भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 276 में से

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२१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ————————————

भावग्राह्यमिति । भावेन वि- | ‘भावग्राह्यम्’ इत्यादि । भाव— शुद्धान्तःकरणेन गृह्यत इति | विशुद्ध अन्तःकरणसे ग्रहण किया जाता है इसलिये जो भावग्राह्य है, भावग्राह्यम् । अनीडाख्यं नीडं | अनीडाख्य—नीड शरीरको कहते शरीरमशरीराख्यम् । भावाभाव- | हैं अतः अशरीर नामवाले, भाव और अभाव (सृष्टि और प्रलय) करने- करं शिवं शुद्धमविद्यातत्कार्य- | वाले, शिव—शुद्ध अर्थात् अविद्या विनिर्मुक्तमित्यर्थः। कलानां षोड- | और उसके कार्यसे रहित, कला सर्गकर—“उसने प्राणकी रचना शानां प्राणादिनामान्तानाम् “स | की” इत्यादि वाक्यसे अथर्वण (प्रश्न) प्राणमसृजत” (प्र० उ० ६।४) | श्रुतिमें कही हुई प्राणसे लेकर इत्यादिनाथर्वणोक्तानां सर्गकरं | नामपर्यन्त सोलह कलाओंके रचयिता उस देवको जो ‘यह मैं हूँ’ इस देवं ये विदुरहमस्मीति ते जहुः | प्रकार जानते हैं वे तनु—शरीरको परित्यजेयुस्तनुं शरीरम् ॥१४॥ | त्याग देते हैं* ॥१४॥

इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥

  • अर्थात् फिर उनका शरीरान्तरसे सम्बन्ध नहीं होता, वे मुक्त हो जाते हैं।
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