श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२३४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ नित्य इति । नित्यो नित्या- | 'नित्यः' इत्यादि । नित्य जीवोंके नां जीवानां मध्ये तन्नि- | मध्यमें जो नित्य है, अभिप्राय यह त्यत्वेन तेषामपि नित्यत्वमित्य- | कि उसके नित्यत्वसे ही उनका भी भिप्रायः । अथवा पृथिव्यादीनां | नित्यत्व है, अथवा पृथिवी आदि मध्ये । तथा चेतनश्चेतनानां | नित्योंमें जो नित्य है, तथा चेतन प्रमातॄणां मध्ये । एको बहूनां | प्रमाताओंमें जो चेतन है; जो जीवानां यो विदधाति प्रयच्छति | अकेला ही बहुत-से जीवोंके काम— कामान्कामनिमित्तान्भोगान् । | कामनिमित्तक भोगोंका विधान यानी सर्वस्य सांख्ययोगाधिगम्यं | दान करता है और सबके लिये ज्ञात्वा देवं ज्योतिर्मयं मुच्यते | सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य है, उस देव- सर्वपाशैर्विद्यादिभिः ॥१३॥ | प्रकाशस्वरूपको जानकर [ पुरुष ] | समस्त पाशोंसे अर्थात् अविद्यादिसे | मुक्त हो जाता है ॥१३॥ ब्रह्मके प्रकाशसे ही सबको प्रकाशकी प्राप्ति कथं चेतनश्चेतनानाम् ? । | वह चेतनोंमें चेतन किस प्रकार इत्युच्यते— | है ? सो बतलाया जाता है— न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥ वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, न चन्द्र और तारे प्रकाशित होते हैं और न ये बिजलियाँ ही चमकती हैं, फिर यह अग्नि तो कहाँ प्रकाशित हो सकता है ? ये सब उसके प्रकाशित होनेसे ही प्रकाशित होते हैं, उसीके प्रकाशसे ये सब प्रकाशित हैं ॥१४॥