श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 237, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२३ जो पुरुष सत्त्वादि गुणमय कर्म आरम्भ कर उन्हें और समस्त भावोंको परमात्माके अर्पण कर देता है, उनके सम्बन्धका अभाव हो जानेसे उसके पूर्वकृत कर्मोंका नाश हो जाता है; और कर्मोंका क्षय हो जानेपर वह [ परमात्माको ] प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह तत्त्वतः उन [ पृथिवी आदि ] से अन्य है ॥ ४ ॥ आरम्येति । आरभ्य कृत्वा 'आरम्य' इत्यादि । गुण अर्थात् कर्माणि गुणैः सत्त्वादिभिरन्वि- सत्त्वादिसे युक्त कर्मोंको करके उन्हें तथा अपने अत्यन्त विशिष्ट भावोंको तानि भावांश्चात्यन्तविशेषान्वि- जो विनियुक्त करता है अर्थात् ईश्वरको समर्पित कर देता है, नियोजयेदीश्वरे समर्पयेद्यः । ईश्वरको समर्पित कर देनेसे उन तेषामीश्वरे समर्पितत्वादात्मसंब- कर्मोंका आत्मासे सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे पूर्वकृत न्धाभावस्तदभावे पूर्वकृतकर्मणां कर्मोंका नाश हो जाता है। नाशः । उक्तं च— कहा भी है— “यत्करोषि यदश्नासि “हे कुन्तीनन्दन ! तू जो यज्जुहोषि ददासि यत् । कुछ कर्म करता है, जो खाता है, जो श्रौत-स्मार्त यज्ञरूप हवन यत्तपस्यसि कौन्तेय करता है, जो देता है और जो तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ तप करता है वह सब मुझे अर्पण कर दे । इस प्रकार शुभाशुभफलैरेवं कर्मोंको मुझे समर्पण करके तू मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।” शुभाशुभ फलयुक्त कर्मबन्धनोंसे मुक्त ( गीता ९ । २७-२८ ) हो जायगा ।” “जो पुरुष “ब्रह्मण्याधाय कर्माणि कर्मोंको ब्रह्मार्पण करते हुए फलासक्ति सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ॥ त्यागकर कर्म करता है वह जलसे लिप्यते न स पापेन कमलके पत्तेके समान पापसे लिप्त पद्मपत्रमिवाम्भसा ।