श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ अङ्गुष्ठमात्रो रवितुल्यरूपः सङ्कल्पाहङ्कारसमन्वितो यः। बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन चैव आराग्रमात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः॥ ८ ॥ जो अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, सूर्यके समान ज्योतिःस्वरूप, संकल्प और अहंकारसे युक्त तथा बुद्धि और शरीरके गुणोंसे भी युक्त है वह अन्य (जीव) भी आरकी नोंकके बराबर आकारवाला देखा गया है॥८॥ अङ्गुष्ठमात्र इति। अङ्गुष्ठ- | ‘अङ्गुष्ठमात्रः’ इत्यादि। अङ्गुष्ठ- मात्रोऽङ्गुष्ठपरिमितहृदयसुषिरापे- | मात्र अर्थात् हृदयगुहाकी अपेक्षासे क्षया। रवितुल्यरूपो ज्योतिःस्वरूप | अँगूठेके बराबर परिमाणवाला, रवि- इत्यर्थः। सङ्कल्पाहङ्कारादिना | तुल्यरूप अर्थात् ज्योतिःस्वरूप, समन्वितो बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन च | बुद्धिके गुण सङ्कल्प और अहंकारादि- जरादिना। उक्तं च “जरामृत्यू | से युक्त तथा शरीरके गुण जरादिसे शरीरस्य” इति। आराग्रमात्रः | भी सम्पन्न; “जरा और मृत्यु शरीरके प्रतोदाग्रप्रोतलोहकण्टकाग्रमात्रो- | धर्म हैं” ऐसा कहा भी है। आराग्र- ऽपरोऽपि ज्ञानात्मनात्मा दृष्टो- | मात्र—कोड़ेके अग्रभागमें लगा हुआ ऽवगतः। अपिशब्दः सम्भावना- | जो लोहेका काँटा होता है उसकी याम्। अपरोऽप्यौपाधिको जलसूर्य | नोंकके बराबर अन्य भी यानी आत्मा इव जीवात्मा संभावित इत्यर्थः॥८॥ | भी ज्ञानस्वरूपसे देखा—जाना गया | है। यहाँ ‘अपि’ शब्द सम्भावनामें | है; तात्पर्य यह है कि जलमें प्रति- | बिम्बित सूर्यके समान उपाधिसे अन्य | जीवात्मा भी होना सम्भव है॥८॥ पुनरपि दृष्टान्तान्तरेण दर्श- | एक दूसरे दृष्टान्तसे श्रुति फिर यति— | भी दिखाती है—
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१३ वालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च । भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ ९ ॥ सौ भागोंमें विभक्त किया हुआ जो केशके अग्रभागका सौवाँ भाग है उस जीवको उसके बराबर जानना चाहिये; किन्तु वही अनन्तरूप हो जाता है ॥ ९ ॥ वालाग्रेति । वालाग्रस्य शत- ‘वालाग्र०’ इत्यादि । सौ भागोंमें विभक्त किये केशके अग्रभागका जो कृत्वो भेदमापादितस्य यो भाग- एक भाग है उसके भी सौ भाग स्तस्यापि शतधा कल्पितस्य किये जानेपर जो भाग होता है उसके समान जीवको समझना भागो जीवः स विज्ञेयः । लिङ्ग- चाहिये । लिङ्गदेह अत्यन्त सूक्ष्म है, इसलिये उसके परिमाणके स्यातिसूक्ष्मत्वात् तत्परिमाणे- अनुसार ही इसका परिमाण बतलाया नायं व्यपदिश्यते । स च जीव- जाता है । जीवस्वरूपसे वह ऐसा है, किन्तु स्वतः (अपने परमार्थरूपसे) स्वरूपेण, आनन्त्याय कल्पते स्वतः ९ वही अनन्त हो जाता है ॥९॥ किञ्च-- । तथा- नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः । यद्यच्छरीरमादत्ते तेन तेन स रक्ष्यते ॥१०॥ यह [ विज्ञानात्मा ] न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है । यह जो-जो शरीर धारण करता है उसी-उसीसे सुरक्षित रहता है ॥१०॥ नैव स्त्रीति । स्वतोऽद्वितीया- ‘नैव स्त्री’ इत्यादि । स्वयं साक्षात् अद्वितीय ब्रह्मस्वरूप होनेके कारण परोक्षब्रह्मात्मस्वभावत्वान्नैव स्त्री यह न स्त्री है, न पुरुष है और न न पुमानेष नैव चायं नपुंसकः । नपुंसक ही है । यह जिस-
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ यद्यत्स्त्रीशरीरं पुरुषशरीरं नपुंसक- | जिस स्त्रीशरीर, पुरुषशरीर अथवा शरीरं वादत्ते तेन तेन स च | नपुंसकशरीरको धारण करता है उसी-उसीसे यह विज्ञानात्मा रक्षित- विज्ञानात्मा रक्ष्यते संरक्ष्यते | सुरक्षित रहता है, अर्थात् उसी-उसी तत्तद्धर्मानात्मन्यध्यस्याभिमन्यते | शरीरके धर्मोंको अपनेमें आरोपित कर ऐसा मानने लगता है कि 'मैं स्थूलोऽहं कृशोऽहं पुमानहं स्त्र्यहं | स्थूल हूँ, मैं कृश हूँ, मैं पुरुष हूँ, मैं नपुंसकोऽहमिति ॥१०॥ | स्त्री हूँ, मैं नपुंसक हूँ' इत्यादि ॥१०॥ जीवको कर्मोंके अनुसार विविध देहकी प्राप्तिका निर्देश केन तर्ह्यसौ शरीराण्यादत्ते ? | तो फिर यह किस कारणसे शरीर धारण करता है ? सो बतलाते हैं— इत्याह— सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहै- र्ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसंप्रपद्यते ॥११॥ जिस प्रकार अन्न और जलके सेवनसे शरीरकी वृद्धि होती है वैसे ही संकल्प, स्पर्श, दर्शन और मोहसे [ कर्म होते हैं। फिर ] यह देही क्रमशः [ विभिन्न ] योनियोंमें जाकर उन कर्मोंके अनुसार रूप धारण करता है ॥११॥ सङ्कल्पनेति । प्रथमं सङ्कल्प- | 'सङ्कल्पन०' इत्यादि । पहले नम् । ततः स्पर्शनं त्वगिन्द्रिय- | संकल्प होता है, फिर स्पर्श यानी त्वगिन्द्रियका व्यापार होता है,
अध्याय ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१५ व्यापारः । ततो दृष्टिविधानम् । | तत्पश्चात् दृष्टि जाती है, उससे ततो मोहः । तैः सङ्कल्पनस्पर्शन- | पीछे मोह होता है । उन संकल्प, दृष्टिमोहैः शुभाशुभानि कर्माणि | स्पर्श, दर्शन और मोहसे शुभाशुभ निष्पद्यन्ते । ततः कर्मानुगानि | कर्म सम्पन्न होते हैं । फिर कर्मानुगत कर्मानुसारिणी स्त्रीपुंनपुंसकलक्ष- | यानी कर्मोंके अनुसार अनुक्रमसे— णान्यनुक्रमेण परिपाकापेक्षया | कर्मविपाककी अपेक्षासे यह देही— देही मर्त्यः स्थानेषु देवतिर्यङ्क- | जीव स्त्री, पुरुष एवं नपुंसकादि नुष्यादिष्वभिसंप्रपद्यते । तत्र | रूपोंको देवता, तिर्यक् एवं मनुष्यादि दृष्टान्तमाह—ग्रासाम्बुनोरन्नपान- | स्थानों ( योनियों ) में प्राप्त करता योरनियतयोर्वृष्टिरासेचनं निदान- | है । उसमें दृष्टान्त देते हैं—जिस मात्मनः शरीरस्य वृद्धिजायते | प्रकार ग्रास और अम्बु यानी अनियत यथा तद्वदित्यर्थः ॥११॥ | अन्न और जलकी वृष्टि—उनका सम्यक् | सेचन आत्माका निदान है अर्थात् | उससे शरीरकी वृद्धि होती है उसी | प्रकार [जीवको कर्मोंके द्वारा तदनुकूल | शरीरोंकी प्राप्ति होती है ]—ऐसा | इसका अभिप्राय है ॥११॥ स्थूलानि सूक्ष्माणि बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर्वृणोति । क्रियागुणैरात्मगुणैश्च तेषां संयोगहेतुरपरोऽपि दृष्टः ॥१२॥ जीव अपने गुणों ( पाप-पुण्यों ) के द्वारा स्थूल-सूक्ष्म बहुतसे देह धारण करता है । फिर उन ( शरीरों ) के कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा उनके संयोग ( देहान्तरप्राप्ति ) का दूसरा हेतु भी देखा गया है ॥ १२ ॥
२१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ [मूल संस्कृत व्याख्या] स्थूलानीति। तानि च स्थू- लान्यश्मादीनि सूक्ष्माणि तैजस- धातुप्रभृतीनि बहूनि देवादि- शरीराणि देही विज्ञानात्मा स्व- गुणैर्विहितप्रतिषिद्धविषयानुभव- संस्कारैर्भोत्यावृणोति । ततस्त- त्क्रियागुणैरात्मगुणैश्च स देह्य- परोऽपि देहान्तरसंयुक्तो भवती- त्यर्थः ॥१२॥
[हिन्दी अनुवाद] 'स्थूलानि' इत्यादि। देही— विज्ञानात्मा अपने गुण यानी विहित और प्रतिषिद्ध विषयोंके अनुभवसे प्राप्त हुए संस्कारोंके द्वारा बहुत-से यानी पाषाणादि स्थूल और तैजस धातु आदि सूक्ष्म देवादि-शरीर धारण करता है। फिर वह देही उन-उन शरीरोंके कर्मफल और मानसिक संस्कारोंके द्वारा अन्य रूप हो जाता है अर्थात् देहान्तरसे युक्त हो जाता है ॥१२॥
परमात्मतत्त्वके जाननेसे जीवकी मुक्तिका कथन
[मूल संस्कृत व्याख्या] स एवमविद्याकामकर्मफल- रागादिगुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव सान्द्रजलनिमग्नो निश्चयेन देहा- हंभावमापन्नः प्रेततिर्यङ्मनुष्यादि- योनिष्व्वाजीवं जीवभावमापन्नः कथ- ञ्चित्पुण्यवशादीश्वरार्थकर्मानुष्ठा- नेनापगतरागादिमलोऽनित्यत्वादि- दर्शनेनोत्पन्नेहामुत्रार्थफलभोगवि- रागः शमदमादिसाधनसंपन्नस्त- मात्मानं ज्ञात्वा मुच्यत इत्याह—
[हिन्दी अनुवाद] अब श्रुति यह बतलाती है कि इस प्रकार गम्भीर जलमें डूबे हुए तूँबेके समान अविद्या, काम, कर्मफल और रागादिके भारी भारसे आक्रान्त होनेके कारण अपने निश्चयसे देहात्मभावसे ही युक्त हुआ जीव प्रेत, तिर्यक् एवं मनुष्यादि योनियोंमें जीवनपर्यन्त जीवभावमें ही स्थित हुआ किसी प्रकार पुण्यवश ईश्वरार्थ कर्म करनेसे रागादिमलसे शुद्ध हो जानेपर जब अनित्यत्वादि दोष-दृष्टि करनेसे ऐहिक और आमुष्मिक फल- भोगसे विरक्त और शमदमादि साधनसम्पन्न होता है तब उस आत्माको जानकर वह मुक्त हो जाता है—
अध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१७
अध्याय ५ शाङ्करभाष्यार्थ २१७
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ इस गहन संसारके भीतर उस अनादि, अनन्त, विश्वके रचयिता, अनेकरूप, विश्वको एकमात्र व्याप्त करनेवाले देवको जानकर जीव समस्त पाशोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ अनाद्यनन्तमिति । अनाद्य- | 'अनाद्यनन्तम्' इत्यादि । कलिलके नन्तमाद्यन्तरहितं कलिलस्य मध्ये | मध्यमें यानी अत्यन्त गम्भीर संसारके गहनगभीरसंसारस्य मध्ये विश्वस्य | मध्यमें अनाद्यनन्त—आदि-अन्तसे स्रष्टारमुत्पादयितारमनेकरूपं वि- | रहित, विश्वकी सृष्टि-उत्पत्ति करने- श्वस्यैकं परिवेष्टितारं स्वात्मना | वाले, अनेकरूप, विश्वके एकमात्र सं व्याप्यावस्थितं ज्ञात्वा देवं | परिवेष्टा अर्थात् अपने स्वरूपसे ज्योतीरूपं परमात्मानं मुच्यते | विश्वको व्याप्त करके स्थित हुए, सर्वपाशैर्विद्याकामकर्मभिः॥१३॥ | देव—ज्योतिःस्वरूप परमात्माको जानकर जीव समस्त पाशोंसे यानी अविद्या, काम एवं कर्मादिसे मुक्त हो जाता है ॥१३॥ —————o000o————— केन पुनरसौ गृह्यते ? इत्याह— | किन्तु यह किसके द्वारा ग्रहण किया जाता है, सो बतलाते हैं— भावग्राह्यमनीडाख्यं भावाभावकरं शिवम् । कलासर्गकरं देवं ये विदुस्ते जहुस्तनुम् ॥१४॥ भावग्राह्य, अशरीरसंज्ञक, सृष्टि और प्रलय करनेवाले, शिवस्वरूप, एवं कलाओंकी रचना करनेवाले इस देवको जो जान लेते हैं वे शरीर ( देहबन्धन ) को त्याग देते हैं ॥ १४ ॥
२१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५
२१८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ५ ————————————
भावग्राह्यमिति । भावेन वि- | ‘भावग्राह्यम्’ इत्यादि । भाव— शुद्धान्तःकरणेन गृह्यत इति | विशुद्ध अन्तःकरणसे ग्रहण किया जाता है इसलिये जो भावग्राह्य है, भावग्राह्यम् । अनीडाख्यं नीडं | अनीडाख्य—नीड शरीरको कहते शरीरमशरीराख्यम् । भावाभाव- | हैं अतः अशरीर नामवाले, भाव और अभाव (सृष्टि और प्रलय) करने- करं शिवं शुद्धमविद्यातत्कार्य- | वाले, शिव—शुद्ध अर्थात् अविद्या विनिर्मुक्तमित्यर्थः। कलानां षोड- | और उसके कार्यसे रहित, कला सर्गकर—“उसने प्राणकी रचना शानां प्राणादिनामान्तानाम् “स | की” इत्यादि वाक्यसे अथर्वण (प्रश्न) प्राणमसृजत” (प्र० उ० ६।४) | श्रुतिमें कही हुई प्राणसे लेकर इत्यादिनाथर्वणोक्तानां सर्गकरं | नामपर्यन्त सोलह कलाओंके रचयिता उस देवको जो ‘यह मैं हूँ’ इस देवं ये विदुरहमस्मीति ते जहुः | प्रकार जानते हैं वे तनु—शरीरको परित्यजेयुस्तनुं शरीरम् ॥१४॥ | त्याग देते हैं* ॥१४॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यपरमहंसपरिव्राजकाचार्य- श्रीमच्छङ्करभगवत्प्रणीते श्वेताश्वतरोपनिषद्भाष्ये पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
- अर्थात् फिर उनका शरीरान्तरसे सम्बन्ध नहीं होता, वे मुक्त हो जाते हैं।
षष्ठ अध्याय
षष्ठ अध्याय ───:-:ஃ:-:─── परमेश्वरकी महिमासे सृष्टिचक्रका सञ्चालन नन्वन्वे कालादयः कारणम् | किन्तु अन्य मतावलम्बी तो इति मन्यन्ते । तत्कथं पुनरी- कालादिको कारण मानते हैं, फिर श्वरस्य कलासर्गकरत्वमित्या- ईश्वर किस प्रकार कलाओंकी सृष्टि शङ्क्याह— करनेवाला हो सकता है?—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है— स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैष महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ कोई बुद्धिमान् तो स्वभावको कारण बतलाते हैं और दूसरे कालको । किन्तु ये मोहग्रस्त हैं [ अतः ठीक नहीं जानते ] । यह भगवान्की महिमा ही है, जिससे लोकमें यह ब्रह्मचक्र¹ घूम रहा है ॥ १ ॥ स्वभावमिति । स्वभावमेके | 'स्वभावम्' इत्यादि । कोई कवयो मेधाविनो वदन्ति । कवि—मेधावी स्वभावको [ कारण ] कालं तथान्ये । कालस्वभावयो- बतलाते हैं तथा दूसरे कालको । र्ग्रहणं प्रथमाध्याये निर्दिष्टाना- यहाँ काल और स्वभावका ग्रहण प्रथम अध्यायमें बतलाये हुए अन्य १. ब्रह्मचक्र अर्थात् संसाररूपमें विवर्तित ब्रह्मरूप चक्र, जिसका वर्णन प्रथम अध्यायके चतुर्थ मन्त्रमें किया है ।
२२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२२० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ मन्येषामप्युपलक्षणार्थम् । परि- कारणोंको भी उपलक्षित करनेके लिये किया गया है । ये स्वभाव और मुह्यमाना अविवेकिनो विषया- कालवादी परिमुह्यमान—अविवेकी यानी विषयी होनेके कारण यथार्थ नहीं त्मानो न सम्यग्जानन्ति । तु- जानते । 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । शब्दोऽवधारणे । देवस्यैष महिमा यह तो देव ( परमेश्वर ) की महिमा है, जिससे यह ब्रह्मचक्र भ्रमित— माहात्म्यम् । येनेदं भ्राम्यते परिवर्तित होता है [ अर्थात् सब परिवर्तते ब्रह्मचक्रम् ॥ १ ॥ ओर घूम रहा है ] ॥१॥ चिन्तनीय परमेश्वरका स्वरूप तथा उसकी महिमा महिमानं प्रपञ्चयति— उस महिमाका निरूपण करते हैं— येनावृतं नित्यमिदं हि सर्वं ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । तेनेशितं कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि चिन्त्यम् ॥ २ ॥ जिसके द्वारा सर्वदा यह सब व्याप्त है तथा जो ज्ञानस्वरूप, काल- का भी कर्ता, निष्पापत्वादि गुणवान् और सर्वज्ञ है उसीसे प्रेरित होकर यह पृथिवी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाशरूप कर्म [ जगद्रूपसे ] विवर्तित होता है; [ अतः उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥२॥ येनेति । येनेश्वरेणावृतं व्याप्त- 'येन' इत्यादि । जिस ईश्वरके मिदं जगन्नित्यं नियमेन । ज्ञः द्वारा यह जगत् नित्य—नियमसे व्याप्त है, जो ज्ञानस्वरूप, कालकार कालकारः कालस्यापि कर्ता । —कालका भी कर्ता, गुणी—
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२१ गुण्यपहतपाप्मादिमान् । सर्वं | अपहतपाप्मत्वादि गुणवान् और वेत्तीति सर्वविद्यः। तेनेश्वरेणेशितं | सबको जाननेके कारण सर्वज्ञ है । प्रेरितं कर्म क्रियत इति कर्म | उस ईश्वरसे ईशित—प्रेरित कर्म । स्रजीव फणी । हशब्दः प्रसिद्धि- | जो किया जाता है उसे कर्म द्योतकः । प्रसिद्धं यदेतदीश्वर- | कहते हैं, 'ह' शब्द प्रसिद्धिका द्योतक प्रेरितं कर्म जगदात्मना विवर्तत | है । अर्थात् यह जो ईश्वरप्रेरित इति यत्पुनस्तत्कर्म पृथ्व्यप्तेजो- | प्रसिद्ध कर्म है वह मालामें सर्पके ऽनिलखानि पृथिव्यादिभूत- | समान जगद्रूपसे विवर्तित होता है । पञ्चकम् ॥ २ ॥ | और वह जो कर्म है सो पृथिवी, जल, | तेज, वायु और आकाशरूप है अर्थात् | पृथिवी आदि पञ्चभूत है ॥ २ ॥ यत्प्रथमाध्याये चिन्त्यमित्यु- | प्रथम अध्यायमें जिसे चिन्तनीय | बतलाया है उसीका निरूपण करते क्तम्, एतदेव प्रपञ्चयति— | हैं— तत्कर्म कृत्वा विनिवर्त्य भूय- स्तत्त्वस्य तत्त्वेन समेत्य योगम् । एकेन द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा कालेन चैवात्मगुणैश्च सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥ उस कर्मको करके उसका निरीक्षण कर, फिर जो उस तत्त्वके साथ यानी एक, दो, तीन या आठ तत्त्वोंके साथ अथवा काल और अन्तःकरण- के सूक्ष्म गुणोंके साथ अपने [ सत्तारूप ] गुणका योग कराकर [ स्वयं स्थित रहता है उसका चिन्तन करना चाहिये ] ॥३॥ १ श्रीशंकरानन्दजीके मतानुसार एक तत्त्व अविद्या है, दो धर्म और अधर्म हैं, तीन सत्त्वादि त्रिगुण हैं और मन, बुद्धि तथा अहंकारके सहित पाँच भूत आठ तत्त्व हैं । भाष्यमें भी आठ तत्त्व तो ये ही माने गये हैं ।
२२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२२२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
तदिति । तत्कर्म पृथिव्यादि | ‘तत्कर्म’ इत्यादि । उस पृथिवी सृष्ट्वा विनिवर्त्य प्रत्यवेक्षणं कृत्वा | आदिकर्मको रचकर उसका निरीक्षण भूयः पुनस्तस्यात्मनस्तत्त्वेन | कर फिर उस आत्माका पृथिवी आदि भूम्यादिना योगं समेत्य संग- | तत्त्वके साथ योग कराकर—यहाँ मय्य । णिलोपो द्रष्टव्यः । कति- | ( समेत्यमें ) प्रेरणार्थक ‘णिच्’ प्रत्ययका लोप समझना चाहिये । विधैः प्रकारैः । एकेन पृथिव्या | कितने प्रकारके तत्त्वोंके साथ ? द्वाभ्यां त्रिभिरष्टभिर्वा प्रकृति- | पृथिवीरूप एक तत्त्वके अथवा दो, भूतैस्तत्त्वैः । तदुक्तम्— | तीन या अष्टधा प्रकृतिरूप आठ भूमिरापोऽनलो वायुः | तत्त्वोंके साथ । इस विषयमें [गीतामें] खं मनो बुद्धिरेव च । | ऐसा कहा है—‘‘पृथिवी, जल, अहंकार इतीयं मे | अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ | और अहंकार—यह मेरी आठ ( गीता ७ । ४ ) | प्रकारकी विभिन्न प्रकृति है ।’’ इति । कालेन चैवात्मगुणै- | अथवा कालके और आत्मगुणोंके श्चान्तःकरणगुणैः कामादिभिः | यानी अन्तःकरणके कामादि सूक्ष्म सूक्ष्मैः ॥ ३ ॥ | गुणोंके साथ ॥ ३ ॥ -------------------------•:-0-:•------------------------- भगवदर्पणकर्मसे भगवत्प्राप्ति इदानीं कर्मणां मुख्यं विनि- | अब श्रुति कर्मोंका मुख्य विनियोग योगं दर्शयति— | दिखलाती है— आरभ्य कर्माणि गुणान्वितानि भावांश्च सर्वान्विनियोजयेद्यः । तेषामभावे कृतकर्मनाशः कर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्यः ॥ ४ ॥
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२३
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२३ जो पुरुष सत्त्वादि गुणमय कर्म आरम्भ कर उन्हें और समस्त भावोंको परमात्माके अर्पण कर देता है, उनके सम्बन्धका अभाव हो जानेसे उसके पूर्वकृत कर्मोंका नाश हो जाता है; और कर्मोंका क्षय हो जानेपर वह [ परमात्माको ] प्राप्त हो जाता है, क्योंकि वह तत्त्वतः उन [ पृथिवी आदि ] से अन्य है ॥ ४ ॥ आरम्येति । आरभ्य कृत्वा 'आरम्य' इत्यादि । गुण अर्थात् कर्माणि गुणैः सत्त्वादिभिरन्वि- सत्त्वादिसे युक्त कर्मोंको करके उन्हें तथा अपने अत्यन्त विशिष्ट भावोंको तानि भावांश्चात्यन्तविशेषान्वि- जो विनियुक्त करता है अर्थात् ईश्वरको समर्पित कर देता है, नियोजयेदीश्वरे समर्पयेद्यः । ईश्वरको समर्पित कर देनेसे उन तेषामीश्वरे समर्पितत्वादात्मसंब- कर्मोंका आत्मासे सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे पूर्वकृत न्धाभावस्तदभावे पूर्वकृतकर्मणां कर्मोंका नाश हो जाता है। नाशः । उक्तं च— कहा भी है— “यत्करोषि यदश्नासि “हे कुन्तीनन्दन ! तू जो यज्जुहोषि ददासि यत् । कुछ कर्म करता है, जो खाता है, जो श्रौत-स्मार्त यज्ञरूप हवन यत्तपस्यसि कौन्तेय करता है, जो देता है और जो तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ तप करता है वह सब मुझे अर्पण कर दे । इस प्रकार शुभाशुभफलैरेवं कर्मोंको मुझे समर्पण करके तू मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।” शुभाशुभ फलयुक्त कर्मबन्धनोंसे मुक्त ( गीता ९ । २७-२८ ) हो जायगा ।” “जो पुरुष “ब्रह्मण्याधाय कर्माणि कर्मोंको ब्रह्मार्पण करते हुए फलासक्ति सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ॥ त्यागकर कर्म करता है वह जलसे लिप्यते न स पापेन कमलके पत्तेके समान पापसे लिप्त पद्मपत्रमिवाम्भसा ।
२२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२२४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ————————————————————————————————————————— कायेन मनसा बुद्ध्या | नहीं होता । योगिजन फलविषयक केवलैरिन्द्रियैरपि ॥ | आसक्ति त्यागकर केवल (ममता- योगिनः कर्म कुर्वन्ति | रहित) शरीर, मन, बुद्धि एवं सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये॥" | इन्द्रियोंसे ही चित्तशुद्धिके लिये (गीता ५ । १०, ११) | कर्म किया करते हैं" इत्यादि । इति । | कर्मक्षये विशुद्धसत्त्वो याति | कर्मका क्षय हो जानेसे वह तत्त्वतोऽन्यस्तत्त्वेभ्यः प्रकृति- | शुद्धचित्त हो तत्त्वतः प्रकृतिरूप भूतेभ्योऽन्योऽविद्यातत्कार्यविनि- | तत्त्वोंसे भिन्न होनेके कारण अविद्या र्मुक्तश्चित्सदानन्दाद्वितीयब्रह्मात्म- | और उसके कार्यसे छूटकर अपनेको त्वेनावगच्छतीत्यर्थः। अन्यदिति | सच्चिदानन्दाद्वितीय ब्रह्मरूपसे जानते पाठे तत्त्वेभ्यो यदन्यद्ब्रह्म तद्या- | हुए [परमात्माको] प्राप्त होता है। तीति ॥ ४ ॥ | जहाँ 'अन्यः' के स्थानमें 'अन्यत्' | पाठ हो वहाँ 'तत्त्वोंसे भिन्न जो ब्रह्म | है उसे प्राप्त होता है' ऐसा अर्थ | समझना चाहिये ॥ ४ ॥ ———❖————— उपासनासे भगवत्प्राप्ति उक्तस्यार्थस्य द्रढिम्न उत्तरे | उपर्युक्त अर्थकी पुष्टिके लिये मन्त्राः प्रस्तूयन्ते कथं नाम | आगेके मन्त्र प्रस्तुत किये जाते हैं। विषयान्धा ब्रह्म जानीयुरित्यत | विषयान्ध पुरुष भी किसी प्रकार ब्रह्म- आह— | को जान जायें इस उद्देश्यसे श्रुति | कहती है— आदिः स संयोगनिमित्तहेतुः परस्त्रिकालादकलोऽपि दृष्टः । तं विश्वरूपं भवभूतमीड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपास्य पूर्वम् ॥ ५ ॥
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२५
वह सबका कारण, शरीरसंयोगकी निमित्तभूता अविद्याका हेतु,
त्रिकालातीत और कलाहीन देखा गया है। अपने अन्तःकरणमें स्थित उस
सर्वरूप एवं संसाररूप देवकी ज्ञानोत्पत्तिसे पूर्व उपासना कर [.उसे प्राप्त
हो जाता है ] ॥५॥
आदिरिति । आदिः कारणं | 'आदिः' इत्यादि । आदि—सबका
सर्वस्य, शरीरसंयोगनिमित्तानाम- | कारण; शरीरसंयोगकी निमित्तभूता
विद्यानां हेतुः । उक्तं च— | अविद्याका हेतु; कहा भी है—
"एष ह्यैवैतं साधु कर्म कारयति | "यही इससे शुभ कर्म कराता है, और
॰॰॰॰॰एष एवैनमसाधु कर्म | यही इससे अशुभ कर्म कराता है।" भूत,
कारयति च" (कौ० उ० ३।९) | भविष्य और वर्तमान तीनों कालोंसे
इति । परस्त्रिकालादतीतानागत- | अतीत; जैसे कहा है—"जिसके
वर्तमानात् । उक्तं च—"यस्मा- | नीचे संवत्सर दिनोंके द्वारा परिवर्तित
दर्वाक्संवत्सरोऽहोभिः परिवर्तते । | होता है, देवगण उसकी ज्योतियोंके
तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्हो- | ज्योति, आयु और अमृतरूपसे
पासतेऽमृतम्" (बृ० उ० ४। | उपासना करते हैं।" क्यों त्रिकाला-
४।१६) इति। कस्मात् ? यस्माद्- | तीत है ?—क्योंकि यह अकल
कलोऽसौ न विद्यन्ते कलाः | है—इसके प्राणसे लेकर नामपर्यन्त
प्राणादिनामान्ता अस्येत्यकलः । | कलाएँ नहीं हैं, इसलिये यह अकल
कलावद्धि कालत्रयपरिच्छिन्न- | है । कलावान् पदार्थ ही तीनों
मुत्पद्यते विनश्यति च । अयं | कालोंसे परिच्छिन्न होनेके कारण
पुनरकलो निष्प्रपञ्चः । तस्मान्न | उत्पन्न और नष्ट होता है । किन्तु
कालत्रयपरिच्छिन्नः सन्नुत्पद्यते | यह तो अकल यानी निष्प्रपञ्च है,
विनश्यति च । तं विश्वानि रूपा- | इसलिये कालत्रयसे परिच्छिन्न न
ण्यस्येति विश्वरूपम् । भवत्य- | होनेके कारण उत्पन्न या नष्ट नहीं
| होता । उस विश्वरूप—जिसके
| विश्व (समस्त) रूप. हैं, भव—
| जिससे जगत् उत्पन्न होता है, भूत-
२२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२२६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
स्मादिति भवः। भूतमवितथस्व- | सत्यस्वरूप, अपने चित्तमें स्थित, रूपम्। ईड्यं देवं स्वचित्तस्थमुपा- | स्तुत्य देवको पूर्व—वाक्यार्थज्ञान | उदय होनेसे पहले उपासना कर स्यायमहमस्मीति समाधानं कृत्वा | अर्थात् 'यह मैं हूँ' इस प्रकार उसमें | चित्त समाहित कर [उसे प्राप्त हो पूर्वं वाक्यार्थज्ञानोदयात् ॥५॥ | जाता है] ॥५॥
ज्ञानसे भगवत्प्राप्ति
पुनरपि तमेव दर्शयति— | फिर भी श्रुति उसे ही दिखलाती है—
स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात्प्रपञ्चः परिवर्ततेऽयम् । धर्मावहं पापनुदं भगेशं ज्ञात्वात्मस्थममृतं विश्वधाम ॥ ६ ॥
वह, जिससे कि यह प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, वृक्षाकार और कालाकारसे अतीत तथा प्रपञ्चसे भिन्न है। धर्मकी प्राप्ति करानेवाले और पापका नाश करनेवाले उस ऐश्वर्यके अधिपति को जानकर [पुरुष] आत्मस्थ, अमृतस्वरूप और विश्वाधार [परमात्माको प्राप्त हो जाता है] ॥६॥
स वृक्षेति। स वृक्षाकारेभ्यः | 'स वृक्षः' इत्यादि। वह वृक्षा- कालाकारेभ्यः परो वृक्षकाला- | कार और कालाकारसे पर (उत्कृष्ट) कृतिभिः परः। वृक्षः संसार- | है, 'वृक्ष' शब्दसे यहाँ संसारवृक्ष वृक्षः। उक्तं च—"ऊर्ध्वमूलो | समझना चाहिये; कहा भी है— | "ऊपरकी ओर मूल और नीचेकी ओर ह्यवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सना- | शाखाओंवाला यह सनातन अश्वत्थ
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२७
तनः" ( क० उ० २ । ३ । वृक्ष है" इत्यादि । अन्य अर्थात् १ ) इति । अन्यः प्रपञ्चा- प्रपञ्चसे असंस्पृष्ट है । जिस ईश्वरसे संस्पृष्ट इत्यर्थः । यस्मादीश्वरात् प्रपञ्च प्रवृत्त होता है, धर्मकी प्राप्ति प्रपञ्चः परिवर्तते । धर्मावहं करानेवाले और पापका उच्छेद पापनुदं भगस्यैश्वर्यादीरीशं स्वामिनं करानेवाले उस भग यानी ऐश्वर्यादिके ज्ञात्वात्मस्थमात्मनि बुद्धौ स्थित- स्वामीको जानकर [पुरुष] आत्मस्थ- आत्मा यानी बुद्धिमें स्थित, अमृत- मममृतममरणधर्माणं विश्वधाम विश्व- अमरणधर्मा, विश्वधाम—विश्वके स्याधारभूतं याति । स तत्त्वतोऽन्य आधारभूत परमात्माको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि 'वह (जीव) इति सर्वत्र सम्बध्यते ॥ ६ ॥ पृथिवी आदि तत्त्वोंसे भिन्न है'—इस वाक्यका सबके साथ सम्बन्ध है ॥६॥
ज्ञानियोंके तत्त्वानुभवका उल्लेख इदानीं विद्वदनुभवं दर्शयन्नु- अब विद्वान्का अनुभव दिखलाते क्तमर्थं दृढीकरोति— हुए श्रुति उपर्युक्त अर्थको पुष्ट करती है—
तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् । पतिं पतीनां परमं परस्ता- द्विद्दाम देवं भुवनेशमीड्यम् ॥ ७ ॥
ईश्वरोंके परम महान् ईश्वर, देवताओंके परमदेव, पतियोंके परमपति, अव्यक्तादि परसे पर तथा विश्वके अधिपति उस स्तवनीय देवको हम जानते हैं ॥७॥
२२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६
२२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६
तमीश्वराणामिति । तमीश्वराणां | 'तमीश्वराणाम्' इत्यादि । उस वैवस्वतयमादीनां परमं महेश्वरं | वैवस्वत यमादि ईश्वरों (लोकपालों) तं देवतानामिन्द्रादीनां परमं च | के परम महेश्वर, इन्द्रादि देवताओंके दैवतं पतिं पतीनां प्रजापतीनां | परम देव, पतियों—प्रजापतियोंके परमं परस्तात्परतोऽक्षरात् । | परम पति, पर—अक्षरसे पर, वदाम देवं द्योतनात्मकं भुवना- | भुवनोंके ईश्वर, देव—द्योतनात्मक, नाधीशं भुवनेशम् । ईड्यं स्तु- | ईड्य-स्तुत्य [ परमात्माको ] हम त्यम् ॥७॥ | जानते हैं ॥७॥ —•••— परमेश्वरकी महत्ता कथं महेश्वरत्वम् ? इत्याह— | उसकी महेश्वरता किस प्रकार है, सो बतलाते हैं— न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥८॥ उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बढ़- कर भी कोई दिखायी नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और बलक्रिया है ॥८॥ न तस्येति । न तस्य कार्यं | 'न तस्य' इत्यादि । उसके शरीरं करणं चक्षुरादि विद्यते । न | कार्य—शरीर और करण—चक्षु आदि इन्द्रियाँ नहीं हैं । उसके तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते श्रूयते | समान और उससे बढ़कर भी कोई देखा या सुना नहीं जाता । उसकी वा । परास्य शक्तिर्विविधैव | पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २२९
श्रूयते । सा च स्वाभाविकी | है और वह स्वाभाविकी ज्ञानबल- ज्ञानबलक्रिया च ज्ञानक्रिया | क्रिया अर्थात् ज्ञानक्रिया और बल- बलक्रिया च । ज्ञानक्रिया सर्व- | क्रिया है । ज्ञानक्रिया—सम्पूर्ण विषयज्ञानप्रवृत्तिः । बलक्रिया | विषयोंके ज्ञानकी प्रवृत्ति और बल- स्वसंनिधिमात्रेण सर्वं वशीकृत्य | क्रिया—अपनी सन्निधिमात्रसे सबको नियमनम् ॥ ८ ॥ | वशमें करके नियमन करना ॥८॥
यस्मादेवं तस्मात्— | क्योंकि ऐसा है इसलिये— न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके न चेशिता नैव च तस्य लिङ्गम् । स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं है, न कोई शासक या उसका चिह्न ही है । वह सबका कारण है और इन्द्रियाधिष्ठाता जीवका स्वामी है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है और न स्वामी है ॥९॥ न तस्य कश्चित्पतिरस्ति लोके । | लोकमें उसका कोई स्वामी नहीं अत एव न तस्येशिता नियन्ता । | है, अतः उसका कोई ईशिता— नैव च तस्य लिङ्गं चिह्नं धूम- | नियन्ता भी नहीं है । उसका कोई स्थानीयं येनानुमीयेत । स | लिङ्ग-धूमादिरूप चिह्न भी नहीं है, कारणं सर्वस्य कारणम् । करणा- | जिससे अनुमान किया जा सके । वह धिपाधिपः परमेश्वरः । यस्मादेवं | सबका कारण और करणाधिप—परमेश्वर तस्मान्न तस्य कश्चिज्जनिता | है । क्योंकि ऐसा है, इसलिये उसका जनयिता न चाधिपः ॥ ९ ॥ | कोई जनिता—जनयिता अर्थात् उत्पत्ति- | कर्ता और स्वामी भी नहीं है ॥९॥
२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६
२३० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ६ ब्रह्मसायुज्यके लिये परमेश्वरसे प्रार्थना इदानीं मन्त्रदृगभिप्रेतमर्थं | अब श्रुति मन्त्रद्रष्टा [ ऋषियों ] प्रार्थयते— | के अभिमत पदार्थके लिये प्रार्थना | करती है— यस्तन्तुनाभ इव तन्तुभिः प्रधानजैः स्वभावतो देव एकः स्वमावृणोत् । स नो दधाद्ब्रह्माप्ययम् ॥१०॥ तन्तुओंसे मकड़ीके समान जिस एकमात्र देवने स्वभावतः ही प्रधान- जनित कार्योंसे अपनेको आवृत कर लिया है वह हमें ब्रह्मसे एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ यस्तन्तुनाभ इति । यथो- | ‘यस्तन्तुनाभः’ इत्यादि । जिस र्णनाभिरात्मप्रभवैस्तन्तुभिरात्मा- | प्रकार मकड़ी अपनेसे उत्पन्न हुए नमेव समावृणोति तथा प्रधान- | तन्तुओंसे अपनेहीको आवृत कर जैरव्यक्तप्रभवैर्नामरूपकर्मभिस्त- | लेती है उसी प्रकार प्रधानज अर्थात् न्तुस्थानीयैः स्वमात्मानमावृणोत् | अव्यक्तसे उत्पन्न हुए तन्तुरूप नाम, सञ्छादितवान्स नो महं ब्रह्मण्य- | रूप और कर्मोंसे जिसने अपनेको प्ययं ब्रह्माप्ययमेकीभावं दधाद्- | आच्छादित कर रखा है वह हमें ब्रह्ममें दात्वित्यर्थः ॥१०॥ | लय यानी एकीभाव प्रदान करे ॥१०॥ परमेश्वरके स्वरूपका निर्देश पुनरपि तमेव करतलन्यस्ता- | फिर भी हथेलीपर रखे हुए | आँवलेके समान उसीको साक्षात् मलकवत्साक्षाद्दर्शयंस्तद्विज्ञानादेव | रूपसे दिखाते हुए श्रुति दो मन्त्रोंद्वारा | इस बातको प्रदर्शित करती है कि परमपुरुषार्थप्राप्तिर्नान्येनेति दर्श- | उसके विशेष ज्ञानसे ही परमपुरुषार्थकी यति मन्त्रद्वयेन— | प्राप्ति होती है, और किसीसे नहीं—
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१
अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २३१ एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा । कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥११॥ समस्त प्राणियोंमें स्थित एक देव है; वह सर्वव्यापक, समस्त भूतोंका अन्तरात्मा, कर्मोंका अधिष्ठाता, समस्त प्राणियोंमें बसा हुआ, सबका साक्षी, सबको चेतनत्व प्रदान करनेवाला, शुद्ध और निर्गुण है ॥११॥ एको देव इति । एको- | ‘एको देवः’ इत्यादि । सर्वभूतोंमें ऽद्वितीयो देवो द्योतनस्वभावः सर्व- | गूढ—समस्त प्राणियोंमें छिपा हुआ भूतेषु गूढः सर्वप्राणिषु संवृतः । | एक—अद्वितीय देव—प्रकाशनशील सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा स्व- | परमात्मा है । [ वह ] सर्वव्यापी, रूपभूत इत्यर्थः । कर्माध्यक्षः | सर्वभूतान्तरात्मा अर्थात् सबका स्वरूपभूत, कर्माध्यक्ष—समस्त सर्वप्राणिकृतविचित्रकर्माधिष्ठाता । | प्राणियोंके किये हुए विभिन्न कर्मोंका अधिष्ठाता, सर्वभूताधिवास सर्वभूताधिवासः सर्वप्राणिषु | अर्थात् समस्त प्राणियोंमें निवास करने- वसतीत्यर्थः । सर्वेषां भूतानां | वाला, समस्त भूतोंका साक्षी अर्थात् साक्षी सर्वद्रष्टा । “साक्षाद्द्रष्टरि | सर्वद्रष्टा है, क्योंकि “साक्षाद्द्रष्टरि संज्ञायाम्” (पा० सू० ५।२।९१) | संज्ञायाम्” इस पाणिनिसूत्ररूप इति स्मरणात् । चेता चेतयिता । | स्मृतिके अनुसार ‘साक्षी’ शब्दका अर्थ द्रष्टा है । तथा वह चेता— केवलो निरुपाधिकः । निर्गुणः | चेतनत्व प्रदान करनेवाला, केवल— उपाधिशून्य और निर्गुण—सत्त्वादि सत्त्वादिगुणरहितः ॥११॥ | गुणरहित है ॥११॥