श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 230, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ [मूल संस्कृत व्याख्या] स्थूलानीति। तानि च स्थू- लान्यश्मादीनि सूक्ष्माणि तैजस- धातुप्रभृतीनि बहूनि देवादि- शरीराणि देही विज्ञानात्मा स्व- गुणैर्विहितप्रतिषिद्धविषयानुभव- संस्कारैर्भोत्यावृणोति । ततस्त- त्क्रियागुणैरात्मगुणैश्च स देह्य- परोऽपि देहान्तरसंयुक्तो भवती- त्यर्थः ॥१२॥
[हिन्दी अनुवाद] 'स्थूलानि' इत्यादि। देही— विज्ञानात्मा अपने गुण यानी विहित और प्रतिषिद्ध विषयोंके अनुभवसे प्राप्त हुए संस्कारोंके द्वारा बहुत-से यानी पाषाणादि स्थूल और तैजस धातु आदि सूक्ष्म देवादि-शरीर धारण करता है। फिर वह देही उन-उन शरीरोंके कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा अन्य रूप हो जाता है अर्थात् देहान्तरसे युक्त हो जाता है ॥१२॥
परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन
[मूल संस्कृत व्याख्या] स एवमविद्याकामकर्मफल- रागादिगुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव सान्द्रजलनिमग्नो निश्चयेन देहा- हंभावमापन्नः प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि- योनिष्व्वाजीवं जीवभावमापन्नः कथ- ञ्चित्पुण्यवशादीश्वरार्थकर्मानुष्ठा- नेनापगतरागादिमलोऽनित्यत्वादि- दर्शनेनोत्पन्नेहामुत्रार्थफलभोगवि- रागः शमदमादिसाधनसंपन्नस्त- मात्मानं ज्ञात्वा मुच्यत इत्याह—
[हिन्दी अनुवाद] अब श्रुति यह बतलाती है कि इस प्रकार गम्भीर जलमें डूबे हुए तूँबेके समान अविद्या, काम, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण अपने निश्चयसे देहात्मभावसे ही युक्त हुआ जीव प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि योनियोंमें जीवनपर्यन्त जीवभावमें ही स्थित हुआ किसी प्रकार पुण्यवश ईश्वरार्थ कर्म करनेसे रागादिमलसे शुद्ध हो जानेपर जब अनित्यत्वादि दोष-दृष्टि करनेसे ऐहिक और आमुष्मिक फल- भोगसे विरक्त और शमदमादि साधनसम्पन्न होता है तब उस आत्माको जानकर वह मुक्त हो जाता है—