श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३५ न तत्रेति । तत्र तस्मिन्पर- | 'न तत्र' इत्यादि । वहाँ—उस मात्मनि सर्वावभासकोऽपि सूर्यो | परमात्मामें, सबका प्रकाशक होनेपर न भाति ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः। | भी सूर्य प्रकाशित नहीं होता; अर्थात् स हि तस्यैव भासा सर्वात्मनो | यह ब्रह्मको प्रकाशित नहीं करता । रूपजातं प्रकाशयति । न तु तस्य | अपि तु वह उस सर्वात्मा ब्रह्मके प्रकाश- स्वतःप्रकाशनसामर्थ्यम् । तथा | से ही सब रूपोंको प्रकाशित करता है; न चन्द्रतारकम् । नेमा विद्युतो | क्योंकि उसमें स्वयं प्रकाशित करने- भान्ति। कुतोऽयमग्निरस्मद्गोचरः। | का सामर्थ्य नहीं है । तथा न चन्द्र किं बहुना यदिदं जगद्भाति | और तारे, एवं न विद्युत् ही वहाँ तमेव स्वतो भारूपत्वाद्भान्तं | प्रकाशित होते हैं । फिर हमें दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । | दिखायी देनेवाला यह अग्नि तो यथा लोहादि वह्निं दहन्तमनु- | प्रकाशित हो ही कैसे सकता है ? दहति न स्वतः । तस्यैव भासा | अधिक क्या, यह जो जगत् भास रहा दीप्त्या सर्वमिदं सूर्यादि भाति । | है, स्वतःप्रकाशरूप होनेके कारण उक्तं च—"येन सूर्यस्तपति तेज- | उस परमात्माके प्रकाशित होनेसे ही सेद्धः ", "न तद्भासयते सूर्यो न | प्रकाशित हो रहा है, जिस प्रकार शशाङ्को न पावकः ।” ( गीता १५। | लोहा आदि पदार्थ जलानेवाले अग्नि- ६ ) इति ॥ १४ ॥ | के साथ ही [ उसीकी शक्तिसे ] | जलाते हैं स्वतः नहीं । ये सब | सूर्यादि उसके ही प्रकाश यानी | दीप्तिसे प्रकाशित होते हैं । कहा | भी है “जिसके तेजसे युक्त होकर | सूर्य तपता है", "उसे न सूर्य | प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा और | न अग्नि ही" इत्यादि ॥१४॥
२३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२३६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मोक्षके लिये ज्ञानके सिवा अन्य हेतुओंका निषेध ज्ञात्वा देवं मुच्यत इत्युक्तम् । ऊपर यह कहा है कि उस देवको जानकर मुक्त हो जाता है; कस्मात्पुनस्तमेव विदित्वा मुच्यते अब यह बतलाते हैं कि उसीको जानकर क्यों मुक्त होता है, किसी नान्येनेत्यत्राह— और कारणसे क्यों नहीं होता ? एको हꣳसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ॥१५॥ इस भुवनके मध्य एक हंस है वही जलमें (पञ्चमाहुतिरूप देहमें) स्थित अग्नि है। उसीको जानकर पुरुष मृत्युके पार हो जाता है। इससे भिन्न मोक्षप्राप्तिका कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ एक इति । एकः परमात्मा ‘एको’ इत्यादि । एक परमात्मा, हन्त्यविद्यादिबन्धकारणमिति जो अविद्यादि बन्धनके कारणका हनन हंसो भुवनस्यास्य त्रैलोक्यस्य करता है इसलिये हंस है, इस भुवन —त्रिलोकीके मध्यमें स्थित है, और मध्ये नान्यः कश्चित् । कस्मात् ? कोई नहीं । क्यों नहीं है ? क्योंकि यस्मात्स एवाग्निः । अग्निरिवा- वही अग्नि है—अविद्या और उसके ग्निरविद्यातत्कार्यस्य दाहकत्वात् । कार्यका दाह करनेवाला होनेसे वह उक्तं च—“व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः” अग्निके समान अग्नि है । कहा भी इति । सलिले देहात्मना परिणते । है—“ईश्वर आकाशातीत अग्नि है” इत्यादि । सलिलमें अर्थात् देहरूपमें उक्तं च—“इति तु पञ्चम्यामाहु- परिणत हुए जलमें, जैसे कहा है— “इस प्रकार पाँचवीं आहुतिमें आप
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३७ तावापः पुरुषवचसो भवन्ति" (जल) पुरुष नामवाला हो जाता है।" (छा० उ० ५।९।१) इति। सन्निविष्ट—आत्मभावसे सम्यग्रूपसे संनिविष्टः सम्यगात्मत्वेन नि- स्थित है। अथवा 'सलिले'—यज्ञ- विष्टः। अथवा सलिले सलिल दानादिद्वारा सलिल (जल) के इव स्वच्छे यज्ञदानादिना समान स्वच्छ किये अन्तःकरणमें विमलीकृतेऽन्तःकरणे संनिविष्टो स्थित वेदान्तवाक्यार्थके सम्यग्ज्ञानके वेदान्तवाक्यार्थसम्यग्ज्ञानफलका- फलरूपसे अविद्या और उसके कार्य- रूढोऽविद्यातत्कार्यस्य दाहक का दाह करनेवाला [ अग्नि ]—ऐसा इत्यर्थः। तस्मात्तमेव विदित्वाति भी अर्थ हो सकता है। अतः उसी- मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यते- को जानकर पुरुष मृत्युके पार हो ऽयनाय ॥१५॥ जाता है, मोक्षके लिये कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥ परमेश्वरके स्वरूपका विशेषरूपसे वर्णन परमपदप्राप्तये पुनरपि तमेव परमपदकी प्राप्तिके लिये श्रुति विशेषतो दर्शयति— फिर भी उसीको विशेषरूपसे प्रदर्शित करती है— स विश्वकृद्विश्वविदात्मयोनि- र्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । प्रधानक्षेत्रज्ञपतिर्गुणेशः संसारमोक्षस्थितिबन्धहेतुः ॥१६॥ वह विश्वका कर्ता, विश्ववेत्ता, आत्मयोनि (स्वयम्भू), ज्ञाता, कालका प्रेरक, अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है। तथा वही प्रधान और पुरुषका अध्यक्ष, गुणोंका नियामक एवं संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका हेतु है ॥१६॥
२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२३८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 स विश्वकृदिति। स विश्वकृद्वि- | 'स विश्वकृत्' इत्यादि । वह श्वस्य कर्ता । विश्वं वेत्तीति विश्व- | विश्वकृत्-विश्वका कर्ता है, विश्वको वित् । आत्मा चासौ योनिश्चेत्यात्म- | जानता है-इसलिये विश्ववेत्ता है, योनिः । जानातीति ज्ञः । सर्व- | आत्मा और योनि है इसलिये आत्म- स्यात्मा सर्वस्य च योनिः सर्वज्ञ- | योनि है, जानता है इसलिये ज्ञ है। श्चैतन्यज्योतिरित्यर्थः । कालकारः | तात्पर्य यह है कि वह सबका आत्मा, कालस्य कर्ता गुण्यपहतपाप्मादि- | सबका योनि (उत्पत्तिस्थान) और मान्विश्वविदित्स्य प्रपञ्चः । | सर्वज्ञ अर्थात् चैतन्यज्योति है । प्रधानमव्यक्तम् । क्षेत्रज्ञो विज्ञा- | तथा कालकार-कालका कर्ता और नात्मा । तयोः पतिः पालयिता । | गुणी--अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् गुणानां सत्त्वरजस्तमसामीशः । | है। यह सब 'विश्ववित्' इस संसारमोक्षस्थितिबन्धानां हेतुः | विशेषणका विस्तार है। [इसके कारणम् ॥१६॥ | सिवा] वही प्रधान-अव्यक्त और | क्षेत्रज्ञ-विज्ञानात्मा, इन दोनोंका | पति-पालन करनेवाला, सत्त्व, रज, | तम इन तीनों गुणोंका नियामक तथा | संसारके मोक्ष, स्थिति और बन्धनका | हेतु यानी कारण है ॥१६॥ किञ्च— | तथा— स तन्मयो ह्यमृत ईशसंस्थो ज्ञः सर्वगो भुवनस्यास्य गोप्ता । य ईशे अस्य जगतो नित्यमेव नान्यो हेतुर्विद्यत ईशनाय ॥१७॥ वह तन्मय (जगद्रूप अथवा ज्योतिर्मय), अमरणधर्मा, ईश्वरलूपसे स्थित, ज्ञाता, सर्वगत और इस भुवनका रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत्का
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३९ शासन करता है; क्योंकि इसका शासन करनेके लिये कोई और समर्थ नहीं है ॥ १७॥ स तन्मय इति । स तन्मयो | ‘स तन्मयो’ इत्यादि । वह विश्वात्मा । अथवा तन्मयो | तन्मय अर्थात् विश्वरूप है । अथवा ज्योतिर्मय इति ‘तस्य भासा | ‘उसके प्रकाशसे वह सब प्रकाशित सर्वमिदं विभाति’ इत्येतदपेक्ष्यो- | है’ इस उक्तिकी अपेक्षासे ‘तन्मय’ च्यते । अमृतोऽमरणधर्मा । ईशे | शब्दसे ज्योतिर्मय भी कहा जा स्वामिनि सम्यक्स्थितिर्यस्यासा- | सकता है । अमृत–अमरणधर्मा, वीशसंस्थः । जानातीति ज्ञः । | ईश यानी ईश्वरभावमें जिसकी सम्यक् सर्वत्र गच्छतीति सर्वगः । | स्थिति है अतः वह ईशसंस्थ है, भुवनस्यास्य गोप्ता पालयिता । | जानता है इसलिये ज्ञ है, सर्वत्र जाता है य ईश ईष्टेऽस्य जगतो नित्य- | इसलिये सर्वग है, इस भुवनका गोप्ता मेव नियमेन नान्यो हेतुः समर्थो | यानी पालनकर्ता है, जो इस जगत्- विद्यत ईशनाय जगदीशनाय | को नित्य–नियमसे शासित करता ॥१७॥ | है, क्योंकि जगत्के शासनके लिये कोई और हेतु–समर्थ नहीं है॥१७॥ मुमुक्षुके लिये भगवच्छरणागतिका उपदेश यस्मात्स एव संसारमोक्ष- | क्योंकि वही संसारके मोक्ष, स्थितिबन्धहेतुस्तस्मात्तमेव मुमुक्षुः | स्थिति और बन्धनका हेतु है इसलिये सर्वात्मना शरणं प्रपद्येत गच्छे- | मुमुक्षु पुरुषको सब प्रकार उसीकी दिति प्रतिपादयितुमाह— | शरणमें जाना चाहिये—यह प्रति- पादन करनेके लिये श्रुति कहती है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥ १८॥
२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ जो सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्माको उत्पन्न करता है और जो उसके लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है, अपनी बुद्धिको प्रकाशित करनेवाले उस देवकी मैं मुमुक्षु शरण ग्रहण करता हूँ ॥१८॥
यो ब्रह्माणमिति । यो ब्रह्माणं | 'यो ब्रह्माणम्' इत्यादि । जिसने हिरण्यगर्भं विदधाति सृष्टवान्पूर्वं | पहले अर्थात् सृष्टिके आरम्भमें ब्रह्मा- सर्गादौ । यो वै वेदांश्च प्रहिणोति | हिरण्यगर्भको रचा है और जो उसके तस्मै । तं ह हशब्दोऽवधारणे । | लिये वेदोंको प्रवृत्त करता है । 'तं तमेव परमात्मानम् । उक्तं च— | ह' यहाँ 'ह' शब्द निश्चयार्थक है, “तमेव धीरो विज्ञाय | अर्थात् उसी परमात्माको । कहा भी प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्मणः । | है—"बुद्धिमान् ब्रह्मवेत्ता उसीको नानुध्यायाद्बहूञ्छब्दा- | जानकर उसीमें मनोनिवेश करे, न्वाचो विग्लापनं हि तत् ॥” | बहुत-से शब्दों—शास्त्रोंको न पढ़े, (बृ० उ० ४।४।२१) | क्योंकि वह तो वाणीको पीडित “तमेवैकं जानथात्मानम्” | करना ही है” तथा “उसी एक (मु० उ० २।२।५) इति | आत्माको जानो” इत्यादि । देव— च। देवं ज्योतिर्मयम् । आत्मनि | ज्योतिर्मय । अपनेमें जो बुद्धि है या बुद्धिस्तस्याः प्रसादकरम् । | उसका प्रसाद (विकास) करनेवाले, प्रसन्न हि परमेश्वरे बुद्धिरपि | क्योंकि परमेश्वरके प्रसन्न होनेपर तद्विषया प्रमा निष्प्रपञ्चाकार- | बुद्धि यानी परमेश्वरविषयिणी प्रमा ब्रह्मात्मनावतिष्ठते वर्तते। आत्म- | भी निष्प्रपञ्च ब्रह्माकारसे स्थित हो बुद्धिप्रकाशमित्यन्येऽधीयते । | जाती है । दूसरे लोग यहाँ 'आत्म- आत्मबुद्धिं प्रकाशयतीत्यात्मबुद्धि- | बुद्धिप्रकाशम्' ऐसा पाठ मानते प्रकाशम् । अथवात्मैव बुद्धि- | हैं । [ तब यह अर्थ होगा-] | अपनी बुद्धिको प्रकाशित करता | है इसलिये जो आत्मबुद्धिप्रकाश | है; अथवा आत्मा ही बुद्धि है,
१. यह व्याख्या ‘आत्मबुद्धिप्रसादं' पाठ मानकर की गयी है ।
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४१ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ रात्मबुद्धिः सैव प्रकाशोऽस्येत्या- | वही जिसका प्रकाश है उस आत्म- त्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै वैशब्दो- | बुद्धिप्रकाशकी मैं मुमुक्षु—यहाँ 'वै' ऽवधारणे मुमुक्षुरेव सन्न फलान्तर- | शब्द निश्चयार्थक है [ अतः तात्पर्य | यह है कि ] मुमुक्षु होकर ही शरण मिच्छञ्छरणमहं प्रपद्ये ॥१८॥ | लेता हूँ, किसी अन्य फलकी इच्छा | करता हुआ नहीं ॥ १८ ॥ ───◇:❖:◇─── एवं तावत्सृष्ट्यादिना यल्ल- | इस प्रकार यहाँतक सृष्टि आदि क्ष्यं स्वरूपं दर्शितम्, अथेदानिं | कार्यसे लक्षित होनेवाले जिस स्वरूप- तत्स्वरूपेण दर्शयति— | का वर्णन किया है उसीको अब | साक्षात्स्वरूपसे प्रदर्शित करते हैं— निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्। अमृतस्य परं सेतुं दग्धेन्धनमिवानलम् ॥१९॥ जो कलाहीन, क्रियाहीन, शान्त, अनिन्द्य, निर्लेप, अमृतत्वका उत्कृष्ट सेतु और जिसका ईंधन जल चुका है उस [ धूमादिशून्य ] अग्निके समान [ देदीप्यमान ] है [ उस देवकी मैं शरण लेता हूँ ] ॥१९॥ निष्कलमिति। कला अवयवा | 'निष्कलम्' इत्यादि । जिससे निर्गता यस्मात्तं निष्कलं निर- | कला यानी अवयव निकल गये हैं वयवमित्यर्थः । निष्क्रियं स्वमहि- | उस निष्कल अर्थात् निरवयव, मप्रतिष्ठितं कूटस्थमित्यर्थः । | निष्क्रिय—अपनी महिमामें स्थित शान्तमुपसंहृतसर्वविकारम् । निर- | अर्थात् कूटस्थ, शान्त—जिसके वद्यमगहंणीयम् । निरञ्जनं निर्ले- | सब विकारोंका अन्त हो गया है, पम् । अमृतस्यामृतत्वस्य मोक्षस्य | निरवद्य—अनिन्द्य, निरञ्जन—निर्लेप, | अमृत यानी अमृतत्व—मोक्षकी प्राप्ति-
२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 प्राप्तये सेतुरिव सेतुः संसारमहो- | के लिये जो सेतुके समान सेतु है, | क्योंकि वह संसार-सागरसे पार दधेरुत्तारणोपायत्वात्तम् अमृ- | होनेका साधन है, उस अमृतत्वके | परमसेतु तथा जिसका ईंधन जल तस्य परं सेतुं दग्धेन्धनानलमिव | गया है उस अग्निके समान देदीप्य- | मान—जगमगाते हुए [ देवकी मैं देदीप्यमानं झटझटायमानम्॥१९॥ | शरण लेता हूँ ] ॥१९॥ -----------------------------०-०----------------------------- परमात्मज्ञानके बिना दुःख-निवृत्तिकी असम्भवता किमिति तमेव विदित्वा | तो क्या उसीको जानकर पुरुष मुच्यते नान्येन ? इति तत्राह— | मुक्त होता है किसी और साधनसे | नहीं ? इसपर कहते हैं— यदा चर्मवदाकाशं वेष्टयिष्यन्ति मानवाः। तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥२०॥ जिस समय लोग चमड़ेके समान आकाशको लपेट लेंगे उस समय उस देवको न जानकर भी दुःखका अन्त हो जायगा*॥२०॥ यदेति । यदा यद्वच्चर्म सङ्को- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय, चयिष्यति तद्वदाकाशममूर्त्तं व्या- | जैसे कोई [फैले हुए] चमड़ेको लपेट पिनं यदि वेष्टयिष्यन्ति संवेष्टयि- | ले उसी प्रकार यदि अमूर्त और व्यापक ष्यन्ति मानवास्तदा देवं ज्योति- | आकाशको भी मनुष्य सम्यक् र्मयमनुदितानस्तमितज्ञानात्मना- | प्रकारसे लपेट लें, उस समय देव | यानी ज्योतिर्मय—उदय-अस्तसे
- तात्पर्य यह है कि परमात्माको बिना जाने दुःखका अन्त होना ऐसा ही असम्भव है जैसा कि विभु और अमूर्त आकाशको परिच्छिन्न एवं मूर्त्तस्वरूप चर्मके समान लपेटना ।
[अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
[अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
वस्थितमशनायाद्यसंस्पृष्टं परमा- | रहित ज्ञानस्वरूपसे स्थित क्षुधादिसे त्मानमविज्ञाय दुःखस्याध्यात्मि- | असंस्पृष्ट परमात्माको बिना जाने भी कस्याधिभौतिकस्याधिदैविकस्या- | आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधि- न्तो विनाशो भविष्यति । आत्मा- | दैविक दुःखका अन्त—विनाश हो ज्ञाननिमित्तत्वात्संसारस्य । | जायगा; क्योंकि आत्माके अज्ञानसे | ही संसारकी स्थिति है। यावत्परमात्मानमात्मत्वेन न | तात्पर्य यह है कि जबतक पुरुष जानाति तावत्तापत्रयाभिभूतो | परमात्माको आत्मस्वरूपसे नहीं | जानता तबतक वह अजन्मा होनेपर मकरादिभिरिव रागादिभिरि- | भी तापत्रयसे अभिभूत हो मकरादि- तस्ततः कृष्यमाणः प्रेततिर्यङ्मनु- | के समान रागादिद्वारा इधर-उधर ष्यादियोनिष्वज एव जीवभाव- | खींचा जाता हुआ प्रेत, तिर्यक् एवं मापन्नो मोमुह्यमानः संसरति । | मनुष्यादि योनियोंमें जीवभावको प्राप्त यदा पुनरपूर्वमनपरं नेति नेती- | हो अत्यन्त मोहवश संसारमें भटकता त्यादिलक्षणमशनायाद्यसंस्पृष्टमनु- | रहता है। किन्तु जिस समय वह दितानस्तमितज्ञानात्मनावस्थितं | कारण-कार्यभावसे रहित, नेति-नेति पूर्णानन्दं परमात्मानमात्मत्वेन | आदि वाक्यद्वारा लक्षित, क्षुधादिसे | असंस्पृष्ट, उदय-अस्तसे रहित ज्ञान- साक्षाज्जानाति तदा निरस्ताज्ञान- | स्वरूपसे स्थित पूर्णानन्दमय परमात्मा- तत्कार्यः पूर्णानन्दो भवतीत्यर्थः । | को साक्षात् आत्मस्वरूपसे जानता उक्तं च— | है उस समय अज्ञान और उसके “अज्ञानेनावृतं ज्ञानं | कार्यसे छूटकर पूर्णानन्दमय हो तेन मुह्यन्ति जन्तवः । | जाता है। कहा भी है— ज्ञानेन तु तदज्ञानं | “ज्ञान अज्ञानसे ढका हुआ है, येषां नाशितमात्मनः ॥ | इसीसे जीव मोहमें पड़ते हैं। | जिन्होंने ज्ञानके द्वारा अपने अज्ञान- | को नष्ट कर दिया है उनके प्रति वह
२४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ तेषामादित्यवज्ज्ञानं ज्ञान [ समस्त रूपमात्रको प्रकाशित करनेवाले ] सूर्यके समान उस ज्ञेय प्रकाशयति तत्परम् । परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता तद्बुद्धयस्तदात्मान- है । उस परमज्ञानमें ही जिनकी बुद्धि लगी हुई है, वह ज्ञानस्वरूप स्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ॥ परब्रह्म ही जिनका आत्मा है, उस ब्रह्ममें जिनकी दृढ निष्ठा है और गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं जो उसीके परायण [ अर्थात् आत्म- ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥” रति ] हैं वे ज्ञानद्वारा समस्त दोषोंसे ( गीता ५ । १५-१७ ) मुक्त हो अपुनरावृत्तिको प्राप्त हो ॥ २० ॥ जाते हैं” ॥२०॥ श्वेताश्वतर-विद्याका सम्प्रदाय तथा इसके अधिकारी सम्प्रदायपरम्परया ब्रह्मविद्याया सम्प्रदायपरम्पराके द्वारा ब्रह्म- विद्याका मोक्षप्रदत्व प्रदर्शित करनेके मोक्षप्रदत्वं प्रदर्शयितुं सम्प्रदायं लिये श्रुति इसके सम्प्रदाय और इस विद्याके अधिकारीको प्रदर्शित विद्याधिकारिणं च दर्शयति— करती है— तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽथ विद्वान् । अत्याश्रमिभ्यः परमं पवित्रं प्रोवाच सम्यगृषिसंघजुष्टम् ॥२१॥ श्वेताश्वतर ऋषिने तपोबल और परमात्माकी प्रसन्नतासे उस प्रसिद्ध ब्रह्मको जाना और ऋषिसमुदायसे सेवित इस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्वका सम्यक् प्रकारसे परमहंस संन्यासियोंको उपदेश किया ॥२१॥
अध्याय ६ ]
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४५
[वाम स्तम्भ / Left Column]
तपःप्रभावादिति । तपसः कृच्छ्रचान्द्रायणादिलक्षणस्य, तत्र तपःशब्दस्य रूढत्वात् । नित्या- दीनां विधिवदनुष्ठितानां कर्मणा- मुपलक्षणमिदम् । “मनसश्चे- न्द्रियाणां च ह्येकाग्र्यं परमं तपः” इति स्मरणात् । तस्य च सर्वस्य तपसस्तस्मिञ्श्वेता- श्वतरे नियमेन सत्त्वात्तत्प्रभावा- त्तत्सामर्थ्याद्देवप्रसादाच्च कैवल्य- मुद्दिश्य तदधिकारसिद्धये बहु- जन्मसु सम्यगाराधितपरमेश्वरस्य प्रसादाच्च ब्रह्मापरिच्छिन्नमह- त्त्वम् । ह इति प्रसिद्धद्योतनार्थः । श्वेताश्वतरो नाम ऋषिर्विद्वान्य- थोक्तं ब्रह्म परम्पराप्राप्तं गुरु- मुखाच्छ्रुत्वा मनननिदिध्यास- नादरनैरन्तर्यसत्कारादिभिर्ब्रह्माह- मस्मीत्यपरोक्षीकृताखण्डसाक्षा- त्कारवान् ।
[दक्षिण स्तम्भ / Right Column]
‘तपःप्रभावात्’ इत्यादि । ‘तपसः’ अर्थात् कृच्छ्रचान्द्रायणादिरूप तपके [ प्रभावसे ], क्योंकि उसीमें ‘तप’ शब्द रूढ है । यह विधिवत् अनुष्ठान किये हुए नित्यादि कर्मोंका उपलक्षण है, क्योंकि “मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रता ही परम तप है” ऐसा स्मृतिवाक्य है । वह सम्पूर्ण तप श्वेताश्वतर ऋषिमें नियमसे होनेके कारण उसके प्रभाव यानी सामर्थ्यसे तथा भगवान्की कृपासे—कैवल्य- पदके उद्देश्यसे उसका अधिकार प्राप्त करनेके लिये अनेकों जन्म- पर्यन्त सम्यक् प्रकारसे आराधना किये हुए परमेश्वरकी प्रसन्नता- से जिसकी महिमाकी कोई सीमा नहीं है, उस ब्रह्मको—यहाँ ‘ह’ शब्द प्रसिद्धिका द्योतक है--श्वेता- श्वतरनामक ऋषिने जाना अर्थात् यथावत्रूपसे वर्णन किये हुए परम्परागत ब्रह्मतत्त्वको गुरुदेवके मुखसे श्रवण कर मनन, निदिध्यासन, आदर ( श्रद्धा ), निरन्तर अभ्यास एवं सत्कारादिके द्वारा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार अपरोक्ष किया अर्थात् अखण्ड- वृत्तिसे उसका साक्षात्कार किया ।
२४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
[बायाँ स्तम्भ (मूल संस्कृत टीका)] अथ स्वानुभवदार्ढ्यानन्तर- मत्याश्रमिभ्यः। "अतिः पूजायाम्" इति स्मरणादत्यन्तं पूज्यत- माश्रमिभ्यः साधनचतुष्टयसम्पत्ति- महिम्ना स्वेषु देहादिष्वपि जीवनभोगादिष्वनास्थावद्भ्यः । अत एव वैराग्यपुष्कलवद्भ्यः । तदुक्तम्— "वैराग्यं पुष्कलं न स्या- न्निष्फलं ब्रह्मदर्शनम् । तस्माद्रक्षेत विरतिं बुधो यत्नेन सर्वदा ॥" इति । स्मृत्यन्तरे च— "यदा मनसि वैराग्यं जायते सर्ववस्तुषु । तदैव संन्यसेद्विद्वा- नन्यथा पतितो भवेत् ॥" इति। परमहंससंन्यासिनस्त एवा- त्याश्रमिणः । तथा च श्रूयते— "न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः परो हि ब्रह्मा । तानि वा एता- न्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत्" (म० ना० ७८) इति । "चतुर्विधा भिक्षवश्च बहूदककुटीचकौ ।
[दायाँ स्तम्भ (हिन्दी अनुवाद)] फिर अपना अनुभव दृढ़ करनेके पश्चात् उसे अत्याश्रमियोंको—"अति- शब्द पूजार्थक है" ऐसी स्मृति होनेके कारण अत्यन्त पूजनीय आश्रमवालोंको अर्थात् साधनचतुष्टय- की पूर्णताके प्रभावसे जिनकी अपने शरीरादि तथा जीवन और भोगादिमें भी आस्था नहीं थी उनको, अतः पूर्ण वैराग्यवानोंको [ इसका उपदेश किया ] । ऐसा ही कहा भी है— "यदि पूर्ण वैराग्य न हो तो ब्रह्मज्ञान निष्फल है, अतः बुद्धिमान् पुरुषको सर्वदा प्रयत्नपूर्वक वैराग्यकी रक्षा करनी चाहिये ।" तथा दूसरी स्मृतिमें कहा है—"जिस समय मनमें समस्त वस्तुओंके प्रति वैराग्य उत्पन्न हो जाय उसी समय विद्वान्को संन्यास ग्रहण करना चाहिये, नहीं तो उसका पतन हो जायगा।" इस प्रकार जो परमहंस संन्यासी हैं वे ही अत्याश्रमी हैं। ऐसा ही श्रुति भी कहती है—"न्यास ही ब्रह्मा है, ब्रह्मा ही पर ( परब्रह्म ) है, पर ही ब्रह्मा है और ये सब तप निकृष्ट हैं, संन्यास ही सबसे बड़ा है" इत्यादि; तथा "बहूदक, कुटी- चक, हंस और परमहंस—ये चार प्रकारके भिक्षु हैं, इनमें जो-जो
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४७ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 हंसः परमहंसश्च | पीछेवाला है वह-वह उत्तरोत्तर उत्तम यो यः पश्चात्स उत्तमः ॥" | है" ऐसी स्मृति भी है । उन इति स्मरणाच्च । तेभ्योऽत्या- | अत्याश्रिमियोंको उस प्रकृत परब्रह्मका श्रमिभ्यः परं प्रकृतं ब्रह्म तदेव | अर्थात् उस उत्कृष्टतम—सम्पूर्ण परमुत्कृष्टतमं निरस्तसमस्ता- | अविद्या और उसके कार्यसे रहित विद्यातत्कार्यनिरतिशयसुखैकरसं | निरतिशय-सुखैकरसस्वरूप पवित्र— पवित्रं शुद्धं प्रकृतिप्राकृतादिमल- | शुद्ध यानी प्रकृति और प्रकृतिके विनिर्मुक्तम् । ऋषिसंघजुष्टं वाम- | कार्य आदि मलसे रहित ब्रह्मका, देवसनकादीनां संघैः समूहैर्जुष्टं | जो ऋषिसंघजुष्ट यानी वामदेव एवं सेवितमात्मत्वेन सम्यक्परिभावितं | सनकादि ऋषियोंके समूहसे जुष्ट— प्रियतमानन्दत्वेनाश्रितम् । "आ- | सेवित अर्थात् आत्मभावसे सम्यक् त्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" | प्रकारसे भावना किया हुआ यानी (बृह० उ० ४ । ५ । ६) इति | प्रियतम आनन्दरूपसे आश्रित है, श्रुतेः । सम्यगात्मतयापरोक्षीकृतं | क्योंकि श्रुति भी कहती है "आत्मा- यथा भवति तथा । सम्यगित्यस्य | के लिये ही सब कुछ प्रिय होता काकाक्षिन्यायेनोभयत्रानुषङ्गः | है," [ अतः ऐसे ब्रह्मका ] जिस कर्तव्यः । प्रोवाचोक्तवान् ॥२१॥ | प्रकार वह आत्मस्वरूपसे पूर्णतया प्रत्यक्ष हो सके उस प्रकार उपदेश किया । श्रुतिके 'सम्यक्' पदका काकाक्षिन्यायसे 'प्रोवाच' और 'जुष्टम्' दोनों पदोंके साथ सम्बन्ध समझना चाहिये ॥२१॥ —----•----— अनधिकारिके प्रति विद्योपदेशका निषेध यथोक्तशिष्यपरीक्षणपूर्वकं | इस विद्याका उपर्युक्त प्रकारके | शिष्यकी परीक्षा करके उपदेश विद्या वक्तव्या तद्विहाय तदुक्तौ | करना चाहिये । उसे छोड़-
२४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
दोषं विद्याया वैदिकत्वं गुप्तत्वं | कर इसका उपदेश करनेमें दोष, सम्प्रदायपरम्परया प्रतिपादितत्वं | विद्याका वैदिकत्व, गुह्यत्व और | सम्प्रदायपरम्पराद्वारा प्रतिपादित होना चाह— | श्रुति बतलाती है— वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् । नाप्रशान्ताय दातव्यं नापुत्रायाशिष्याय वा पुनः॥२२॥ उपनिषदोंमें परम गुह्य इस विद्याका पूर्वकल्पमें उपदेश किया गया था । जिसका चित्त अत्यन्त शान्त (रागादिमलरहित) न हो उस पुरुष- को तथा जो पुत्र या शिष्य न हो उसको इसे नहीं देना चाहिये ॥२२॥ वेदान्त इति । वेदान्त इति | 'वेदान्ते' इत्यादि । 'वेदान्ते' जात्येकवचनम् । सकलासूप- | इसमें जातिमें एकवचन है, अर्थात् निषत्स्विति यावत् । परमं परम- | सभी उपनिषदोंमें, परम-परम- पुरुषार्थस्वरूपं गुह्यं गोप्यानामपि | पुरुषार्थरूप, गुह्य-गोपनीयोंमें भी सब- गोप्यतमं पुराकल्पे प्रचोदितं | से अधिक गोप्य [ यह विद्या ] पूर्वकल्पे चोदितमुपदिष्टमिति | पुराकल्प-पूर्वकल्पमें प्रचोदित हुई— सम्प्रदायप्रदर्शनं कृतमित्येतत् । | उपदेश की गयी थी । इस प्रकार प्रशान्ताय पुत्राय प्रकर्षेण शान्तं | इसका सम्प्रदायप्रदर्शन किया गया । सकलरागादिमलरहितं चित्तं यस्य | प्रशान्त पुत्रको अर्थात् जिसका चित्त तस्मै पुत्राय तादृशशिष्याय वा | प्रकर्ष—विशेषरूपसे शान्त यानी दातव्यं वक्तव्यमिति यावत् । | रागादि सम्पूर्ण मलोंसे रहित हो उस तद्विपरीतायापुत्रायाशिष्याय वा | पुत्रको या ऐसे ही गुणोंवाले शिष्य- स्नेहादिना ब्रह्मविद्या न वक्तव्या। | को इसे देना यानी उपदेश करना | चाहिये । इससे विपरीत स्वभाव- | वालेको तथा जो पुत्र या शिष्य न | हो उसे केवल स्नेहादिके कारण | ब्रह्मविद्याका उपदेश नहीं करना
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४९ अन्यथा प्रत्यवायापत्तिरिति पुनः- | चाहिये ।* नहीं तो प्रत्यवाय शब्दार्थः । | (पाप) लगता है—यह ‘पुनः’ | शब्दका तात्पर्य है । अत एव ब्रह्मविद्याविवक्षुणा | इसलिये जो गुरु ब्रह्मविद्याका गुरुणा चिरकालं परीक्ष्य शिष्य- | उपदेश करना चाहे उसे बहुत गुणाञ्ज्ञात्वा ब्रह्मविद्या वक्तव्येति | समयतक परीक्षा करके शिष्यके भावः । तथा च श्रुतिः—“भूय | गुणोंको जानकर इसका उपदेश एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया | करना चाहिये—ऐसा इसका भाव संवत्सरं संवत्स्यथ” (प्र० उ० | है। ऐसी ही यह श्रुति भी है— १।२) इति । श्रुत्यन्तरे च— | “फिर एक सालतक तपस्या, “एकशतं ह वै वर्षाणि प्रजापतौ | ब्रह्मचर्य और श्रद्धापूर्वक तुम यहाँ मघवान्ब्रह्मचर्यमुवास” (छा० | वास करो।” तथा एक अन्य उ० ८।११।३) इति च। | श्रुतिमें कहा है—“इन्द्रने प्रजापति- एतच्च बहुधा प्रपञ्चितमुपदेश- | के यहाँ एक सौ एक वर्षतक ब्रह्मचर्य साहस्रिकामित्यत्र संकोचः कृतः | व्रतका पालन करते हुए निवास ॥२२॥ | किया” इत्यादि । इस प्रसंगका | उपदेशसाहस्रीमें अनेक प्रकारसे | विस्तृत वर्णन किया है, इसलिये यहाँ | संक्षेपसे कह दिया है ॥२२॥
परमेश्वर और गुरुमें श्रद्धा-भक्ति रखनेवाले शिष्यके प्रति किये गये उपदेशकी सफलता अत्रापि देवतागुरुभक्तिमता- | अब श्रुति यह दिखलाती है कि | यहाँ भी देवता और गुरुकी भक्ति-
- शिष्य और पुत्रके प्रति ही ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेकी विधिका रहस्य यही जान पड़ता है कि जिसे उपदेश किया जाय उसकी उपदेशकके प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिये और ऐसी श्रद्धा केवल पुत्र या शिष्यकी ही हो सकती है । इसलिये वे ही इसके उपदेशके अधिकारी हैं।
२५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ मेव गुरुणा प्रकाशिता विद्या- | युक्त पुरुषोंके प्रति प्रकाशित की | हुई विद्या ही अनुभवकी प्राप्ति नुभवाय भवतीति प्रदर्शयति— | करानेवाली होती है— यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः । प्रकाशन्ते महात्मनः ॥२३॥ जिसकी परमेश्वरमें अत्यन्त भक्ति है और जैसी परमेश्वरमें है वैसी ही गुरुमें भी है उस महात्माके प्रति कहनेपर ही इन तत्त्वोंका प्रकाश होता है ॥२३॥ यस्येति । यस्य पुरुषाधि- | ‘यस्य’ इत्यादि । जिस अधिकारी कारिणो देवे इयता प्रबन्धेन | पुरुषकी देवमें—यहाँतकके ग्रन्थद्वारा | वर्णन किये हुए अखण्डैकरस दर्शिताखण्डैकरसे सच्चिदानन्द- | सच्चिदानन्द परमज्योतिःस्वरूप परज्योतिःस्वरूपिणि परमेश्वरे | परमेश्वरमें परा—उत्कृष्टा यानी | अकृत्रिमा भक्ति है, यह [ अचञ्चलता परोत्कृष्टा निरुपचरिता भक्तिः । | और श्रद्धाका भी ] उपलक्षण है । एतदुपलक्षणम् । अचाञ्चल्यं | तात्पर्य यह है कि जिसकी भगवान्- | के प्रति जैसी निश्चलता और श्रद्धा श्रद्धा चोभे यथा तथा ब्रह्म- | है वैसी ही ये दोनों ब्रह्मवेत्ता गुरुके विद्योपदेष्टरि गुरावपि तदुभयं | प्रति भी हैं उसके लिये, जैसे यस्य वर्तते तस्य तप्तशिरसो जल- | तपे हुए मस्तकवाले पुरुषके लिये | जलाशयको खोजनेके सिवा और शयन्वेषणं विहाय यथा साध- | कोई उपाय नहीं है तथा क्षुधातुर नान्तरं नास्ति यथा च बुभुक्षितस्य | पुरुषको भोजनके सिवा और कोई भोजनादन्यत्र साधनान्तरं न, | उसकी शान्तिका साधन नहीं है
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५१
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५१
एवं गुरुकृपां विहाय ब्रह्मविद्या | उसी प्रकार गुरुकृपाके बिना ब्रह्म- दुर्लभेति त्वरान्वितस्य मुख्याधि- | विद्याका प्राप्त होना अत्यन्त कठिन है कारिणो महात्मन उत्तमस्यैते | यह सोचकर जिसे ब्रह्मज्ञानप्राप्तिके कथिता अस्यां श्वेताश्वतरोप- | लिये अत्यन्त उतावली लगी हुई है निषदि श्वेताश्वतरेण महात्मना | उस मुख्याधिकारी उत्तम महात्माको ही कविनोपदिष्टा अर्थाः प्रकाशन्ते | ये कथित—इस श्वेताश्वतरोपनिषद्में स्वानुभवाय भवन्ति । द्विर्वचनं | महात्मा श्वेताश्वतरद्वारा उपदेश किये मुख्यशिष्यतत्साधनादिदुर्लभत्व- | हुए तत्त्व प्रकाशित अर्थात् स्वानुभवके प्रदर्शनार्थमध्यायपरिसमाप्त्यर्थ- | विषय होते हैं। 'प्रकाशन्ते महात्मनः' मादरार्थञ्च ॥ २३ | इन पदोंकी द्विरुक्ति मुख्य शिष्य और | उसके साधनोंकी दुर्लभता प्रदर्शित | करनेके लिये, अध्यायकी समाप्तिके | लिये तथा आदरके लिये है ॥२३॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ समाप्तमिदं श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्यम् ॥ ॥ ॐ तत्सत् ॥
शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीत- मस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
श्रीहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकानि अ० मं० पृष्ठ अजात इत्येवं कश्चित् ... ४ २१ २०० अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा ... ३ १३ १६४ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता ... ३ १९ १७० अग्निर्यत्राभिमथ्यते ... २ ६ १३१ अणोरणीयान्महतो महीयान् ... ३ २० १७१ अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये ... ५ १३ २१७ अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णाम् ... ४ ५ १७७ अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः ... ५ ८ २१२ आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः ... ६ ५ २२४ आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि ... ६ ४ २२२ उद्गीतमेतत्परमं तु ब्रह्म ... १ ७ ८९ ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् ... ४ ८ १८२ एको वशी निष्क्रियाणां बहूनाम् ... ६ १२ २३२ एतज्ज्ञेयं नित्यमेवात्मसंस्थम् ... १ १२ ११५ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः ... ६ ११ २३१ एष ह देवः प्रदिशोऽनु सर्वाः ... २ १६ १४९ एकैकं जालं बहुधा विकुर्वन् ... ५ ३ २०६ एको हि रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ... ३ २ १५२ एष देवो विश्वकर्मा महात्मा ... ४ १७ १९४ एको हꣳ सो भुवनस्यास्य मध्ये ... ६ १५ २३६ ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति ... १ १ ५६ कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा ... १ २ ५९ गुणान्वयो यः फलकर्मकर्ता ... ५ ७ २११ घृतात्परं मण्डमिवातिसूक्ष्मम् ... ४ १६ १९३ छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि ... ४ ९ १८३ तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् ... ६ ७ २२७ तद्वेदगुह्योपनिषत्सु गूढम् ... ५ ६ २०९ तदेवाग्निस्तदादित्यः ... ४ २ १७५ ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम् ... ३ १० १६२
[ २५४ ] ततः परं ब्रह्मपरं बृहन्तम् ... ३ ७ १५९ तमेकनेमिं त्रिवृतं षोडशान्तम् ... १ ४ ७४ तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूयः ... ६ ३ २२१ तपःप्रभावाद्देवप्रसादाच्च ब्रह्म ... ६ २१ २४४ तिलेषु तैलं दधनीव सर्पिः ... १ १५ १२० ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् ... १ ३ ६२ त्वं स्त्री त्वं पुमानसि ... ४ ३ १७६ द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया ... ४ ६ १७८ द्वे अक्षरे ब्रह्मपरे त्वनन्ते ... ५ १ २०३ नवद्वारे पुरे देही ... ३ १८ १६९ न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य ... ४ २० १९९ न तस्य कार्यं करणं च विद्यते ... ६ ८ २२८ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् ... ६ १४ २३४ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके ... ६ ९ २२९ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् ... ६ १३ २३३ निष्कलं निष्क्रियं शान्तम् ... ६ १९ २४१ नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्षः ... ४ ४ १७६ नीहारधूमाकर्णिलानलानाम् ... २ ११ १४३ नैनमूर्ध्वं न तिर्यञ्चम् ... ४ १९ १९८ नैव स्त्री न पुमानेषः ... ५ १० २१३ पञ्चस्रोतोऽम्बुं पञ्चयोन्युग्रवक्राम् ... १ ५ ८४ पुरुष एवेद सर्वम् ... ३ १५ १६६ प्राणान्प्रपीड्येह संयुक्तचेष्टः ... २ ९ १४१ पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते ... २ १२ १४५ भावग्राह्यमनीडाख्यम् ... ५ १४ २१७ महान्प्रभुर्वे पुरुषः ... ३ १२ १६३ मायां तु प्रकृतिं विद्यात् ... ४ १० १८५ मा नस्तोके तनये मा ... ४ २२ २०१ यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वम् ... २ १५ १४८ य एको जालवानीशत ईशनीभिः ... ३ १ १५१ यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चित् ... ३ ९ १६१ य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगात् ... ४ १ १७४ यदातमस्तन्न दिवा न रात्रिः ... ४ १८ १९६