श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 250, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें२३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध ज्ञात्वा देवं मुच्यत इत्युक्तम् । ऊपर यह कहा है कि उस देवको जानकर मुक्त हो जाता है; कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वा मुच्यते अब यह बतलाते हैं कि उसीको जानकर क्यों मुक्त होता है, किसी नान्येनेत्यत्राह— और कारणसे क्यों नहीं होता ? एको हꣳसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ इस भुवनके मध्य एक हंस है वही जलमें (पञ्चमाहुतिरूप देहमें) स्थित अग्नि है। उसीको जानकर पुरुष मृत्युके पार हो जाता है। इससे भिन्न मोक्षप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ एक इति । एकः परमात्मा ‘एको’ इत्यादि । एक परमात्मा, हन्त्यविद्यादिबन्धकारणमिति जो अविद्यादि बन्धनके कारणका हनन हंसो भुवनस्यास्य त्रैलोक्यस्य करता है इसलिये हंस है, इस भुवन —त्रिलोकीके मध्यमें स्थित है, और मध्ये नान्यः कश्चित् । कस्मात् ? कोई नहीं । क्यों नहीं है ? क्योंकि यस्मात्स एवाग्निः । अग्निरिवा- वही अग्नि है—अविद्या और उसके ग्निरविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । कार्यका दाह करनेवाला होनेसे वह उक्तं च—“व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः” अग्निके समान अग्नि है । कहा भी इति । सलिले देहात्मना परिणते । है—“ईश्वर आकाशातीत अग्नि है” इत्यादि । सलिलमें अर्थात् देहरूपमें उक्तं च—“इति तु पञ्चम्यामाहु- परिणत हुए जलमें, जैसे कहा है— “इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें आप