श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 212, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१९८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४ ब्रह्मके अनुपम एवं इन्द्रियातीत स्वरूपका वर्णन कूटस्थस्य ब्रह्मण ऊर्ध्वादिषु अब श्रुति यह बतलाती है कि दिक्षु केनाप्यपरिग्राह्यत्वमद्वितीय- कूटस्थ ब्रह्म ऊर्ध्वादि दिशाओंमें किसी- से भी ग्राह्य नहीं है, अद्वितीय होनेके त्वात्केनाप्यतुलितत्वं कालदिगा- कारण कोई उसके समान नहीं है, तथा वह काल-दिगादिसे अनवच्छिन्न द्यनवच्छिन्नयशःस्वरूपत्वं चाह— यशःस्वरूप है— नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चं न मध्ये परिजग्रभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः ॥१९॥ उसे ऊपरसे, इधर-उधरसे अथवा मध्यमें भी कोई ग्रहण नहीं कर सकता । जिसका नाम महद्यश है ऐसे उस ब्रह्मकी कोई उपमा भी नहीं है ॥१९॥ नैनमिति । एनं प्रकृतमपरि- ‘नैनम्’ इत्यादि । अपरिच्छिन्न, च्छिन्नरूपत्वान्निरंशत्वान्निरवयव- निरंश और निरवयव होनेके कारण त्वाच्चोर्ध्वादिषु दिक्षु कश्चिदपि इस प्रकृत ब्रह्मको ऊर्ध्वादि दिशाओंमें न परिजग्रभत्परिग्रहीतुं न शक्नु- कोई ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है । यात् । तस्य तस्यैवेश्वरस्याखण्ड- अखण्डानन्दानुभवरूप होनेसे उसके सुखानुभवत्वादेतादृशद्वितीयाभा- समान कोई दूसरा न होनेसे उस वात्प्रतिमोपमा नास्ति । यस्य ईश्वरकी कोई प्रतिमा—उपमा नहीं नाम महद्यशो यस्येश्वरस्य नामा- है । जिसका नाम महद्यश है अर्थात् भिधानं महद्दिगाद्यनवच्छिन्नं जिस ईश्वरका नाम—अभिधान महत् सर्वत्र परिपूर्णं यशः कीर्तिः॥१९॥ —दिगादिसे अपरिमित यानी सर्वत्र पूर्ण यश—कीर्ति है* ॥१९॥
- अर्थात् 'वह दिगाद्यनवच्छिन्न कीर्तिवाला' है ।