श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 240, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
स्मादिति भवः। भूतमवितथस्व- | सत्यस्वरूप, अपने चित्तमें स्थित, रूपम्। ईड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपा- | स्तुत्य देवको पूर्व—वाक्यार्थज्ञान | उदय होनेसे पहले उपासना कर स्यायमहमस्मीति समाधानं कृत्वा | अर्थात् 'यह मैं हूँ' इस प्रकार उसमें | चित्त समाहित कर [उसे प्राप्त हो पूर्वं वाक्यार्थज्ञानोदयात् ॥५॥ | जाता है] ॥५॥
ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति
पुनरपि तमेव दर्शयति— | फिर भी श्रुति उसे ही दिखलाती है—
स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥
वह, जिससे कि यह प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, वृक्षाकार और कालाकारसे अतीत तथा प्रपञ्चसे भिन्न है। धर्मकी प्राप्ति करानेवाले और पापका नाश करनेवाले उस ऐश्वर्यके अधिपति को जानकर [पुरुष] आत्मस्थ, अमृतस्वरूप और विश्वाधार [परमात्माको प्राप्त हो जाता है] ॥६॥
स वृक्षेति। स वृक्षाकारेभ्यः | 'स वृक्षः' इत्यादि। वह वृक्षा- कालाकारेभ्यः परो वृक्षकाला- | कार और कालाकारसे पर (उत्कृष्ट) कृतिभिः परः। वृक्षः संसार- | है, 'वृक्ष' शब्दसे यहाँ संसारवृक्ष वृक्षः। उक्तं च—"ऊर्ध्वमूलो | समझना चाहिये; कहा भी है— | "ऊपरकी ओर मूल और नीचेकी ओर ह्यवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सना- | शाखाओंवाला यह सनातन अश्वत्थ