श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 243, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
श्रूयते । सा च स्वाभाविकी | है और वह स्वाभाविकी ज्ञानबल- ज्ञानबलक्रिया च ज्ञानक्रिया | क्रिया अर्थात् ज्ञानक्रिया और बल- बलक्रिया च । ज्ञानक्रिया सर्व- | क्रिया है । ज्ञानक्रिया—सम्पूर्ण विषयज्ञानप्रवृत्तिः । बलक्रिया | विषयोंके ज्ञानकी प्रवृत्ति और बल- स्वसंनिधिमात्रेण सर्वं वशीकृत्य | क्रिया—अपनी सन्निधिमात्रसे सबको नियमनम् ॥ ८ ॥ | वशमें करके नियमन करना ॥८॥
यस्मादेवं तस्मात्— | क्योंकि ऐसा है इसलिये— न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई शासक या उसका चिह्न ही है । वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ॥९॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके । | लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं अत एव न तस्येशिता नियन्ता । | है, अतः उसका कोई ईशिता— नैव च तस्य लिङ्गं चिह्नं धूम- | नियन्ता भी नहीं है । उसका कोई स्थानीयं येनानुमीयेत । स | लिङ्ग-धूमादिरूप चिह्न भी नहीं है, कारणं सर्वस्य कारणम् । करणा- | जिससे अनुमान किया जा सके । वह धिपाधिपः परमेश्वरः । यस्मादेवं | सबका कारण और करणाधिप—परमेश्वर तस्मान्न तस्य कश्चिज्जनिता | है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका जनयिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ | कोई जनिता—जनयिता अर्थात् उत्पत्ति- | कर्ता और स्वामी भी नहीं है ॥९॥