भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 246

२३२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ परमात्मज्ञानसे नित्यसुखकी प्राप्ति और मोक्ष एको वशी निष्क्रियाणां बहूना- मेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरा- स्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ जो एक अद्वितीय स्वतन्त्र परमात्मा बहुत-से निष्क्रिय जीवोंके एक बीजको अनेक रूप कर देता है, अपने अन्तःकरणमें स्थित उस [ देव ] को जो मतिमान् देखते हैं उन्हें ही नित्यसुख प्राप्त होता है, औरोंको नहीं ॥१२॥ एको वशीति । एको वशी | 'एको वशी' इत्यादि । जो एक स्वतन्त्रो निष्क्रियाणां बहूनां | वशी—स्वतन्त्र परमात्मा बहुत-से जीवानाम् । सर्वा हि क्रिया | निष्क्रिय जीवोंके एक बीज—बीज- नात्मनि समवेताः किन्तु देहेन्द्रि- | स्थानीय भूतसूक्ष्मको अनेकरूप कर येषु । आत्मा तु निष्क्रियो | देता है उस आत्मस्थ—बुद्धिमें स्थित निर्गुणः सत्त्वादिगुणरहितः कूट- | [ देव ] को जो धीर—बुद्धिमान् स्थः सन्ननात्मधर्मानात्मन्यध्य- | देखते हैं—साक्षात्रूपसे जान लेते स्याभिमन्यते कर्ता भोक्ता सुखी | हैं उन आत्मवेत्ताओंको नित्य सुख दुःखी कृशः स्थूलो मनुष्योऽमुष्य | प्राप्त होता है, अन्य अनात्मज्ञोंको पुत्रोऽस्य नप्तेति । उक्तं च— | नहीं । [ यहाँ जीवोंको निष्क्रिय "प्रकृतेः क्रियमाणानि | इसलिये कहा है कि ] सारी गुणैः कर्माणि सर्वशः । | क्रियाओंका साक्षात् सम्बन्ध आत्मासे | नहीं, अपि तु देह और इन्द्रियोंसे | है । आत्मा तो निष्क्रिय, निर्गुण | अर्थात् सत्त्वादि गुणोंसे रहित और | कूटस्थ होते हुए अपनेमें अनात्म-