श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 234, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मन्येषामप्युपलक्षणार्थम् । परि- कारणोंको भी उपलक्षित करनेके लिये किया गया है । ये स्वभाव और मुह्यमाना अविवेकिनो विषया- कालवादी परिमुह्यमान—अविवेकी यानी विषयी होनेके कारण यथार्थ नहीं त्मानो न सम्यग्जानन्ति । तु- जानते । 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । शब्दोऽवधारणे । देवस्यैष महिमा यह तो देव ( परमेश्वर ) की महिमा है, जिससे यह ब्रह्मचक्र भ्रमित— माहात्म्यम् । येनेदं भ्राम्यते परिवर्तित होता है [ अर्थात् सब परिवर्तते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ ओर घूम रहा है ] ॥१॥ चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा महिमानं प्रपञ्चयति— उस महिमाका निरूपण करते हैं— येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥ जिसके द्वारा सर्वदा यह सब व्याप्त है तथा जो ज्ञानस्वरूप, काल- का भी कर्ता, निष्पापत्वादि गुणवान् और सर्वज्ञ है उसीसे प्रेरित होकर यह पृथिवी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाशरूप कर्म [ जगद्रूपसे ] विवर्तित होता है; [ अतः उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥२॥ येनेति । येनेश्वरेणावृतं व्याप्त- 'येन' इत्यादि । जिस ईश्वरके मिदं जगन्नित्यं नियमेन । ज्ञः द्वारा यह जगत् नित्य—नियमसे व्याप्त है, जो ज्ञानस्वरूप, कालकार कालकारः कालस्यापि कर्ता । —कालका भी कर्ता, गुणी—