श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ
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अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३३
अहंकारविमूढात्मा | धर्मोंका अध्यास करके ऐसा अभिमान कर्ताहमिति मन्यते ॥ | करने लगता है कि मैं कर्ता, भोक्ता, तत्त्ववित्तु महाबाहो | सुखी, दुःखी, कृश, स्थूल, मनुष्य, गुणकर्मविभागयोः । | अमुकका पुत्र अथवा इसका नाती गुणा गुणेषु वर्तन्त | हूँ इत्यादि । कहा भी है—"[ हे इति मत्वा न सज्जते ॥ | अर्जुन ! ] सारे कर्म प्रकृतिके गुणों- प्रकृतेर्गुणसंमूढाः | द्वारा किये जाते हैं; अहङ्कारसे सज्जन्ते गुणकर्मसु ।" | मोहित हुए पुरुष ऐसा मानने लगते (गीता ३ । २७-२९) | हैं कि 'मैं कर्ता हूँ' । किन्तु हे इति । | महाबाहो ! जो गुण और कर्मके एकं बीजं बीजस्थानीयं भूत- | विभागका मर्मज्ञ है वह तो 'गुण सूक्ष्मं बहुधा यः करोति तमा- | गुणोंमें बर्त रहे हैं' ऐसा मानकर त्मस्थं बुद्धौ स्थितं येऽनुपश्यन्ति | उनमें आसक्त नहीं होता, जो लोग साक्षाज्जानन्ति धीरा बुद्धिमन्त- | प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हैं वे ही स्तेषामात्मविदां सुखं शाश्वतं | उन गुण और कर्मोंमें आसक्त होते नेतरेषामनात्मविदाम् ॥१२॥ | हैं " इत्यादि ॥१२॥
किञ्च— | तथा— नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनाना- मेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ जो नित्योंमें नित्य, चेतनोंमें चेतन और अकेला ही बहुतोंको भोग प्रदान करता है, सांख्ययोगद्वारा ज्ञातव्य उस सर्वकारण देवको जानकर [ पुरुष ] समस्त बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१३॥