भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 219

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २०५

सर्वज्ञमित्यर्थः । कपिलं कनक- | सर्वज्ञ प्रसूत—अपनेहीसे उत्पन्न किये कपिलवर्णं प्रसूतं स्वेनैवोत्पादितं | हुए कपिल—सुवर्णसदृश कपिलवर्ण हिरण्यगर्भं जनयामास पूर्वमित्य- | हिरण्यगर्भको पहले जन्म दिया था, स्यैव जन्मश्रवणात् । अन्यस्य | क्योंकि आरम्भमें हिरण्यगर्भका ही चाश्रवणात् । उत्तरत्र “यो ब्रह्माणं | जन्म श्रुति प्रतिपादित करती है, विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहि- | अन्य ( महर्षि कपिल ) का जन्म णोति तस्मै” (श्वे० उ० ६।१८) इति | नहीं बतलाती । कारण, आगे यह वक्ष्यमाणत्वात् “कपिलोऽग्रजः” | कहा जायगा कि “जो आरम्भमें इति पुराणवचनात्कपिलो हिरण्य- | ब्रह्माको रचता है और उसके लिये गर्भो वा निर्दिश्यते— | वेदोंको प्रेरित करता है ।” “कपिल | पहले उत्पन्न होनेवाला है” इस | पुराणवचनसे भी कपिल या हिरण्य- | गर्भका ही निर्देश किया गया है । “कपिलर्षिर्भगवतः | “जगत्का मोह नष्ट करनेके सर्वभूतस्य वै किल । | लिये सर्वभूतमय भगवान् विष्णुके विष्णोरंशो जगन्मोह- | ही अंशस्वरूप मुनिवर कपिलने नाशाय समुपागतः ॥” | अवतार लिया है ।” “सर्वभूतात्मा श्रीहरि “कृते युगे परं ज्ञानं | सत्ययुगमें कपिलादिरूप धारण कर कपिलादिखरूपधृत् । | सम्पूर्ण जगत्के लिये हितकर उत्कृष्ट ददाति सर्वभूतात्मा | ज्ञान प्रदान करते हैं ।” “तुम समस्त सर्वस्य जगतो हितम् ॥” | देवताओंमें इन्द्र हो, ब्रह्मवेत्ताओंमें “त्वं शक्रः सर्वदेवानां | ब्रह्मा हो, बलवानोंमें वायुदेवता हो, ब्रह्मा ब्रह्मविदामसि । | योगियोंमें सनत्कुमार हो, ऋषियोंमें वायुर्बलवतां देवो | वसिष्ठ हो, वेदवेत्ताओंमें व्यास हो, योगिनां त्वं कुमारकः॥ | ऋषीणां च वसिष्ठस्त्वं | व्यासो वेदविदामसि । |