भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 229

अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५ व्यापारः । ततो दृष्टिविधानम् । | तत्पश्चात् दृष्टि जाती है, उससे ततो मोहः । तैः सङ्कल्पनस्पर्शन- | पीछे मोह होता है । उन संकल्प, दृष्टिमोहैः शुभाशुभानि कर्माणि | स्पर्श, दर्शन और मोहसे शुभाशुभ निष्पद्यन्ते । ततः कर्मानुगानि | कर्म सम्पन्न होते हैं । फिर कर्मानुगत कर्मानुसारिणी स्त्रीपुंनपुंसकलक्ष- | यानी कर्मोंके अनुसार अनुक्रमसे— णान्यनुक्रमेण परिपाकापेक्षया | कर्मविपाककी अपेक्षासे यह देही— देही मर्त्यः स्थानेषु देवतिर्यङ्क- | जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि नुष्यादिष्वभिसंप्रपद्यते । तत्र | रूपोंको देवता, तिर्यक् एवं मनुष्यादि दृष्टान्तमाह—ग्रासाम्बुनोरन्नपान- | स्थानों ( योनियों ) में प्राप्त करता योरनियतयोर्वृष्टिरासेचनं निदान- | है । उसमें दृष्टान्त देते हैं—जिस मात्मनः शरीरस्य वृद्धिजायते | प्रकार ग्रास और अम्बु यानी अनियत यथा तद्वदित्यर्थः ॥११॥ | अन्न और जलकी वृष्टि—उनका सम्यक् | सेचन आत्माका निदान है अर्थात् | उससे शरीरकी वृद्धि होती है उसी | प्रकार [जीवको कर्मोंके द्वारा तदनुकूल | शरीरोंकी प्राप्ति होती है ]—ऐसा | इसका अभिप्राय है ॥११॥ स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥ जीव अपने गुणों ( पाप-पुण्यों ) के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म बहुतसे देह धारण करता है । फिर उन ( शरीरों ) के कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा उनके संयोग ( देहान्तरप्राप्ति ) का दूसरा हेतु भी देखा गया है ॥ १२ ॥