श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
पृष्ठ 239, कुल 276 में से
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अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५
वह सबका कारण, शरीरसंयोगकी निमित्तभूता अविद्याका हेतु,
त्रिकालातीत और कलाहीन देखा गया है। अपने अन्तःकरणमें स्थित उस
सर्वरूप एवं संसाररूप देवकी ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व उपासना कर [.उसे प्राप्त
हो जाता है ] ॥५॥
आदिरिति । आदिः कारणं | 'आदिः' इत्यादि । आदि—सबका
सर्वस्य, शरीरसंयोगनिमित्तानाम- | कारण; शरीरसंयोगकी निमित्तभूता
विद्यानां हेतुः । उक्तं च— | अविद्याका हेतु; कहा भी है—
"एष ह्यैवैतं साधु कर्म कारयति | "यही इससे शुभ कर्म कराता है, और
॰॰॰॰॰एष एवैनमसाधु कर्म | यही इससे अशुभ कर्म कराता है।" भूत,
कारयति च" (कौ० उ० ३।९) | भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंसे
इति । परस्त्रिकालादतीतानागत- | अतीत; जैसे कहा है—"जिसके
वर्तमानात् । उक्तं च—"यस्मा- | नीचे संवत्सर दिनोंके द्वारा परिवर्तित
दर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । | होता है, देवगण उसकी ज्योतियोंके
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्हो- | ज्योति, आयु और अमृतरूपसे
पासतेऽमृतम्" (बृ० उ० ४। | उपासना करते हैं।" क्यों त्रिकाला-
४।१६) इति। कस्मात् ? यस्माद्- | तीत है ?—क्योंकि यह अकल
कलोऽसौ न विद्यन्ते कलाः | है—इसके प्राणसे लेकर नामपर्यन्त
प्राणादिनामान्ता अस्येत्यकलः । | कलाएँ नहीं हैं, इसलिये यह अकल
कलावद्धि कालत्रयपरिच्छिन्न- | है । कलावान् पदार्थ ही तीनों
मुत्पद्यते विनश्यति च । अयं | कालोंसे परिच्छिन्न होनेके कारण
पुनरकलो निष्प्रपञ्चः । तस्मान्न | उत्पन्न और नष्ट होता है । किन्तु
कालत्रयपरिच्छिन्नः सन्नुत्पद्यते | यह तो अकल यानी निष्प्रपञ्च है,
विनश्यति च । तं विश्वानि रूपा- | इसलिये कालत्रयसे परिच्छिन्न न
ण्यस्येति विश्वरूपम् । भवत्य- | होनेके कारण उत्पन्न या नष्ट नहीं
| होता । उस विश्वरूप—जिसके
| विश्व (समस्त) रूप. हैं, भव—
| जिससे जगत् उत्पन्न होता है, भूत-