भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 236

२२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

तदिति । तत्कर्म पृथिव्यादि | ‘तत्कर्म’ इत्यादि । उस पृथिवी सृष्ट्वा विनिवर्त्य प्रत्यवेक्षणं कृत्वा | आदिकर्मको रचकर उसका निरीक्षण भूयः पुनस्तस्यात्मनस्तत्त्वेन | कर फिर उस आत्माका पृथिवी आदि भूम्यादिना योगं समेत्य संग- | तत्त्वके साथ योग कराकर—यहाँ मय्य । णिलोपो द्रष्टव्यः । कति- | ( समेत्यमें ) प्रेरणार्थक ‘णिच्’ प्रत्ययका लोप समझना चाहिये । विधैः प्रकारैः । एकेन पृथिव्या | कितने प्रकारके तत्त्वोंके साथ ? द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा प्रकृति- | पृथिवीरूप एक तत्त्वके अथवा दो, भूतैस्तत्त्वैः । तदुक्तम्— | तीन या अष्टधा प्रकृतिरूप आठ भूमिरापोऽनलो वायुः | तत्त्वोंके साथ । इस विषयमें [गीतामें] खं मनो बुद्धिरेव च । | ऐसा कहा है—‘‘पृथिवी, जल, अहंकार इतीयं मे | अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ | और अहंकार—यह मेरी आठ ( गीता ७ । ४ ) | प्रकारकी विभिन्न प्रकृति है ।’’ इति । कालेन चैवात्मगुणै- | अथवा कालके और आत्मगुणोंके श्चान्तःकरणगुणैः कामादिभिः | यानी अन्तःकरणके कामादि सूक्ष्म सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥ | गुणोंके साथ ॥ ३ ॥ -------------------------•:-0-:•------------------------- भगवदर्पणकर्मसे भगवत्प्राप्ति इदानीं कर्मणां मुख्यं विनि- | अब श्रुति कर्मोंका मुख्य विनियोग योगं दर्शयति— | दिखलाती है— आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥

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