श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१७
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ इस गहन संसारके भीतर उस अनादि, अनन्त, विश्वके रचयिता, अनेकरूप, विश्वको एकमात्र व्याप्त करनेवाले देवको जानकर जीव समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ अनाद्यनन्तमिति । अनाद्य- | 'अनाद्यनन्तम्' इत्यादि । कलिलके नन्तमाद्यन्तरहितं कलिलस्य मध्ये | मध्यमें यानी अत्यन्त गम्भीर संसारके गहनगभीरसंसारस्य मध्ये विश्वस्य | मध्यमें अनाद्यनन्त—आदि-अन्तसे स्रष्टारमुत्पादयितारमनेकरूपं वि- | रहित, विश्वकी सृष्टि-उत्पत्ति करने- श्वस्यैकं परिवेष्टितारं स्वात्मना | वाले, अनेकरूप, विश्वके एकमात्र सं व्याप्यावस्थितं ज्ञात्वा देवं | परिवेष्टा अर्थात् अपने स्वरूपसे ज्योतीरूपं परमात्मानं मुच्यते | विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए, सर्वपाशैर्विद्याकामकर्मभिः॥१३॥ | देव—ज्योतिःस्वरूप परमात्माको जानकर जीव समस्त पाशोंसे यानी अविद्या, काम एवं कर्मादिसे मुक्त हो जाता है ॥१३॥ —————o000o————— केन पुनरसौ गृह्यते ? इत्याह— | किन्तु यह किसके द्वारा ग्रहण किया जाता है, सो बतलाते हैं— भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्य, अशरीरसंज्ञक, सृष्टि और प्रलय करनेवाले, शिवस्वरूप, एवं कलाओंकी रचना करनेवाले इस देवको जो जान लेते हैं वे शरीर ( देहबन्धन ) को त्याग देते हैं ॥ १४ ॥