श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 211, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९७
दारोपोऽपि नास्तीति सर्वत्रा- | आरोप होता है—इस प्रकार 'आरोप' नुषङ्गः । न सन्सत्तारोपोऽपि । | शब्दका सबके साथ सम्बन्ध लगाना चाहिये । नासन्नभावारोपोऽपि । | और न सत्—सत्ताका आरोप रहता है न असत्—अभाव- तर्हि तत्त्वं सर्वत्र शून्यमेव | का आरोप ही रहता है । जातमिति बौद्धमताविशेषमाश- | तब तो सर्वत्र शून्य ही तत्त्व रहा—इस प्रकार बौद्धमतके सादृश्य- ङ्कयाह—शिव एवेति । शिव | की आशङ्का करके श्रुति कहती है —'शिव एव' इत्यादि । उस समय एव शुद्धस्वभावो न शून्यमिति | शिव यानी शुद्धस्वभाव परमात्मा ही रहता है, शून्य नहीं रहता—यह अर्थ निपातार्थः । केवलोऽविद्यावि- | निपातसे ध्वनित होता है । वह केवल अर्थात् अविद्यारूप विकल्पसे रहित, कल्पशून्यः । तदक्षरं तदुक्तस्वरूपं | अक्षर—उसके स्वरूपका क्षय नहीं होता इसलिये अक्षर यानी नित्य, तत् न क्षरतीत्यक्षरं नित्यं तत्तत्पद- | —तत्पदका लक्ष्यार्थ तथा सविता —आदित्यमण्डलाभिमानी देवताका लक्ष्यं सवितुरादित्यमण्डलाभि- | वरेण्य—वरणीय यानी सम्यक् प्रकार- से भजनीय है । उस शुद्धत्वके हेतुसे मानिनो वरेण्यं संभजनीयम् । | प्रज्ञा--गुरुके उपदेशसे 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धि प्रज्ञा गुरुपदेशातत्त्वमादिवाक्यजा | प्रसृत हुई है अर्थात् नित्य पदार्थके विवेकादिसे सम्पन्न संन्यासियोंमें बुद्धिः, चकार एवकारार्थः, | पूर्णत्वरूपसे व्याप्त हुई है । वह पुराणी यानी ब्रह्मासे आरम्भ करके परम्परासे तस्माच्छुद्धत्वहेतोः प्रसृता नित्य- | प्राप्त हुई है अर्थात् अनादिसिद्धा है । यहाँ चकार एवके अर्थमें है ॥१८॥ विवेकादिमत्सु संन्यासिषु व्याप्ता पूर्णत्वाकारेण पुराणी ब्रह्माण- मारभ्य परम्परया प्राप्तानादि- सिद्धा ॥१८॥