भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

षष्ठ अध्याय ───:-:ஃ:-:─── परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रका सञ्चालन नन्वन्वे कालादयः कारणम् | किन्तु अन्य मतावलम्बी तो इति मन्यन्ते । तत्कथं पुनरी- कालादिको कारण मानते हैं, फिर श्वरस्य कलासर्गकरत्वमित्या- ईश्वर किस प्रकार कलाओंकी सृष्टि शङ्क्याह— करनेवाला हो सकता है?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ कोई बुद्धिमान् तो स्वभावको कारण बतलाते हैं और दूसरे कालको । किन्तु ये मोहग्रस्त हैं [ अतः ठीक नहीं जानते ] । यह भगवान्‌की महिमा ही है, जिससे लोकमें यह ब्रह्मचक्र¹ घूम रहा है ॥ १ ॥ स्वभावमिति । स्वभावमेके | 'स्वभावम्' इत्यादि । कोई कवयो मेधाविनो वदन्ति । कवि—मेधावी स्वभावको [ कारण ] कालं तथान्ये । कालस्वभावयो- बतलाते हैं तथा दूसरे कालको । र्ग्रहणं प्रथमाध्याये निर्दिष्टाना- यहाँ काल और स्वभावका ग्रहण प्रथम अध्यायमें बतलाये हुए अन्य १. ब्रह्मचक्र अर्थात् संसाररूपमें विवर्तित ब्रह्मरूप चक्र, जिसका वर्णन प्रथम अध्यायके चतुर्थ मन्त्रमें किया है ।