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श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

२२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

स्मादिति भवः। भूतमवितथस्व- | सत्यस्वरूप, अपने चित्तमें स्थित, रूपम्। ईड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपा- | स्तुत्य देवको पूर्व—वाक्यार्थज्ञान | उदय होनेसे पहले उपासना कर स्यायमहमस्मीति समाधानं कृत्वा | अर्थात् 'यह मैं हूँ' इस प्रकार उसमें | चित्त समाहित कर [उसे प्राप्त हो पूर्वं वाक्यार्थज्ञानोदयात् ॥५॥ | जाता है] ॥५॥

ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति

पुनरपि तमेव दर्शयति— | फिर भी श्रुति उसे ही दिखलाती है—

स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥

वह, जिससे कि यह प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, वृक्षाकार और कालाकारसे अतीत तथा प्रपञ्चसे भिन्न है। धर्मकी प्राप्ति करानेवाले और पापका नाश करनेवाले उस ऐश्वर्यके अधिपति को जानकर [पुरुष] आत्मस्थ, अमृतस्वरूप और विश्वाधार [परमात्माको प्राप्त हो जाता है] ॥६॥

स वृक्षेति। स वृक्षाकारेभ्यः | 'स वृक्षः' इत्यादि। वह वृक्षा- कालाकारेभ्यः परो वृक्षकाला- | कार और कालाकारसे पर (उत्कृष्ट) कृतिभिः परः। वृक्षः संसार- | है, 'वृक्ष' शब्दसे यहाँ संसारवृक्ष वृक्षः। उक्तं च—"ऊर्ध्वमूलो | समझना चाहिये; कहा भी है— | "ऊपरकी ओर मूल और नीचेकी ओर ह्यवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सना- | शाखाओंवाला यह सनातन अश्वत्थ

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७


तनः" ( क० उ० २ । ३ । वृक्ष है" इत्यादि । अन्य अर्थात् १ ) इति । अन्यः प्रपञ्चा- प्रपञ्चसे असंस्पृष्ट है । जिस ईश्वरसे संस्पृष्ट इत्यर्थः । यस्मादीश्वरात् प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, धर्मकी प्राप्ति प्रपञ्चः परिवर्तते । धर्मावहं करानेवाले और पापका उच्छेद पापनुदं भगस्यैश्वर्यादीरीशं स्वामिनं करानेवाले उस भग यानी ऐश्वर्यादिके ज्ञात्वात्मस्थमात्मनि बुद्धौ स्थित- स्वामीको जानकर [पुरुष] आत्मस्थ- आत्मा यानी बुद्धिमें स्थित, अमृत- मममृतममरणधर्माणं विश्वधाम विश्व- अमरणधर्मा, विश्वधाम—विश्वके स्याधारभूतं याति । स तत्त्वतोऽन्य आधारभूत परमात्माको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि 'वह (जीव) इति सर्वत्र सम्बध्यते ॥ ६ ॥ पृथिवी आदि तत्त्वोंसे भिन्न है'—इस वाक्यका सबके साथ सम्बन्ध है ॥६॥


ज्ञानियोंके तत्त्वानुभवका उल्लेख इदानीं विद्वदनुभवं दर्शयन्नु- अब विद्वान्का अनुभव दिखलाते क्तमर्थं दृढीकरोति— हुए श्रुति उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करती है—

तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ता- द्विद्दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥

ईश्वरोंके परम महान् ईश्वर, देवताओंके परमदेव, पतियोंके परमपति, अव्यक्तादि परसे पर तथा विश्वके अधिपति उस स्तवनीय देवको हम जानते हैं ॥७॥

२२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६

२२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६

तमीश्वराणामिति । तमीश्वराणां | 'तमीश्वराणाम्' इत्यादि । उस वैवस्वतयमादीनां परमं महेश्वरं | वैवस्वत यमादि ईश्वरों (लोकपालों) तं देवतानामिन्द्रादीनां परमं च | के परम महेश्वर, इन्द्रादि देवताओंके दैवतं पतिं पतीनां प्रजापतीनां | परम देव, पतियों—प्रजापतियोंके परमं परस्तात्परतोऽक्षरात् । | परम पति, पर—अक्षरसे पर, वदाम देवं द्योतनात्मकं भुवना- | भुवनोंके ईश्वर, देव—द्योतनात्मक, नाधीशं भुवनेशम् । ईड्यं स्तु- | ईड्य-स्तुत्य [ परमात्माको ] हम त्यम् ॥७॥ | जानते हैं ॥७॥ —•••— परमेश्वरकी महत्ता कथं महेश्वरत्वम् ? इत्याह— | उसकी महेश्वरता किस प्रकार है, सो बतलाते हैं— न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥८॥ उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बढ़- कर भी कोई दिखायी नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और बलक्रिया है ॥८॥ न तस्येति । न तस्य कार्यं | 'न तस्य' इत्यादि । उसके शरीरं करणं चक्षुरादि विद्यते । न | कार्य—शरीर और करण—चक्षु आदि इन्द्रियाँ नहीं हैं । उसके तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते श्रूयते | समान और उससे बढ़कर भी कोई देखा या सुना नहीं जाता । उसकी वा । परास्य शक्तिर्विविधैव | पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९

श्रूयते । सा च स्वाभाविकी | है और वह स्वाभाविकी ज्ञानबल- ज्ञानबलक्रिया च ज्ञानक्रिया | क्रिया अर्थात् ज्ञानक्रिया और बल- बलक्रिया च । ज्ञानक्रिया सर्व- | क्रिया है । ज्ञानक्रिया—सम्पूर्ण विषयज्ञानप्रवृत्तिः । बलक्रिया | विषयोंके ज्ञानकी प्रवृत्ति और बल- स्वसंनिधिमात्रेण सर्वं वशीकृत्य | क्रिया—अपनी सन्निधिमात्रसे सबको नियमनम् ॥ ८ ॥ | वशमें करके नियमन करना ॥८॥

यस्मादेवं तस्मात्— | क्योंकि ऐसा है इसलिये— न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई शासक या उसका चिह्न ही है । वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ॥९॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके । | लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं अत एव न तस्येशिता नियन्ता । | है, अतः उसका कोई ईशिता— नैव च तस्य लिङ्गं चिह्नं धूम- | नियन्ता भी नहीं है । उसका कोई स्थानीयं येनानुमीयेत । स | लिङ्ग-धूमादिरूप चिह्न भी नहीं है, कारणं सर्वस्य कारणम् । करणा- | जिससे अनुमान किया जा सके । वह धिपाधिपः परमेश्वरः । यस्मादेवं | सबका कारण और करणाधिप—परमेश्वर तस्मान्न तस्य कश्चिज्जनिता | है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका जनयिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ | कोई जनिता—जनयिता अर्थात् उत्पत्ति- | कर्ता और स्वामी भी नहीं है ॥९॥

२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना इदानीं मन्त्रदृगभिप्रेतमर्थं | अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा [ ऋषियों ] प्रार्थयते— | के अभिमत पदार्थके लिये प्रार्थना | करती है— यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥१०॥ तन्तुओंसे मकड़ीके समान जिस एकमात्र देवने स्वभावतः ही प्रधान- जनित कार्योंसे अपनेको आवृत कर लिया है वह हमें ब्रह्मसे एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ यस्तन्तुनाभ इति । यथो- | ‘यस्तन्तुनाभः’ इत्यादि । जिस र्णनाभिरात्मप्रभवैस्तन्तुभिरात्मा- | प्रकार मकड़ी अपनेसे उत्पन्न हुए नमेव समावृणोति तथा प्रधान- | तन्तुओंसे अपनेहीको आवृत कर जैरव्यक्तप्रभवैर्नामरूपकर्मभिस्त- | लेती है उसी प्रकार प्रधानज अर्थात् न्तुस्थानीयैः स्वमात्मानमावृणोत् | अव्यक्तसे उत्पन्न हुए तन्तुरूप नाम, सञ्छादितवान्स नो महं ब्रह्मण्य- | रूप और कर्मोंसे जिसने अपनेको प्ययं ब्रह्माप्ययमेकीभावं दधाद्- | आच्छादित कर रखा है वह हमें ब्रह्ममें दात्वित्यर्थः ॥१०॥ | लय यानी एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश पुनरपि तमेव करतलन्यस्ता- | फिर भी हथेलीपर रखे हुए | आँवलेके समान उसीको साक्षात् मलकवत्साक्षाद्दर्शयंस्तद्विज्ञानादेव | रूपसे दिखाते हुए श्रुति दो मन्त्रोंद्वारा | इस बातको प्रदर्शित करती है कि परमपुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्श- | उसके विशेष ज्ञानसे ही परमपुरुषार्थकी यति मन्त्रद्वयेन— | प्राप्ति होती है, और किसीसे नहीं—

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ समस्त प्राणियोंमें स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करनेवाला, शुद्ध और निर्गुण है ॥११॥ एको देव इति । एको- | ‘एको देवः’ इत्यादि । सर्वभूतोंमें ऽद्वितीयो देवो द्योतनस्वभावः सर्व- | गूढ—समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ भूतेषु गूढः सर्वप्राणिषु संवृतः । | एक—अद्वितीय देव—प्रकाशनशील सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा स्व- | परमात्मा है । [ वह ] सर्वव्यापी, रूपभूत इत्यर्थः । कर्माध्यक्षः | सर्वभूतान्तरात्मा अर्थात् सबका स्वरूपभूत, कर्माध्यक्ष—समस्त सर्वप्राणिकृतविचित्रकर्माधिष्ठाता । | प्राणियोंके किये हुए विभिन्न कर्मोंका अधिष्ठाता, सर्वभूताधिवास सर्वभूताधिवासः सर्वप्राणिषु | अर्थात् समस्त प्राणियोंमें निवास करने- वसतीत्यर्थः । सर्वेषां भूतानां | वाला, समस्त भूतोंका साक्षी अर्थात् साक्षी सर्वद्रष्टा । “साक्षाद्द्रष्टरि | सर्वद्रष्टा है, क्योंकि “साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्” (पा० सू० ५।२।९१) | संज्ञायाम्” इस पाणिनिसूत्ररूप इति स्मरणात् । चेता चेतयिता । | स्मृतिके अनुसार ‘साक्षी’ शब्दका अर्थ द्रष्टा है । तथा वह चेता— केवलो निरुपाधिकः । निर्गुणः | चेतनत्व प्रदान करनेवाला, केवल— उपाधिशून्य और निर्गुण—सत्त्वादि सत्त्वादिगुणरहितः ॥११॥ | गुणरहित है ॥११॥

२३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ परमात्मज्ञानसे नित्यसुखकी प्राप्ति और मोक्ष एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ जो एक अद्वितीय स्वतन्त्र परमात्मा बहुत-से निष्क्रिय जीवोंके एक बीजको अनेक रूप कर देता है, अपने अन्तःकरणमें स्थित उस [ देव ] को जो मतिमान् देखते हैं उन्हें ही नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥१२॥ एको वशीति । एको वशी | 'एको वशी' इत्यादि । जो एक स्वतन्त्रो निष्क्रियाणां बहूनां | वशी—स्वतन्त्र परमात्मा बहुत-से जीवानाम् । सर्वा हि क्रिया | निष्क्रिय जीवोंके एक बीज—बीज- नात्मनि समवेताः किन्तु देहेन्द्रि- | स्थानीय भूतसूक्ष्मको अनेकरूप कर येषु । आत्मा तु निष्क्रियो | देता है उस आत्मस्थ—बुद्धिमें स्थित निर्गुणः सत्त्वादिगुणरहितः कूट- | [ देव ] को जो धीर—बुद्धिमान् स्थः सन्ननात्मधर्मानात्मन्यध्य- | देखते हैं—साक्षात्रूपसे जान लेते स्याभिमन्यते कर्ता भोक्ता सुखी | हैं उन आत्मवेत्ताओंको नित्य सुख दुःखी कृशः स्थूलो मनुष्योऽमुष्य | प्राप्त होता है, अन्य अनात्मज्ञोंको पुत्रोऽस्य नप्तेति । उक्तं च— | नहीं । [ यहाँ जीवोंको निष्क्रिय "प्रकृतेः क्रियमाणानि | इसलिये कहा है कि ] सारी गुणैः कर्माणि सर्वशः । | क्रियाओंका साक्षात् सम्बन्ध आत्मासे | नहीं, अपि तु देह और इन्द्रियोंसे | है । आत्मा तो निष्क्रिय, निर्गुण | अर्थात् सत्त्वादि गुणोंसे रहित और | कूटस्थ होते हुए अपनेमें अनात्म-

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३

अहंकारविमूढात्मा | धर्मोंका अध्यास करके ऐसा अभिमान कर्ताहमिति मन्यते ॥ | करने लगता है कि मैं कर्ता, भोक्ता, तत्त्ववित्तु महाबाहो | सुखी, दुःखी, कृश, स्थूल, मनुष्य, गुणकर्मविभागयोः । | अमुकका पुत्र अथवा इसका नाती गुणा गुणेषु वर्तन्त | हूँ इत्यादि । कहा भी है—"[ हे इति मत्वा न सज्जते ॥ | अर्जुन ! ] सारे कर्म प्रकृतिके गुणों- प्रकृतेर्गुणसंमूढाः | द्वारा किये जाते हैं; अहङ्कारसे सज्जन्ते गुणकर्मसु ।" | मोहित हुए पुरुष ऐसा मानने लगते (गीता ३ । २७-२९) | हैं कि 'मैं कर्ता हूँ' । किन्तु हे इति । | महाबाहो ! जो गुण और कर्मके एकं बीजं बीजस्थानीयं भूत- | विभागका मर्मज्ञ है वह तो 'गुण सूक्ष्मं बहुधा यः करोति तमा- | गुणोंमें बर्त रहे हैं' ऐसा मानकर त्मस्थं बुद्धौ स्थितं येऽनुपश्यन्ति | उनमें आसक्त नहीं होता, जो लोग साक्षाज्जानन्ति धीरा बुद्धिमन्त- | प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हैं वे ही स्तेषामात्मविदां सुखं शाश्वतं | उन गुण और कर्मोंमें आसक्त होते नेतरेषामनात्मविदाम् ॥१२॥ | हैं " इत्यादि ॥१२॥

किञ्च— | तथा— नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ जो नित्योंमें नित्य, चेतनोंमें चेतन और अकेला ही बहुतोंको भोग प्रदान करता है, सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य उस सर्वकारण देवको जानकर [ पुरुष ] समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१३॥

२३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ नित्य इति । नित्यो नित्या- | 'नित्यः' इत्यादि । नित्य जीवोंके नां जीवानां मध्ये तन्नि- | मध्यमें जो नित्य है, अभिप्राय यह त्यत्वेन तेषामपि नित्यत्वमित्य- | कि उसके नित्यत्वसे ही उनका भी भिप्रायः । अथवा पृथिव्यादीनां | नित्यत्व है, अथवा पृथिवी आदि मध्ये । तथा चेतनश्चेतनानां | नित्योंमें जो नित्य है, तथा चेतन प्रमातॄणां मध्ये । एको बहूनां | प्रमाताओंमें जो चेतन है; जो जीवानां यो विदधाति प्रयच्छति | अकेला ही बहुत-से जीवोंके काम— कामान्कामनिमित्तान्भोगान् । | कामनिमित्तक भोगोंका विधान यानी सर्वस्य सांख्ययोगाधिगम्यं | दान करता है और सबके लिये ज्ञात्वा देवं ज्योतिर्मयं मुच्यते | सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य है, उस देव- सर्वपाशैर्विद्यादिभिः ॥१३॥ | प्रकाशस्वरूपको जानकर [ पुरुष ] | समस्त पाशोंसे अर्थात् अविद्यादिसे | मुक्त हो जाता है ॥१३॥ ब्रह्मके प्रकाशसे ही सबको प्रकाशकी प्राप्ति कथं चेतनश्चेतनानाम् ? । | वह चेतनोंमें चेतन किस प्रकार इत्युच्यते— | है ? सो बतलाया जाता है— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥ वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और तारे प्रकाशित होते हैं और न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह अग्नि तो कहाँ प्रकाशित हो सकता है ? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं, उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशित हैं ॥१४॥

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५ न तत्रेति । तत्र तस्मिन्पर- | 'न तत्र' इत्यादि । वहाँ—उस मात्मनि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो | परमात्मामें, सबका प्रकाशक होनेपर न भाति ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। | भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता; अर्थात् स हि तस्यैव भासा सर्वात्मनो | यह ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । रूपजातं प्रकाशयति । न तु तस्य | अपि तु वह उस सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाश- स्वतःप्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा | से ही सब रूपोंको प्रकाशित करता है; न चन्द्रतारकम् । नेमा विद्युतो | क्योंकि उसमें स्वयं प्रकाशित करने- भान्ति। कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः। | का सामर्थ्य नहीं है । तथा न चन्द्र किं बहुना यदिदं जगद्भाति | और तारे, एवं न विद्युत् ही वहाँ तमेव स्वतो भारूपत्वाद्भान्तं | प्रकाशित होते हैं । फिर हमें दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । | दिखायी देनेवाला यह अग्नि तो यथा लोहादि वह्निं दहन्तमनु- | प्रकाशित हो ही कैसे सकता है ? दहति न स्वतः । तस्यैव भासा | अधिक क्या, यह जो जगत् भास रहा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि भाति । | है, स्वतःप्रकाशरूप होनेके कारण उक्तं च—"येन सूर्यस्तपति तेज- | उस परमात्माके प्रकाशित होनेसे ही सेद्धः ", "न तद्भासयते सूर्यो न | प्रकाशित हो रहा है, जिस प्रकार शशाङ्को न पावकः ।” ( गीता १५। | लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अग्नि- ६ ) इति ॥ १४ ॥ | के साथ ही [ उसीकी शक्तिसे ] | जलाते हैं स्वतः नहीं । ये सब | सूर्यादि उसके ही प्रकाश यानी | दीप्तिसे प्रकाशित होते हैं । कहा | भी है “जिसके तेजसे युक्त होकर | सूर्य तपता है", "उसे न सूर्य | प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और | न अग्नि ही" इत्यादि ॥१४॥

२३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध ज्ञात्वा देवं मुच्यत इत्युक्तम् । ऊपर यह कहा है कि उस देवको जानकर मुक्त हो जाता है; कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वा मुच्यते अब यह बतलाते हैं कि उसीको जानकर क्यों मुक्त होता है, किसी नान्येनेत्यत्राह— और कारणसे क्यों नहीं होता ? एको हꣳसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ इस भुवनके मध्य एक हंस है वही जलमें (पञ्चमाहुतिरूप देहमें) स्थित अग्नि है। उसीको जानकर पुरुष मृत्युके पार हो जाता है। इससे भिन्न मोक्षप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ एक इति । एकः परमात्मा ‘एको’ इत्यादि । एक परमात्मा, हन्त्यविद्यादिबन्धकारणमिति जो अविद्यादि बन्धनके कारणका हनन हंसो भुवनस्यास्य त्रैलोक्यस्य करता है इसलिये हंस है, इस भुवन —त्रिलोकीके मध्यमें स्थित है, और मध्ये नान्यः कश्चित् । कस्मात् ? कोई नहीं । क्यों नहीं है ? क्योंकि यस्मात्स एवाग्निः । अग्निरिवा- वही अग्नि है—अविद्या और उसके ग्निरविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । कार्यका दाह करनेवाला होनेसे वह उक्तं च—“व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः” अग्निके समान अग्नि है । कहा भी इति । सलिले देहात्मना परिणते । है—“ईश्वर आकाशातीत अग्नि है” इत्यादि । सलिलमें अर्थात् देहरूपमें उक्तं च—“इति तु पञ्चम्यामाहु- परिणत हुए जलमें, जैसे कहा है— “इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें आप

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७ तावापः पुरुषवचसो भवन्ति" (जल) पुरुष नामवाला हो जाता है।" (छा० उ० ५।९।१) इति। सन्निविष्ट—आत्मभावसे सम्यग्रूपसे संनिविष्टः सम्यगात्मत्वेन नि- स्थित है। अथवा 'सलिले'—यज्ञ- विष्टः। अथवा सलिले सलिल दानादिद्वारा सलिल (जल) के इव स्वच्छे यज्ञदानादिना समान स्वच्छ किये अन्तःकरणमें विमलीकृतेऽन्तःकरणे संनिविष्टो स्थित वेदान्तवाक्यार्थके सम्यग्ज्ञानके वेदान्तवाक्यार्थसम्यग्ज्ञानफलका- फलरूपसे अविद्या और उसके कार्य- रूढोऽविद्यातत्कार्यस्य दाहक का दाह करनेवाला [ अग्नि ]—ऐसा इत्यर्थः। तस्मात्तमेव विदित्वाति भी अर्थ हो सकता है। अतः उसी- मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते- को जानकर पुरुष मृत्युके पार हो ऽयनाय ॥१५॥ जाता है, मोक्षके लिये कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन परमपदप्राप्तये पुनरपि तमेव परमपदकी प्राप्तिके लिये श्रुति विशेषतो दर्शयति— फिर भी उसीको विशेषरूपसे प्रदर्शित करती है— स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनि- र्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥ वह विश्वका कर्ता, विश्ववेत्ता, आत्मयोनि (स्वयम्भू), ज्ञाता, कालका प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है। तथा वही प्रधान और पुरुषका अध्यक्ष, गुणोंका नियामक एवं संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है ॥१६॥

२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 स विश्वकृदिति। स विश्वकृद्वि- | 'स विश्वकृत्' इत्यादि । वह श्वस्य कर्ता । विश्वं वेत्तीति विश्व- | विश्वकृत्-विश्वका कर्ता है, विश्वको वित् । आत्मा चासौ योनिश्चेत्यात्म- | जानता है-इसलिये विश्ववेत्ता है, योनिः । जानातीति ज्ञः । सर्व- | आत्मा और योनि है इसलिये आत्म- स्यात्मा सर्वस्य च योनिः सर्वज्ञ- | योनि है, जानता है इसलिये ज्ञ है। श्चैतन्यज्योतिरित्यर्थः । कालकारः | तात्पर्य यह है कि वह सबका आत्मा, कालस्य कर्ता गुण्यपहतपाप्मादि- | सबका योनि (उत्पत्तिस्थान) और मान्विश्वविदित्स्य प्रपञ्चः । | सर्वज्ञ अर्थात् चैतन्यज्योति है । प्रधानमव्यक्तम् । क्षेत्रज्ञो विज्ञा- | तथा कालकार-कालका कर्ता और नात्मा । तयोः पतिः पालयिता । | गुणी--अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् गुणानां सत्त्वरजस्तमसामीशः । | है। यह सब 'विश्ववित्' इस संसारमोक्षस्थितिबन्धानां हेतुः | विशेषणका विस्तार है। [इसके कारणम् ॥१६॥ | सिवा] वही प्रधान-अव्यक्त और | क्षेत्रज्ञ-विज्ञानात्मा, इन दोनोंका | पति-पालन करनेवाला, सत्त्व, रज, | तम इन तीनों गुणोंका नियामक तथा | संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका | हेतु यानी कारण है ॥१६॥ किञ्च— | तथा— स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता । य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ वह तन्मय (जगद्रूप अथवा ज्योतिर्मय), अमरणधर्मा, ईश्वरलूपसे स्थित, ज्ञाता, सर्वगत और इस भुवनका रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत्‌का

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ शासन करता है; क्योंकि इसका शासन करनेके लिये कोई और समर्थ नहीं है ॥ १७॥ स तन्मय इति । स तन्मयो | ‘स तन्मयो’ इत्यादि । वह विश्वात्मा । अथवा तन्मयो | तन्मय अर्थात् विश्वरूप है । अथवा ज्योतिर्मय इति ‘तस्य भासा | ‘उसके प्रकाशसे वह सब प्रकाशित सर्वमिदं विभाति’ इत्येतदपेक्ष्यो- | है’ इस उक्तिकी अपेक्षासे ‘तन्मय’ च्यते । अमृतोऽमरणधर्मा । ईशे | शब्दसे ज्योतिर्मय भी कहा जा स्वामिनि सम्यक्स्थितिर्यस्यासा- | सकता है । अमृत–अमरणधर्मा, वीशसंस्थः । जानातीति ज्ञः । | ईश यानी ईश्वरभावमें जिसकी सम्यक् सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः । | स्थिति है अतः वह ईशसंस्थ है, भुवनस्यास्य गोप्ता पालयिता । | जानता है इसलिये ज्ञ है, सर्वत्र जाता है य ईश ईष्टेऽस्य जगतो नित्य- | इसलिये सर्वग है, इस भुवनका गोप्ता मेव नियमेन नान्यो हेतुः समर्थो | यानी पालनकर्ता है, जो इस जगत्- विद्यत ईशनाय जगदीशनाय | को नित्य–नियमसे शासित करता ॥१७॥ | है, क्योंकि जगत्के शासनके लिये कोई और हेतु–समर्थ नहीं है॥१७॥ मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश यस्मात्स एव संसारमोक्ष- | क्योंकि वही संसारके मोक्ष, स्थितिबन्धहेतुस्तस्मात्तमेव मुमुक्षुः | स्थिति और बन्धनका हेतु है इसलिये सर्वात्मना शरणं प्रपद्येत गच्छे- | मुमुक्षु पुरुषको सब प्रकार उसीकी दिति प्रतिपादयितुमाह— | शरणमें जाना चाहिये—यह प्रति- पादन करनेके लिये श्रुति कहती है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ १८॥

२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ जो सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसके लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है, अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ॥१८॥

यो ब्रह्माणमिति । यो ब्रह्माणं | 'यो ब्रह्माणम्' इत्यादि । जिसने हिरण्यगर्भं विदधाति सृष्टवान्पूर्वं | पहले अर्थात् सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्मा- सर्गादौ । यो वै वेदांश्च प्रहिणोति | हिरण्यगर्भको रचा है और जो उसके तस्मै । तं ह हशब्दोऽवधारणे । | लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है । 'तं तमेव परमात्मानम् । उक्तं च— | ह' यहाँ 'ह' शब्द निश्चयार्थक है, “तमेव धीरो विज्ञाय | अर्थात् उसी परमात्माको । कहा भी प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । | है—"बुद्धिमान् ब्रह्मवेत्ता उसीको नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दा- | जानकर उसीमें मनोनिवेश करे, न्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥” | बहुत-से शब्दों—शास्त्रोंको न पढ़े, (बृ० उ० ४।४।२१) | क्योंकि वह तो वाणीको पीडित “तमेवैकं जानथात्मानम्” | करना ही है” तथा “उसी एक (मु० उ० २।२।५) इति | आत्माको जानो” इत्यादि । देव— च। देवं ज्योतिर्मयम् । आत्मनि | ज्योतिर्मय । अपनेमें जो बुद्धि है या बुद्धिस्तस्याः प्रसादकरम् । | उसका प्रसाद (विकास) करनेवाले, प्रसन्न हि परमेश्वरे बुद्धिरपि | क्योंकि परमेश्वरके प्रसन्न होनेपर तद्विषया प्रमा निष्प्रपञ्चाकार- | बुद्धि यानी परमेश्वरविषयिणी प्रमा ब्रह्मात्मनावतिष्ठते वर्तते। आत्म- | भी निष्प्रपञ्च ब्रह्माकारसे स्थित हो बुद्धिप्रकाशमित्यन्येऽधीयते । | जाती है । दूसरे लोग यहाँ 'आत्म- आत्मबुद्धिं प्रकाशयतीत्यात्मबुद्धि- | बुद्धिप्रकाशम्' ऐसा पाठ मानते प्रकाशम् । अथवात्मैव बुद्धि- | हैं । [ तब यह अर्थ होगा-] | अपनी बुद्धिको प्रकाशित करता | है इसलिये जो आत्मबुद्धिप्रकाश | है; अथवा आत्मा ही बुद्धि है,

१. यह व्याख्या ‘आत्मबुद्धिप्रसादं' पाठ मानकर की गयी है ।

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ रात्मबुद्धिः सैव प्रकाशोऽस्येत्या- | वही जिसका प्रकाश है उस आत्म- त्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै वैशब्दो- | बुद्धिप्रकाशकी मैं मुमुक्षु—यहाँ 'वै' ऽवधारणे मुमुक्षुरेव सन्न फलान्तर- | शब्द निश्चयार्थक है [ अतः तात्पर्य | यह है कि ] मुमुक्षु होकर ही शरण मिच्छञ्छरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ | लेता हूँ, किसी अन्य फलकी इच्छा | करता हुआ नहीं ॥ १८ ॥ ───◇:❖:◇─── एवं तावत्सृष्ट्यादिना यल्ल- | इस प्रकार यहाँतक सृष्टि आदि क्ष्यं स्वरूपं दर्शितम्, अथेदानिं | कार्यसे लक्षित होनेवाले जिस स्वरूप- तत्स्वरूपेण दर्शयति— | का वर्णन किया है उसीको अब | साक्षात्स्वरूपसे प्रदर्शित करते हैं— निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥ जो कलाहीन, क्रियाहीन, शान्त, अनिन्द्य, निर्लेप, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईंधन जल चुका है उस [ धूमादिशून्य ] अग्निके समान [ देदीप्यमान ] है [ उस देवकी मैं शरण लेता हूँ ] ॥१९॥ निष्कलमिति। कला अवयवा | 'निष्कलम्' इत्यादि । जिससे निर्गता यस्मात्तं निष्कलं निर- | कला यानी अवयव निकल गये हैं वयवमित्यर्थः । निष्क्रियं स्वमहि- | उस निष्कल अर्थात् निरवयव, मप्रतिष्ठितं कूटस्थमित्यर्थः । | निष्क्रिय—अपनी महिमामें स्थित शान्तमुपसंहृतसर्वविकारम् । निर- | अर्थात् कूटस्थ, शान्त—जिसके वद्यमगहंणीयम् । निरञ्जनं निर्ले- | सब विकारोंका अन्त हो गया है, पम् । अमृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य | निरवद्य—अनिन्द्य, निरञ्जन—निर्लेप, | अमृत यानी अमृतत्व—मोक्षकी प्राप्ति-

२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहो- | के लिये जो सेतुके समान सेतु है, | क्योंकि वह संसार-सागरसे पार दधेरुत्तारणोपायत्वात्तम् अमृ- | होनेका साधन है, उस अमृतत्वके | परमसेतु तथा जिसका ईंधन जल तस्य परं सेतुं दग्धेन्धनानलमिव | गया है उस अग्निके समान देदीप्य- | मान—जगमगाते हुए [ देवकी मैं देदीप्यमानं झटझटायमानम्॥१९॥ | शरण लेता हूँ ] ॥१९॥ -----------------------------०-०----------------------------- परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता किमिति तमेव विदित्वा | तो क्या उसीको जानकर पुरुष मुच्यते नान्येन ? इति तत्राह— | मुक्त होता है किसी और साधनसे | नहीं ? इसपर कहते हैं— यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥ जिस समय लोग चमड़ेके समान आकाशको लपेट लेंगे उस समय उस देवको न जानकर भी दुःखका अन्त हो जायगा*॥२०॥ यदेति । यदा यद्वच्चर्म सङ्को- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय, चयिष्यति तद्वदाकाशममूर्त्तं व्या- | जैसे कोई [फैले हुए] चमड़ेको लपेट पिनं यदि वेष्टयिष्यन्ति संवेष्टयि- | ले उसी प्रकार यदि अमूर्त और व्यापक ष्यन्ति मानवास्तदा देवं ज्योति- | आकाशको भी मनुष्य सम्यक् र्मयमनुदितानस्तमितज्ञानात्मना- | प्रकारसे लपेट लें, उस समय देव | यानी ज्योतिर्मय—उदय-अस्तसे


  • तात्पर्य यह है कि परमात्माको बिना जाने दुःखका अन्त होना ऐसा ही असम्भव है जैसा कि विभु और अमूर्त आकाशको परिच्छिन्न एवं मूर्त्तस्वरूप चर्मके समान लपेटना ।

[अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३

[अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३


वस्थितमशनायाद्यसंस्पृष्टं परमा- | रहित ज्ञानस्वरूपसे स्थित क्षुधादिसे त्मानमविज्ञाय दुःखस्याध्यात्मि- | असंस्पृष्ट परमात्माको बिना जाने भी कस्याधिभौतिकस्याधिदैविकस्या- | आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधि- न्तो विनाशो भविष्यति । आत्मा- | दैविक दुःखका अन्त—विनाश हो ज्ञाननिमित्तत्वात्संसारस्य । | जायगा; क्योंकि आत्माके अज्ञानसे | ही संसारकी स्थिति है। यावत्परमात्मानमात्मत्वेन न | तात्पर्य यह है कि जबतक पुरुष जानाति तावत्तापत्रयाभिभूतो | परमात्माको आत्मस्वरूपसे नहीं | जानता तबतक वह अजन्मा होनेपर मकरादिभिरिव रागादिभिरि- | भी तापत्रयसे अभिभूत हो मकरादि- तस्ततः कृष्यमाणः प्रेततिर्यङ्मनु- | के समान रागादिद्वारा इधर-उधर ष्यादियोनिष्वज एव जीवभाव- | खींचा जाता हुआ प्रेत, तिर्यक् एवं मापन्नो मोमुह्यमानः संसरति । | मनुष्यादि योनियोंमें जीवभावको प्राप्त यदा पुनरपूर्वमनपरं नेति नेती- | हो अत्यन्त मोहवश संसारमें भटकता त्यादिलक्षणमशनायाद्यसंस्पृष्टमनु- | रहता है। किन्तु जिस समय वह दितानस्तमितज्ञानात्मनावस्थितं | कारण-कार्यभावसे रहित, नेति-नेति पूर्णानन्दं परमात्मानमात्मत्वेन | आदि वाक्यद्वारा लक्षित, क्षुधादिसे | असंस्पृष्ट, उदय-अस्तसे रहित ज्ञान- साक्षाज्जानाति तदा निरस्ताज्ञान- | स्वरूपसे स्थित पूर्णानन्दमय परमात्मा- तत्कार्यः पूर्णानन्दो भवतीत्यर्थः । | को साक्षात् आत्मस्वरूपसे जानता उक्तं च— | है उस समय अज्ञान और उसके “अज्ञानेनावृतं ज्ञानं | कार्यसे छूटकर पूर्णानन्दमय हो तेन मुह्यन्ति जन्तवः । | जाता है। कहा भी है— ज्ञानेन तु तदज्ञानं | “ज्ञान अज्ञानसे ढका हुआ है, येषां नाशितमात्मनः ॥ | इसीसे जीव मोहमें पड़ते हैं। | जिन्होंने ज्ञानके द्वारा अपने अज्ञान- | को नष्ट कर दिया है उनके प्रति वह

२४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६

२४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ तेषामादित्यवज्ज्ञानं ज्ञान [ समस्त रूपमात्रको प्रकाशित करनेवाले ] सूर्यके समान उस ज्ञेय प्रकाशयति तत्परम् । परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता तद्बुद्धयस्तदात्मान- है । उस परमज्ञानमें ही जिनकी बुद्धि लगी हुई है, वह ज्ञानस्वरूप स्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ॥ परब्रह्म ही जिनका आत्मा है, उस ब्रह्ममें जिनकी दृढ निष्ठा है और गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं जो उसीके परायण [ अर्थात् आत्म- ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥” रति ] हैं वे ज्ञानद्वारा समस्त दोषोंसे ( गीता ५ । १५-१७ ) मुक्त हो अपुनरावृत्तिको प्राप्त हो ॥ २० ॥ जाते हैं” ॥२०॥ श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी सम्प्रदायपरम्परया ब्रह्मविद्याया सम्प्रदायपरम्पराके द्वारा ब्रह्म- विद्याका मोक्षप्रदत्व प्रदर्शित करनेके मोक्षप्रदत्वं प्रदर्शयितुं सम्प्रदायं लिये श्रुति इसके सम्प्रदाय और इस विद्याके अधिकारीको प्रदर्शित विद्याधिकारिणं च दर्शयति— करती है— तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् । अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥ श्वेताश्वतर ऋषिने तपोबल और परमात्माकी प्रसन्नतासे उस प्रसिद्ध ब्रह्मको जाना और ऋषिसमुदायसे सेवित इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका सम्यक् प्रकारसे परमहंस संन्यासियोंको उपदेश किया ॥२१॥

अध्याय ६ ]

अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५


[वाम स्तम्भ / Left Column]

तपःप्रभावादिति । तपसः कृच्छ्रचान्द्रायणादिलक्षणस्य, तत्र तपःशब्दस्य रूढत्वात् । नित्या- दीनां विधिवदनुष्ठितानां कर्मणा- मुपलक्षणमिदम् । “मनसश्चे- न्द्रियाणां च ह्येकाग्र्यं परमं तपः” इति स्मरणात् । तस्य च सर्वस्य तपसस्तस्मिञ्श्वेता- श्वतरे नियमेन सत्त्वात्तत्प्रभावा- त्तत्सामर्थ्याद्देवप्रसादाच्च कैवल्य- मुद्दिश्य तदधिकारसिद्धये बहु- जन्मसु सम्यगाराधितपरमेश्वरस्य प्रसादाच्च ब्रह्मापरिच्छिन्नमह- त्त्वम् । ह इति प्रसिद्धद्योतनार्थः । श्वेताश्वतरो नाम ऋषिर्विद्वान्य- थोक्तं ब्रह्म परम्पराप्राप्तं गुरु- मुखाच्छ्रुत्वा मनननिदिध्यास- नादरनैरन्तर्यसत्कारादिभिर्ब्रह्माह- मस्मीत्यपरोक्षीकृताखण्डसाक्षा- त्कारवान् ।


[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]

‘तपःप्रभावात्’ इत्यादि । ‘तपसः’ अर्थात् कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके [ प्रभावसे ], क्योंकि उसीमें ‘तप’ शब्द रूढ है । यह विधिवत् अनुष्ठान किये हुए नित्यादि कर्मोंका उपलक्षण है, क्योंकि “मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है” ऐसा स्मृतिवाक्य है । वह सम्पूर्ण तप श्वेताश्वतर ऋषिमें नियमसे होनेके कारण उसके प्रभाव यानी सामर्थ्यसे तथा भगवान्‌की कृपासे—कैवल्य- पदके उद्देश्यसे उसका अधिकार प्राप्त करनेके लिये अनेकों जन्म- पर्यन्त सम्यक् प्रकारसे आराधना किये हुए परमेश्वरकी प्रसन्नता- से जिसकी महिमाकी कोई सीमा नहीं है, उस ब्रह्मको—यहाँ ‘ह’ शब्द प्रसिद्धिका द्योतक है--श्वेता- श्वतरनामक ऋषिने जाना अर्थात् यथावत्रूपसे वर्णन किये हुए परम्परागत ब्रह्मतत्त्वको गुरुदेवके मुखसे श्रवण कर मनन, निदिध्यासन, आदर ( श्रद्धा ), निरन्तर अभ्यास एवं सत्कारादिके द्वारा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार अपरोक्ष किया अर्थात् अखण्ड- वृत्तिसे उसका साक्षात्कार किया ।