श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 238, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ————————————————————————————————————————— कायेन मनसा बुद्ध्या | नहीं होता । योगिजन फलविषयक केवलैरिन्द्रियैरपि ॥ | आसक्ति त्यागकर केवल (ममता- योगिनः कर्म कुर्वन्ति | रहित) शरीर, मन, बुद्धि एवं सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥" | इन्द्रियोंसे ही चित्तशुद्धिके लिये (गीता ५ । १०, ११) | कर्म किया करते हैं" इत्यादि । इति । | कर्मक्षये विशुद्धसत्त्वो याति | कर्मका क्षय हो जानेसे वह तत्त्वतोऽन्यस्तत्त्वेभ्यः प्रकृति- | शुद्धचित्त हो तत्त्वतः प्रकृतिरूप भूतेभ्योऽन्योऽविद्यातत्कार्यविनि- | तत्त्वोंसे भिन्न होनेके कारण अविद्या र्मुक्तश्चित्सदानन्दाद्वितीयब्रह्मात्म- | और उसके कार्यसे छूटकर अपनेको त्वेनावगच्छतीत्यर्थः। अन्यदिति | सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे जानते पाठे तत्त्वेभ्यो यदन्यद्ब्रह्म तद्या- | हुए [परमात्माको] प्राप्त होता है। तीति ॥ ४ ॥ | जहाँ 'अन्यः' के स्थानमें 'अन्यत्' | पाठ हो वहाँ 'तत्त्वोंसे भिन्न जो ब्रह्म | है उसे प्राप्त होता है' ऐसा अर्थ | समझना चाहिये ॥ ४ ॥ ———❖————— उपासनासे भगवत्प्राप्ति उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्न उत्तरे | उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये मन्त्राः प्रस्तूयन्ते कथं नाम | आगेके मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं। विषयान्धा ब्रह्म जानीयुरित्यत | विषयान्ध पुरुष भी किसी प्रकार ब्रह्म- आह— | को जान जायें इस उद्देश्यसे श्रुति | कहती है— आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः । तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५ ॥