽपि मुक्तौ प्रलयादौ | तीनों ही कालमें तथा मुक्ति और च परमात्मा कूटस्थ इति निश्चया- | प्रलय आदिमें भी परमात्मा कूटस्थ | ही है—ऐसा निश्चय होनेसे जाग्रत् जाग्रत्स्वप्नयोरपि भ्रान्त्या सद्द्वि- | और स्वप्नमें भी भ्रान्तिसे ही द्वैत- | प्रतीति होती है; वस्तुतः तो तीयत्वावभासः । वस्तुतस्तु सदा | सर्वदा अभेद ही है—यह बात श्रुति निर्भेद एवेत्याह— | बतलाती है—
यदातमस्तन्न दिवा न रात्रि- र्नसन चासञ्छिव एव केवलः । तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी ॥१८॥
जिस समय अज्ञान नहीं रहता उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एकमात्र शिव रह जाता है; वह अविनाशी और आदित्यमण्डलाभिमानी देवका भजनीय है तथा उसीसे पुरातन प्रज्ञा (गुरुपरम्परागत ज्ञान) का प्रसार हुआ है ॥१८॥
यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस अवस्थामें | अतम—जिसमें तम (अज्ञान) यामतमो न तमोऽस्येत्यतमस्तत्त्व- | नहीं है ऐसा अतम रहता है मादिवाक्यजन्यज्ञानेन दीपस्था- | अर्थात् जब दीपकरूप तत्त्वमस्यादि- | वाक्यजनित ज्ञानसे अविद्या दग्ध नीयेन दग्धाविद्या तत्कार्यरूपतम- | हो जाती है, क्योंकि वह अपने | कार्यरूप तमवाली है, उस समय स्कत्वात्तदा तत्काले न दिवा | न दिन—दिनका आरोप होता दीवारोपोऽपि नास्ति न रात्रिस्त- | है और न रात्रि—रात्रिका ही