भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१ गुण्यपहतपाप्मादिमान् । सर्वं | अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और वेत्तीति सर्वविद्यः। तेनेश्वरेणेशितं | सबको जाननेके कारण सर्वज्ञ है । प्रेरितं कर्म क्रियत इति कर्म | उस ईश्वरसे ईशित—प्रेरित कर्म । स्रजीव फणी । हशब्दः प्रसिद्धि- | जो किया जाता है उसे कर्म द्योतकः । प्रसिद्धं यदेतदीश्वर- | कहते हैं, 'ह' शब्द प्रसिद्धिका द्योतक प्रेरितं कर्म जगदात्मना विवर्तत | है । अर्थात् यह जो ईश्वरप्रेरित इति यत्पुनस्तत्कर्म पृथ्व्यप्तेजो- | प्रसिद्ध कर्म है वह मालामें सर्पके ऽनिलखानि पृथिव्यादिभूत- | समान जगद्रूपसे विवर्तित होता है । पञ्चकम् ॥ २ ॥ | और वह जो कर्म है सो पृथिवी, जल, | तेज, वायु और आकाशरूप है अर्थात् | पृथिवी आदि पञ्चभूत है ॥ २ ॥ यत्प्रथमाध्याये चिन्त्यमित्यु- | प्रथम अध्यायमें जिसे चिन्तनीय | बतलाया है उसीका निरूपण करते क्तम्, एतदेव प्रपञ्चयति— | हैं— तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूय- स्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥ उस कर्मको करके उसका निरीक्षण कर, फिर जो उस तत्त्वके साथ यानी एक, दो, तीन या आठ तत्त्वोंके साथ अथवा काल और अन्तःकरण- के सूक्ष्म गुणोंके साथ अपने [ सत्तारूप ] गुणका योग कराकर [ स्वयं स्थित रहता है उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥३॥ १ श्रीशंकरानन्दजीके मतानुसार एक तत्त्व अविद्या है, दो धर्म और अधर्म हैं, तीन सत्त्वादि त्रिगुण हैं और मन, बुद्धि तथा अहंकारके सहित पाँच भूत आठ तत्त्व हैं । भाष्यमें भी आठ तत्त्व तो ये ही माने गये हैं ।