भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 213

अध्याय ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ १९९ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ ईशस्येन्द्रियाद्यविषयतां प्रत्य- | अब श्रुति ईश्वरकी इन्द्रियादिकी ग्रूपतां तदैक्यज्ञानान्मोक्षतां | अविषयता, प्रत्यग्रूपता और उसके | साथ आत्माके एकत्वका ज्ञान होनेसे चाह— | मोक्षप्राप्तिका वर्णन करती है— न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थं मनसा य एन- मेवं विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥२०॥ इसका स्वरूप नेत्रादिसे ग्रहण करनेयोग्य स्थानमें नहीं है, इसे कोई भी नेत्रद्वारा नहीं देख सकता। जो इस हृदयस्थित परमात्माको शुद्ध बुद्धि यानी मनसे इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं ॥२०॥ न संदृश इति । अस्य प्रकृते- | 'न संदृशे' इत्यादि । इस प्रकृत श्वरस्य रूपं स्वरूपं रूपाादिरहितं | ईश्वरका रूप अर्थात् रूपाादिरहित निर्विशेषं खप्रकाशारखण्डसुखानु- | निर्विशेष स्वप्रकाश अखण्डानन्दा- भवं संदृशे चक्षुरादिग्रहणयोग्य- | नुभवमय स्वरूप संदृश—नेत्रादि प्रदेशे न तिष्ठति तद्विषयो न | इन्द्रियोंसे ग्रहण करनेयोग्य प्रदेशमें भवतीत्येतत् । इन्द्रियागोचरत्वा- | स्थित नहीं है, अर्थात् यह उनका द्वेवैनं प्रकृतं चक्षुरित्युपलक्षणम् । | विषय नहीं होता । इन्द्रियोंका विषय | न होनेसे ही इस प्रकृत परमात्माको सर्वेन्द्रियैरपि कश्चन कोऽपि न | कोई भी नेत्रसे—नेत्र यहाँ समस्त | इन्द्रियोंको उपलक्षित करता है, अतः पश्यति तद्विषयतया ग्रहीतुं न | किसी भी इन्द्रियसे नहीं देख सकता | अर्थात् इसे इन्द्रियोंके विषयरूपसे शक्नुयात् । "यच्चक्षुषा न पश्यति | ग्रहण नहीं कर सकता । "जिसे कोई | नेत्रद्वारा नहीं देख सकता अपि तु

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित) · पृष्ठ 213, कुल 276 में से · BharatKosha