श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 249, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५ न तत्रेति । तत्र तस्मिन्पर- | 'न तत्र' इत्यादि । वहाँ—उस मात्मनि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो | परमात्मामें, सबका प्रकाशक होनेपर न भाति ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। | भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता; अर्थात् स हि तस्यैव भासा सर्वात्मनो | यह ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । रूपजातं प्रकाशयति । न तु तस्य | अपि तु वह उस सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाश- स्वतःप्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा | से ही सब रूपोंको प्रकाशित करता है; न चन्द्रतारकम् । नेमा विद्युतो | क्योंकि उसमें स्वयं प्रकाशित करने- भान्ति। कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः। | का सामर्थ्य नहीं है । तथा न चन्द्र किं बहुना यदिदं जगद्भाति | और तारे, एवं न विद्युत् ही वहाँ तमेव स्वतो भारूपत्वाद्भान्तं | प्रकाशित होते हैं । फिर हमें दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । | दिखायी देनेवाला यह अग्नि तो यथा लोहादि वह्निं दहन्तमनु- | प्रकाशित हो ही कैसे सकता है ? दहति न स्वतः । तस्यैव भासा | अधिक क्या, यह जो जगत् भास रहा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि भाति । | है, स्वतःप्रकाशरूप होनेके कारण उक्तं च—"येन सूर्यस्तपति तेज- | उस परमात्माके प्रकाशित होनेसे ही सेद्धः ", "न तद्भासयते सूर्यो न | प्रकाशित हो रहा है, जिस प्रकार शशाङ्को न पावकः ।” ( गीता १५। | लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अग्नि- ६ ) इति ॥ १४ ॥ | के साथ ही [ उसीकी शक्तिसे ] | जलाते हैं स्वतः नहीं । ये सब | सूर्यादि उसके ही प्रकाश यानी | दीप्तिसे प्रकाशित होते हैं । कहा | भी है “जिसके तेजसे युक्त होकर | सूर्य तपता है", "उसे न सूर्य | प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और | न अग्नि ही" इत्यादि ॥१४॥