भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 244

२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना इदानीं मन्त्रदृगभिप्रेतमर्थं | अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा [ ऋषियों ] प्रार्थयते— | के अभिमत पदार्थके लिये प्रार्थना | करती है— यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥१०॥ तन्तुओंसे मकड़ीके समान जिस एकमात्र देवने स्वभावतः ही प्रधान- जनित कार्योंसे अपनेको आवृत कर लिया है वह हमें ब्रह्मसे एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ यस्तन्तुनाभ इति । यथो- | ‘यस्तन्तुनाभः’ इत्यादि । जिस र्णनाभिरात्मप्रभवैस्तन्तुभिरात्मा- | प्रकार मकड़ी अपनेसे उत्पन्न हुए नमेव समावृणोति तथा प्रधान- | तन्तुओंसे अपनेहीको आवृत कर जैरव्यक्तप्रभवैर्नामरूपकर्मभिस्त- | लेती है उसी प्रकार प्रधानज अर्थात् न्तुस्थानीयैः स्वमात्मानमावृणोत् | अव्यक्तसे उत्पन्न हुए तन्तुरूप नाम, सञ्छादितवान्स नो महं ब्रह्मण्य- | रूप और कर्मोंसे जिसने अपनेको प्ययं ब्रह्माप्ययमेकीभावं दधाद्- | आच्छादित कर रखा है वह हमें ब्रह्ममें दात्वित्यर्थः ॥१०॥ | लय यानी एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश पुनरपि तमेव करतलन्यस्ता- | फिर भी हथेलीपर रखे हुए | आँवलेके समान उसीको साक्षात् मलकवत्साक्षाद्दर्शयंस्तद्विज्ञानादेव | रूपसे दिखाते हुए श्रुति दो मन्त्रोंद्वारा | इस बातको प्रदर्शित करती है कि परमपुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्श- | उसके विशेष ज्ञानसे ही परमपुरुषार्थकी यति मन्त्रद्वयेन— | प्राप्ति होती है, और किसीसे नहीं—