श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
तस्मादज्ञानमूलो हि | समस्त प्राणियोंको अज्ञानके कारण संसारः सर्वदेहिनाम् ॥ | ही संसारकी प्राप्ति हुई है । आत्मा नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा | तो नित्य, सर्वगत, कूटस्थ और कूटस्थो दोषवर्जितः । | निर्दोष है । वह एक अपनी एकः स भिद्यते शक्त्या | मायाशक्तिके द्वारा ही भेदको प्राप्त मायया न स्वभावतः ॥ | होता है, स्वरूपतः नहीं । अतः तस्मादद्वैतमेवाहु- | मुनियोंने परमार्थतः अद्वैत ही बतलाया र्मुनयः परमार्थतः । | है; विद्वानोंने इस जगत्को ज्ञानस्वरूप ज्ञानस्वरूपमेवाहु- | ही कहा है । जिनकी दृष्टि दूषित है र्जगदेतद्विचक्षणाः ॥ | वे अन्यलोग ही अज्ञानवश इसे अर्थस्वरूपमज्ञाना- | परमार्थस्वरूप समझते हैं । चैतन्य त्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः । | आत्मा तो स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण कूटस्थो निर्गुणो व्यापी | और सर्वव्यापक है । भ्रान्तिदर्शी चैतन्यात्मा स्वभावतः ॥ | लोगोंको ही वह पदार्थाकार प्रतीत दृश्यते ह्यर्थरूपेण | होता है । जिस समय पुरुष आत्माका पुरुषैर्भ्रान्तदर्शिभिः । | परमार्थरूपसे साक्षात्कार करता है यदा पश्यति चात्मानं | और इस द्वैतप्रपञ्चको मायामात्र केवलं परमार्थतः ॥ | समझता है उसी समय उसे शान्ति मायामात्रमिदं द्वैतं | प्राप्त होती है । अतः केवल विज्ञान तदा भवति निर्वृतः । | ही है, प्रपञ्च या संसार नहीं है ।” तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ॥” एवं श्रुत्यादिना नामादिकारणो- | इस प्रकार श्रुति आदिके द्वारा [प्रपञ्चस्य] पन्यासमुखेन स्व- | नामादिके कारणोंका दिग्दर्शन कराने- [मिथ्यात्वम्] रूपेण च बाधित- | से तथा स्वरूपतः बाधित होनेके त्वात्प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमवगम्यते । | कारण प्रपञ्चका मिथ्यात्व जाना जाता अस्थूलादिलक्षणस्य ब्रह्मण- | है। ब्रह्म अस्थूलादि लक्षणोंवाला है, स्तद्विपरीतस्थूलाकारो मिथ्या | अतः उससे विपरीत स्थूलाकार
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५
भवितुमर्हति । यथैकस्य | प्रपञ्च मिथ्या होना ही चाहिये । जिस चन्द्रमसस्तद्विपरीतद्वितीयाकार- | प्रकार एक चन्द्रमाका दूसरा आकार स्तद्वत् । | मिथ्या होता है उसी प्रकार इसे | समझना चाहिये । तथा च सूत्रकारो “न स्थान- | इसी प्रकार सूत्रकार भगवान् (पार्श्व टिप्पणी: सूत्रक्रमतोपन्यास-) तोऽपि परस्योभय- | व्यासने भी “न स्थानतोऽपि परस्यो- (पार्श्व टिप्पणी: पूर्वकं ब्रह्मणो) लिङ्गं सर्वत्र हि” | भयलिङ्गं सर्वत्र हि” इस सूत्रद्वारा स्व- (पार्श्व टिप्पणी: निर्विशेषत्व-) ( ब्र० सू० ३ । | रूपसे और उपाधिसे भी ब्रह्मके[सविशेष (पार्श्व टिप्पणी: समर्थनम्) २ । ११ ) | और निर्विशेष ] दो परस्पर-विरुद्ध रूप इति स्वरूपत उपाधितश्च विरुद्ध- | सम्भव न होनेके कारण ब्रह्म निर्विशेष रूपद्वयासम्भवान्निर्विशेषमेव ब्रह्मे- | ही है ऐसा उपपादन कर [ फिर “न | भेदादिति चेन्न प्रत्येकमद्वचनात्” त्युपपाद्य “न भेदात्”... ( ब्र० | इस सूत्रके ] ‘न भेदात्’ इस सू० ३ । २ । १२) इति भेद- | अंशद्वारा ऐसी आशंका कर कि ‘क्या | भेदश्रुतिके सामर्थ्यसे ब्रह्मको सविशेष श्रुतिबलात्किमिति सविशेषमपि | भी नहीं माना जा सकता’ “नै ब्रह्म नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्क्य “न | प्रत्येकमद्वचनात्” इस अंशसे यह प्रत्येकमद्वचनात्” इत्युपाधि- | निश्चय किया है कि उपाधिजनित | भेद श्रुतिसे ही बाधित होनेके कारण भेदस्य श्रुत्यैव बाधितत्वादभेद- | अभेदश्रुतिके सामर्थ्यसे सविशेष श्रुतिबलात्सविशेषस्य ग्रहणायो- | ब्रह्मका ग्रहण नहीं किया जा सकता, गान्निर्विशेषमेवेत्युपपाद्य “अपि | इसलिये वह निर्विशेष ही है । इसके
१. परब्रह्म उपाधिसे भी [ सविशेष-निर्विशेष ] उभयरूप नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वत्र उसका निर्विशेषरूपसे ही वर्णन किया गया है । २. [ यदि कहो ] ऐसा नहीं है, क्योंकि [ ‘चतुष्पाद् ब्रह्म’ ‘षोडशकलं ब्रह्म’ इत्यादि रूपसे ] प्रत्येक विद्यामें उसका भेदरूपसे वर्णन किया है । ३. तो ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक औपाधिक भेदमें [ ‘अयमेव स योऽयमात्मा’ इत्यादि श्रुतिके द्वारा ] उसका अभेद ही बतलाया गया है ।
४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
चैवमेके” (ब्र० सू० ३।२।१३) | पश्चात् “अपि चैवमेके” इस सूत्रसे इति भेदनिन्दापूर्वकमभेदमेवैके | यह निश्चय किया है कि कोई-कोई शाखिनः समामनन्ति—“मन- | शाखावाले भेददृष्टिकी निन्दा करते सैवेदमाप्तव्यम्” (क० उ० ४। | हुए अभेदका ही प्रतिपादन करते ११)। “नेह नानास्ति किञ्चन।” | हैं। [ उनका कथन है कि ] “यह मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह | मनसे ही प्राप्त किया जा सकता है”, नानेव पश्यति” (बृ० उ० ४। | “यहाँ नाना कुछ नहीं है”, ४।१९)। “एकधैवानुद्रष्टव्य- | “यहाँ जो अनेकवत् देखता है वह मिति” (बृ० उ० ४।४।२०)। | मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है”, “भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा | “उसे एकरूप ही देखना चाहिये”, सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्” | तथा “भोक्ता, भोग्य और प्रेरक (श्वेता० उ० १। १२) इति | मानकर जिसे तीन प्रकारका कहा सर्वभोग्यभोक्तृनियन्तृलक्षणस्य | गया है वह सब ब्रह्म ही है” प्रपञ्चस्य ब्रह्मैकस्वभावताभिधीयत | इत्यादि श्रुतियोंसे भोक्ता, भोग्य और इति। | प्रेरकरूप सम्पूर्ण प्रपञ्च एकमात्र | ब्रह्मस्वरूप ही कहा गया है। पुनरपि निर्विशेषपक्षे दृढीकृते | इस प्रकार फिर भी निर्विशेष सविशेषत्वमाशङ्क्य किमित्येकस्वरूपस्य | पक्षकी ही पुष्टि होनेपर ‘एकस्वरूप तन्निरसनं उभयस्वरूपासंभवे- | ब्रह्मका उभयरूप होना असम्भव श्रुतिविरोध- | है, इसलिये ब्रह्मको निराकार ही परिहारश्च ऽनाकारमेव ब्रह्माव- | क्यों निश्चय किया जाता है उससे धार्यते न पुनर्विपरीतमित्याशङ्क्य | विपरीत साकार क्यों नहीं माना जाता’ “अरूपवदेव हि तत्प्रधानत्वात्” | ऐसी आशंका कर “अरूपवदेव हि (ब्र० सू० ३।२।१४) इति रूपाद्या- | तत्प्रधानत्वात्” इस सूत्रसे यह कहा
१. अपि तु किसी-किसी शाखावाले इस प्रकार ही [ अर्थात् भेदकी निन्दा- पूर्वक अभेदका ही ] प्रतिपादन करते हैं । २. ब्रह्म रूपरहित ही है, क्योंकि प्रधानतया ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली ‘अस्थूलम्’ इत्यादि श्रुति निर्गुणप्रधान ही है ।
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४७
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४७
[संस्कृत-मूलम्] काररहितमेव ब्रह्मावधारयितव्यम्। कस्मात् ? तत्प्रधानत्वात् । “अ- स्थूलमनण्वह्रस्वमदीर्घम्” (बृ० उ० ३।८।८) “अशब्दमस्पर्श- मरूपमव्ययम्” (क० उ० ३। १५) । “आकाशो वै नाम नाम- रूपयोर्निर्वहिता ते यदन्तरा तद्- ब्रह्म” (छा० उ० ४।१४।७) “तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरम- बाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्ये- तदनुशासनम्” (बृ० उ० २।५। १९) इत्येवमादीनि निष्प्रपञ्च- ब्रह्मात्मतत्त्वप्रधानानि। इतराणि कारणब्रह्मविषयाणि न तत्प्रधा- नानि । तत्प्रधानान्यतत्प्रधानेभ्यो बलीयांसि भवन्ति । अतस्तत्पर-
[हिन्दी-भाषार्थः] है कि ब्रह्मको रूपादि आकारोंसे रहित ही निश्चय करना चाहिये। क्यों?— इसलिये कि निर्विशेष वाक्य ही ब्रह्मका प्रधानतया प्रतिपादन करते हैं। यथा—“ब्रह्म न स्थूल है, न अणु है, न ह्रस्व है, न दीर्घ है,” ““ब्रह्म शब्द स्पर्श और रूपहीन तथा अविनाशी है”, “आकाश (आकाशसंज्ञक ब्रह्म) ही नामरूपका निर्वाहक है, वे जिसके अन्तर्गत हैं वह ब्रह्म है”, “वह ब्रह्म कारण-कार्यसे रहित तथा अन्तर्बाह्यशून्य है यह आत्मा सबका अनुभव करनेवाला ब्रह्म है—यही वेदकी आज्ञा है” इत्यादि वाक्य प्रधानतया निष्प्रपञ्च ब्रह्मात्मतत्त्वके ही प्रतिपादक है। * अन्य जो कारणब्रह्मविषयक वाक्य हैं उनका मुख्य तात्पर्य ब्रह्मतत्त्वके प्रतिपादनमें नहीं है। किसी भी ज्ञातव्य वस्तुके सम्बन्धमें अतत्प्रधान वाक्योंकी अपेक्षा तत्प्रधान वाक्य ही बलवान् होते हैं। अतः प्रधानतया ब्रह्म-तत्त्वका प्रतिपादन करनेवाली
[पाद-टिप्पणी / Footnotes] * उनका मुख्य तात्पर्य प्रपञ्चको चेतनसे अभिन्न सिद्ध करनेमें ही है। १. जिन वाक्योंमें ज्ञातव्य वस्तुकी चर्चा तो रहती है, पर उनका मुख्य तात्पर्य उस वस्तुके स्वरूपका प्रतिपादन करनेमें नहीं होता, वे ‘अतत्प्रधान’ कहलाते हैं। २. जो वाक्य मुख्यतया ज्ञातव्य ‘वस्तु’ के तत्त्वका ही प्रतिपादन करनेमें तात्पर्य रखते हैं, वे ‘तत्प्रधान’ कहे जाते हैं।
४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ श्रुतिप्रतिपन्नत्वान्निर्विशेषमेव श्रुतियोंसे ज्ञात होनेके कारण ब्रह्मको ब्रह्मावगन्तव्यं न पुनः सविशेष- निर्विशेष ही मानना चाहिये, मिति निर्विशेषपक्षमुपपाद्य का सविशेष नहीं। इस प्रकार निर्विशेष तर्ह्याकारवद्विषयाणां श्रुतीनां गतिः? पक्षका समर्थन करनेपर ऐसी आशंका इत्याकाङ्क्षायां "प्रकाशवच्चा- होनेपर कि 'फिर साकारब्रह्मपरा वैयर्थ्यात्" (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी क्या गति होगी?' १५) इति चन्द्रसूर्यादीनां जला- "प्रकाशवच्चावैयर्थ्यात्" इस सूत्रसे द्युपाधिकृतनानात्ववच्च ब्रह्मणो- यह बतलाया है कि जलादि ऽप्युपाधिकृतनानात्वरूपस्य विद्य- उपाधियोंके कारण प्रतीत होनेवाले मानत्वात्तदाकारवतो ब्रह्मण चन्द्र सूर्यादिके नानात्वके समान आकारविशेषोपदेश उपासनार्थो ब्रह्मका भी उपाधिकृत नानात्वरूप न विरुध्यते । विद्यमान है। अतः उपासनाके लिये एवमवैयर्थ्यं नानाकारब्रह्म- औपाधिक आकारवान् ब्रह्मके किसी विषयाणां वाक्या- आकारविशेषका उपदेश करनेमें भी निर्विशेषपक्ष- नामिति भेदश्रुती- कोई विरोध नहीं है। दृढीकरणम् नामौपाधिकब्रह्म- इस प्रकार नानारूप ब्रह्मविषयक विषयत्वेनावैयर्थ्यमुक्त्वा पुनरपि श्रुतिवाक्य भी व्यर्थ नहीं हैं। इस तरह निर्विशेषमेव ब्रह्मेति द्रढयितुम् “आह औपाधिकब्रह्मविषयिणी होनेसे भेद- च तन्मात्रम्” (ब्र० सू० ३।२। श्रुतियोंकी अव्यर्थता बतलाकर फिर १६) इति। "स यथा सैन्ध- भी यह दृढ करनेके लिये कि वघनोऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नो रस- 'ब्रह्म निर्विशेष ही है' उन्होंने "आह च तन्मात्रम्" इस सूत्रकी अवतारणा की है। इस सूत्रमें “जिस प्रकार नमकका डला बाहर-भीतरसे शून्य
१. [ भिन्न-भिन्न उपाधियोंमें तदनुरूप आकार धारण करनेवाले ] प्रकाशके समान उपाधिभेदसे सविशेष ब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति भी व्यर्थ नहीं है। २. श्रुतिने ब्रह्मकी चिन्मात्रताका प्रतिपादन किया है।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९
घन एव । एवं वा अरेऽय- | [ अर्थात् बाहर-भीतर एक समान मात्मानन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञा- | केवल घनीभूत रस ही है] इसी प्रकार नघन एव” ( बृ० उ० ४ । | यह आत्मा बाहर-भीतरके भेदसे ५ । १३) इति श्रुत्युपन्यासेन | रहित सब-का-सब घनीभूत प्रज्ञान विज्ञानव्यतिरिक्तरूपान्तराभावमु- | ही है” इस श्रुतिकी व्याख्या करते पन्यस्य “दर्शयति चाथो अपि | हुए उन्होंने यह दिखलाकर कि स्मर्यते” (ब्र० सू० ३ । २ । १७) | विज्ञानसे भिन्न और कोई रूप है ही इति । “अथात आदेशो नेति | नहीं “दर्शयति चाथो अपि स्मर्यते” नेति” (बृ० उ० २ । ३ । ६) । | यह सूत्र कहा है । इसमें “इससे “अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | आगे श्रुतिका यही आदेश है—यह दितादधि” (के० उ० १ । ३) । | आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है”, “यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य | “वह विदितसे अन्य है और अविदितसे मनसा सह” (तैत्ति० उ० २।४।१)। | भी परे है”, “जहाँसे मनके सहित “प्रत्यस्तमितभेदं यत् | वाणी उसे न पाकर लौट आती है”, सत्तामात्रमगोचरम् । | “जो भेदसे रहित, सत्तामात्र, वाणीका वचसामात्मसंवेद्यं | अविषय और स्वसंवेद्य है वही ब्रह्म- तज्ज्ञानं ब्रह्मसंज्ञितम् ।” | संज्ञक ज्ञान है”, “सर्वरूपसे विलक्षण “विश्वस्वरूपवैरूप्यं | होना—यह परमात्माका लक्षण है” लक्षणं परमात्मनः” | इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंका उल्लेख करके इत्यादिश्रुतिस्मृत्युपन्यासमु- | ब्रह्म सर्वभेदशून्य ही है—ऐसा खेन प्रत्यस्तमितभेदमेव ब्रह्मेत्यु- | प्रतिपादन कर उन्होंने “अतएव पपाद्य “अत एव चोपमा | चोपमा सूर्यकादिवत्” यह सूत्र सूर्यकादिवत्” ( ब्र० सू० ३ । | कहा है । [ इसमें यह बतलाया है—] २ । १८) इति । यत एव | क्योंकि परमात्मा चैतन्यमात्रस्वरूप,
१. 'अथात आदेशो नेति-नेति' इत्यादि श्रुति ब्रह्मको निर्विशेष प्रदर्शित करती है और 'अनादिमत्परं ब्रह्म' इत्यादि स्मृति भी ऐसा ही कहती है । २. इसीलिये [ सविशेष ब्रह्मके विषयमें ] जलप्रतिबिम्बित सूर्यके समान उपमा दी जाती है ।
५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
चैतन्यमात्ररूपो नेति नेत्यात्मको | 'यह भी नहीं, यह भी नहीं' इत्यादि विदिताविदिताभ्यामन्यो वाचाम- | रूपसे उपलक्षित स्वरूपवाला, ज्ञात गोचरः प्रत्यस्तमितभेदो विश्व- | और अज्ञातसे भिन्न, वाणीका अविषय, स्वरूपविलक्षणस्वरूपः परमात्मा- | सब प्रकारके भेदसे रहित और विद्योपाधिको भेदः । अत एव | सम्पूर्ण रूपोंसे विलक्षण स्वरूपवाला चास्योपाधिनिमित्तामपारमार्थिकीं | है इसलिये भेद अविद्यारूप उपाधिके विशेषवत्तामभिप्रेत्य जलसूर्यादि- | कारण है। इसीसे इसकी उपाधि- रिवेत्युपमा दीयते मोक्षशास्त्रेषु । | निमित्तक अपारमार्थिकी विशेषरूपता- | के आशयसे ही मोक्षशास्त्रोंमें 'भेद | जलमें प्रतिबिम्बित सूर्यादिके समान | है' ऐसी उपमा दी जाती है। “आकाशमेकं हि यथा | घटादिषु पृथक्पृथक् । | “जिस प्रकार घटादि उपाधियोंमें तथात्मैको ह्यनेकश्च | एक ही आकाश पृथक्-पृथक्-सा जलाधारेष्विवांशूमान् ॥” | भासने लगता है उसी प्रकार विभिन्न ( याज्ञ० ३ । १४४ ) | जलाशयोंमें प्रतिबिम्बित हुए सूर्यके “एक एव तु भूतात्मा | समान एक ही आत्मा अनेक-सा भूते भूते व्यवस्थितः । | जान पड़ता है।” “विभिन्न भूतोंमें एकधा बहुधा चैव | एक ही भूतात्मा स्थित है, जो जलमें दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥” | दिखायी देते हुए चन्द्रमाओंके समान “यथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वा- | एक और अनेक रूपोंमें भी देखा नपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन् । | जाता है।” “जिस प्रकार यह उपाधिना क्रियते भेदरूपो | ज्योतिःस्वरूप एक ही सूर्य भिन्न-भिन्न देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा॥” | जलाशयोंका अनेक रूप होकर | अनुगमन करता है उसी प्रकार | विभिन्न क्षेत्रोंमें यह एक ही अजन्मा | आत्मदेव उपाधिके द्वारा अनेक रूप | कर दिया जाता है।”
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५१
इति दृष्टान्तबलेनापि निर्वि- | इस प्रकार दृष्टान्तके बलसे भी शेषमेव ब्रह्मेत्युपपाद्य "अम्बुवद- | यही सिद्ध करके कि ब्रह्म निर्विशेष ग्रहणात्" (ब्र० सू० ३।२।१९) | ही है "अम्बुवद्ग्रहणात्तु न तथा- इत्यात्मनोऽमूर्त्तत्वेन सर्वगतत्वेन | त्त्वम्" इस सूत्रसे यह आशंका की जलसूर्यादिवन्मूर्त्तसंभिन्नदेशस्थि- | है कि आत्मा अमूर्त्त और सर्वगत है; तत्वाभावाददृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | अतः जल-सूर्यादिके समान उसका सादृश्यं नास्तीत्याशङ्क्य "वृद्धि- | मूर्त्तरूपसे किसी देशविशेषमें स्थित हासभाक्त्वम्" (ब्र० सू० ३। | होना सम्भव न होनेके कारण इन २।२०) इति न हि दृष्टान्त- | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकोंकी समता दार्ष्टान्तिकयोर्विवक्षितांशमुक्त्वा | नहीं है। इसपर "वृद्धिहासभाक्त्व- सर्वसारूप्यं केनचिद्दर्शयितुं श- | मन्तर्भावादुभयसामञ्जस्यादेवम्" इस क्यते। सर्वसारूप्ये दृष्टान्तदार्ष्टा- | सूत्रसे यह दिखलाया है कि विवक्षित न्तिकभावोच्छेद एव स्यात्। | अंशको छोड़कर दृष्टान्त और वृद्धिहासभाक्त्वमत्र विवक्षितम्। | दार्ष्टान्तिककी सर्वांशमें समानता जलगतसूर्यप्रतिविम्बं जलवृद्धौ | कोई भी नहीं दिखला सकता। यदि वर्धते जलह्रासे च हसति जल- | सर्वांशमें समानता हो जायगी तो | उनका दृष्टान्त-दार्ष्टान्तिक भाव ही | नहीं रहेगा। यहाँ ( जलसूर्यादि | दृष्टान्तमें ) तो उनका वृद्धिहासयुक्त | होना ही विवक्षित है। जिस प्रकार | जलमें पड़ा हुआ सूर्यका प्रतिबिम्ब | जलके बढ़नेपर बढ़ता, जलके घटने-
१. सूर्यसे भिन्न जलके समान सविशेष ब्रह्मकी उपाधि उससे भिन्न गृहीत न होनेके कारण सूर्यके प्रतिबिम्बसे उसकी उपमा नहीं दी जा सकती। २. जिस प्रकार सूर्यप्रतिविम्ब जलकी वृद्धि और ह्रास होनेपर स्वयं भी वृद्धि और ह्रासका भागी होता है उसी प्रकार आत्मा वास्तवमें अविकारी और एकरूप होनेपर भी देहादि उपाधियोंके अन्तर्भूत होकर उनके वृद्धि और ह्रासका भागी होता है। इस प्रकार दृष्टान्त और दार्ष्टान्त दोनोंमें सामञ्जस्य होनेके कारण कोई विरोध नहीं है।
५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ]
५२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ]
चलने चलति जलभेदे भिद्यत | पर घटता, जलके चलनेपर चलता इत्येवं जलधर्मानुविधायि भवति | और जलका भेद होनेपर भिन्न-सा न तु परमार्थतः सूर्यस्य तत्त्व- | हो जाता है, इस प्रकार वह जलके मस्ति । एवं परमार्थतोऽविकृत- | धर्मोका अनुकरण करता है, परमार्थतः मेकरूपमपि सद्ब्रह्म देहाद्युपाध्य- | सूर्यमें वे विकार वास्तविक नहीं न्तर्भावाद्भवत एवोपाधिधर्मान्वृ- | होते, उसी प्रकार परमार्थतः द्विह्रासादीनिति विवक्षितांशप्रति- | अविकारी और एकरूप होनेपर भी पादनेन दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः | ब्रह्म देहादि उपाधियोंके अन्तर्गत सामञ्जस्यमुक्त्वा "दर्शनाच्च" | रहनेसे उन उपाधियोंके वृद्धि-ह्रासादि (ब्र० सू० ३।२।२१) इति | धर्मोको ग्रहण करता ही है—इस "पुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः | प्रकार विवक्षित अंशके प्रतिपादनसे पुरः स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष | दृष्टान्त और दार्ष्टान्तिकका सामञ्जस्य आविशत्" (बृ० उ० २।५। | बतलाकर "दर्शनाच्च" इस सूत्रांशसे १८) । "इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप | "परमपुरुषने दो चरणोंवाला पुर(शरीर) ईयते" (बृ० उ० २।५। | बनाया, चार पैरोंवाला पुर बनाया १९) । "मायां तु प्रकृतिं | और वह पक्षी होकर उन पुरोंमें विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम्" | प्रवेश कर गया", "इन्द्र मायाद्वारा (श्वेता० उ० ४।१०) । "मायी | अनेक रूपवाला हो जाता है", सृजते विश्वमेतत्" (श्वेता० उ० | "मायाको प्रकृति जानो और ४।९) । "एकस्तथा सर्वभूता- | मायावीको महेश्वर", "मायावी इस न्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो | विश्वकी रचना करता है", "उसी बहिश्च" (क० उ० २।२।९। | प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका एक ही १०) । "एको देवः सर्वभूतेषु | अन्तरात्मा भिन्न-भिन्न रूपोंके अनुरूप गूढः" (श्वेता० उ० ६।११) । | हो गया है", "समस्त भूतोंमें | एक ही देव छिपा हुआ है",
१. श्रुतियाँ भी देहादि उपाधियोंमें ब्रह्मका अनुप्रवेश दिखलाती हैं ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५३ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 “स एतमेव सीमानं विदार्यैतया | “इस मूर्धसीमाको ही विदीर्ण कर वह द्वारा प्रापद्यत” (ऐत० उ० १ । ३ । | इसीके द्वारा शरीरमें प्रवेश कर गया”, १२) । “स एष इह प्रविष्ट आन- | “वह नखके अग्रभागसे लेकर शिखा- खाग्रेभ्यः” (बृ० उ० १ । ४ । | तक इस शरीरमें प्रवेश किये हुए है”, ७) । “तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्रावि- | “उसे रचकर वह उसीमें अनुप्रविष्ट शत्” (तैत्ति० उ० २ । ६ । १) | हो गया” इत्यादि श्रुतियोंद्वारा इत्यादिना परस्यैव ब्रह्मण उपा- | परब्रह्मको ही उपाधिकी प्राप्ति धियोगं दर्शयित्वा निर्विशेषमेव | दिखलाकर इस प्रकार उपसंहार ब्रह्म । भेदस्तु जलसूर्यादिवदौ- | किया है कि ब्रह्म निर्विशेष ही है; पाधिको मायानिबन्धन इत्युप- | उसका जो मायाजनित भेद है वह संहृतवान् । | जल-सूर्यादिके समान उपाधिके | कारण है । किञ्च ब्रह्मविदामनुभवोऽपि | इसके सिवा ब्रह्मवेत्ताओंका [प्रपञ्चस्य] प्रपञ्चस्य बाधकः । | अनुभव भी प्रपञ्चका बाधक है, [बाधितत्वे] तेषां निष्प्रपञ्चात्म- | क्योंकि उन्हें निष्प्रपञ्च आत्माका [ब्रह्मविदनुभव-] दर्शनस्य विद्यमान- | अनुभव रहता है । ऐसा ही यह [प्रदर्शनम्] त्वात् । तथा हि | श्रुति उनका अनुभव प्रदर्शित करती तेषामनुभवं दर्शयति । “यस्मिन् | है—“जिस स्थितिमें ज्ञानीको सब सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभू- | भूत आत्मा ही हो जाते हैं, उसमें द्विजानतः । तत्र को मोहः | उस एकत्वदर्शीके लिये क्या शोक कः शोक एकत्वमनुपश्यतः” | और क्या मोह हो सकता है ?” (ई० उ० ७) । “विदिते वेद्यं | “बोध हो जानेपर कोई ज्ञेय नहीं नास्ति” इति । एवं निर्वाणमनु- | रहता” इत्यादि । इसी प्रकार शासनम् । “यत्र वा अन्यदिव | निर्वाणका भी उपदेश किया है— स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्” (बृ० | “जहाँ अन्य-सा हो वहाँ अन्य उ० ४ । ३ । ३१) । “यत्र | अन्यको देखे,” किन्तु “जिस त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं | स्थितिमें इसे सब आत्मा ही हो गया पश्येत्” (बृ० उ० ४ । ५ । १५)। | है उसमें किससे किसे देखे ?” ˙ श्वेता० ३—
५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५४ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[उपनिषदारम्भप्रयोजनोपसंहारः]
"यदेतद्दृश्यते मूर्त्त- मेतज्ज्ञानात्मनस्तव । भ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ति जगद्रूपमयोगिनः ॥ ये तु ज्ञानविदः शुद्ध- चेतसस्तेऽखिलं जगत् । ज्ञानात्मकं प्रपश्यन्ति त्वद्रूपं पारमेश्वरम् ॥" (विष्णुपु० १ । ४ । ३९, ४१) "निदाघोऽप्युपदेशेन तेनाद्वैतपरोऽभवत् । सर्वभूतान्यशेषेण ददर्श स तदात्मनः ॥ तथा ब्रह्म ततो मुक्ति- मवाप परमां द्विजः ।" (विष्णुपु० २ । १६ । १९-२०) "अत्रात्मव्यतिरेकेण द्वितीयं यो न पश्यति । ब्रह्मभूतः स एवेह वेदशास्त्र उदाहृतः ॥"
"यह जो कुछ मूर्त्त जगत् दिखायी देता है वह ज्ञानस्वरूप आपका ही रूप है। अज्ञानीलोग भ्रान्तिज्ञानके कारण इसे जगद्रूप देखते हैं। किन्तु जो शुद्धचित्त ज्ञानवान् पुरुष हैं वे इस सम्पूर्ण जगत्को आप ज्ञानस्वरूप परमात्माका ही स्वरूप देखते हैं।" "ऋभुके उस उपदेशसे निदाघ भी अद्वैतपरायण हो गया और सब प्राणियोंको सर्वथा आत्मस्वरूप देखने लगा। तथा उसे ब्रह्मसाक्षात्कार हो गया। हे द्विज ! फिर उसे आत्यन्तिक मोक्षपद प्राप्त हो गया।" "इस लोकमें जो पुरुष आत्मासे भिन्न अन्य कुछ नहीं देखता उसीको वेद और शास्त्रोंमें ब्रह्मभूत कहा है।"
इत्येवं श्रुतिस्मृतियुक्तितोऽनुभवतश्च प्रपञ्चस्य बाधितत्वादत्यन्तविलक्षणानामसदृशरूपाणां मधुरतिक्तश्वेतपीतादीनामपि परस्पराध्यासदर्शनादमूर्तेऽप्याकाशे तलमलिनताद्यध्यासदर्शनादात्मानात्मनोरत्यन्तविलक्षणयोर्मूर्त्ताम्-
इस प्रकार श्रुति, स्मृति, युक्ति और अनुभवसे भी प्रपञ्च बाधित है, अत्यन्त विलक्षण और विभिन्नरूपवाले मधुर-तिक्त एवं श्वेत-पीतादि पदार्थोंका भी परस्पर अध्यास देखा जाता है और अमूर्त्त आकाशमें भी तलमलिनतादिका अध्यास देखा गया है, इसलिये परस्पर अत्यन्त विलक्षण मूर्त्तिमान् और मूर्त्तिहीन अनात्मा एवं
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५
[मूल संस्कृत (वाम स्तम्भ)] र्तयोरपि तथा संभवात्स्थूलोऽहं कृशोऽहमिति देहात्मनोरध्यासानु- भवात् । “हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥” (क० उ० १ । २ । १९) इत्यादिश्रुतिदर्शनाद् “य एनं वेत्ति हन्तारम्” (गीता २ । १९) “प्रकृतेः क्रियमाणानि” (गीता ३ । २७) इतिस्मृति- दर्शनाच्चाध्यासस्य प्रहाणाया- त्मैकत्वविद्याप्रतिपत्तय उपनिषदा- रम्यते ।
[हिन्दी अनुवाद (दक्षिण स्तम्भ)] आत्माका भी अध्यास होना सम्भव है तथा 'मैं स्थूल हूँ' 'मैं कृश हूँ' इस प्रकार देह और आत्माके अध्यासका अनुभव भी होता ही है, एवं “यदि मारनेवाला होकर किसीको मारना चाहता है अथवा मारा जानेवाला होकर अपनेको मारा हुआ मानता है तो वे दोनों ही आत्माको नहीं जानते, क्योंकि यह आत्मा तो न मारता है और न मारा जाता है” इत्यादि श्रुति देखी जाती है तथा “जो इसे मारनेवाला समझता है” “प्रकृतिके गुणोंसे किये जाते हुए कर्मोंको” इत्यादि स्मृति-वाक्य भी देखे जाते हैं; इसलिये इस अध्यासके नाश और आत्माकी एकताका बोध कराने- वाले ज्ञानकी प्राप्तिके लिये यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है।
५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ जगत्-कारण ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें ब्रह्मवादी ऋषियोंका विचार ब्रह्मवादिनो वदन्तीत्यादि । 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति' इत्यादि श्वेताश्वतराणां मन्त्रोपनिषत् । श्वेताश्वतरशाखाकी मन्त्रोपनिषद् है। उसकी यह सङ्क्षिप्त टीका आरम्भ की तस्या अल्पग्रन्था वृत्तिरारभ्यते— जाती है— हरिः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति— किं कारणं ब्रह्म कुतः स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठाः । अधिष्ठिताः केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्मविदो व्यवस्थाम् ॥ १ ॥ ॐ ब्रह्मवेत्तालोग कहते हैं—जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं ? किसके द्वारा जीवित रहते हैं ? कहाँ स्थित हैं ? और हे ब्रह्मविद्गण ! हम किसके द्वारा सुख-दुःखमें प्रेरित होकर व्यवस्था (संसारयात्रा) का अनुवर्तन करते हैं ? ॥ १ ॥ ब्रह्मवादिनो वदन्तीत्यादि । 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति' इत्यादि । जो ब्रह्मवादी थे अर्थात् जिनका ब्रह्मवादिनो ब्रह्मवदनशीलाः सर्वे स्वभाव ब्रह्मचर्चा करनेका था ऐसे लोग सब-के-सब मिलकर चर्चा करने संभूय वदन्ति किं कारणं ब्रह्म लगे—'किं कारणं ब्रह्म' (जगत्का कारणभूत ब्रह्म कैसा है ?) किम् किमिति स्वरूपविषयोऽयं प्रश्नः । इत्यादि वाक्यसे ब्रह्मके स्वरूपके विषयमें प्रश्न किया गया है । अथवा अथवा कारणं ब्रह्माहोस्चित्कालादि इस जगत्का कारण ब्रह्म है या 'कालः स्वभावः' आदि वाक्यसे आगे बताये 'कालः स्वभावः' इति वक्ष्यमाणम् । जानेवाले काल आदि । अथवा ब्रह्म
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५७
[संस्कृत-मूल]
अथवा किं कारणं ब्रह्म सिद्धिरूपम् उपादानभूतं किमित्यर्थः । अथवा बृहति बृंहयति तस्मादुच्यते परं ब्रह्मेति श्रुत्यैव निर्वचनान्निमित्तो- पादानयोरुभयोर्वा प्रश्नः किं कारणं ब्रह्मेति । किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कालादि ? अथवा कारणमेव ? कारणत्वेऽपि किं निमित्तमुतोपादानम् ? अथवा- भयम् ? तद्वा किंलक्षणमिति वक्ष्यमाणपरिहारानुरूपेण तन्त्रे- णावृत्त्या वा प्रश्नेऽपि संग्रहः कर्तव्यः; प्रश्नापेक्षत्वात्परि- हारस्य । कुतः स्म जाताः कुतो वयं कार्यकरणवन्तो जाताः ? स्वरूपेण जीवानामुत्पत्त्याद्यसंभवात् । तथा च श्रुतिः—"न जायते म्रियते वा विपश्चिद्" (क० उ० १।२।
[हिन्दी-अनुवाद]
[ यदि कारण है तो वह उपादान आदि कारणोंमेंसे] कौन-सा कारण है ? यानी स्वतःसिद्ध ब्रह्म क्या जगत्का उपादान कारण है ? अथवा “बढ़ा हुआ है तथा बढ़ाता है इसलिये परब्रह्म कहा जाता है” इस प्रकार श्रुतिद्वारा ही ब्रह्मशब्दकी व्युत्पत्ति की जानेके कारण उसके निमित्त और उपादान दोनों ही प्रकारके कारण होनेके विषयमें ‘ब्रह्म कौन कारण है’ ऐसा यह प्रश्न है । [ तात्पर्य यह है कि ] क्या जगत्का कारण ब्रह्म है अथवा कालादि ? या ब्रह्म कारण ही नहीं है ? यदि कारण है भी तो निमित्त कारण है या उपादान अथवा दोनों ? और उसका लक्षण क्या है ? आगे इस प्रकार जो परिहार कहा गया है उसके अनुसार उन सब विषयोंका एक साथ अथवा अलग-अलग प्रश्नमें भी संग्रह कर लेना चाहिये, क्योंकि परिहार तो प्रश्नकी अपेक्षा करके ही होता है । हम कहाँसे उत्पन्न हुए हैं—देह और इन्द्रियसम्पन्न हम लोगोंकी किससे उत्पत्ति हुई है ? क्योंकि स्वरूपसे तो जीवोंके जन्मादि होने सम्भव हैं नहीं । ऐसी ही ये श्रुतियाँ भी हैं—“यह मेधावी आत्मा न उत्पन्न होता है, न मरता है”,
५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
५८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
१८) “जीवापेतं वाव किलेदं | “जीवसे रहित होकर यह शरीर ही म्रियते न जीवो म्रियत इति” | मरता है जीव नहीं मरता”, “जरा- (छा० उ० ६ । ११ । ३) । | मृत्यु ये शरीरके धर्म हैं”, “हे “जरामृत्यू शरीरस्य” । “अवि- | मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी और नाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्ति- | अनुच्छित्तिधर्मा ( कभी उच्छिन्न न धर्मा”(बृ०उ० ४।५।१४) इति। | होनेवाला ) है ।” ऐसा ही स्मृति तथा च स्मृतिः— “अजः शरीर- | भी कहती है— “वह अजन्मा ग्रहणात्स जात इतिकीर्त्यते” इति। | शरीरग्रहण करनेसे 'जन्म लेता है' किं च, जीवाम केन—केन वा | ऐसा कहा जाता है ।” | इसके सिवा [ एक प्रश्न यह वयं सृष्टाः सन्तो जीवामेति | है—] हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं? | अर्थात् उत्पन्न होनेपर हम किसके स्थितिविषयः प्रश्नः । क्व च | द्वारा जीवन धारण करते हैं ? इस | प्रकार यह स्थितिविषयक प्रश्न है । संप्रतिष्ठाः प्रलयकाले स्थिताः ? | तथा कहाँ प्रतिष्ठित होते हैं—प्रलय- | कालमें किसमें स्थित रहते हैं ? और अधिष्ठिता नियमिताः केन सुखे- | हे ब्रह्मविद्गण ! किसके द्वारा अधिष्ठित | अर्थात् प्रेरित होकर सुखासुख यानी तरेषु सुखदुःखेषु वर्तामहे ब्रह्म- | सुख-दुःखमें व्यवस्था (संसार-यात्रा ) विदो व्यवस्थां हे ब्रह्मविदः | को वर्तते हैं ? अर्थात् हे ब्रह्मवेत्ताओ ! | हम किसके द्वारा प्रेरित होकर सुख- सुखदुःखेषु व्यवस्थां केना- | दुःखमें व्यवस्था ( लोक-यात्रा ) का धिष्ठिताः सन्तोऽनुवर्तामह इति | अनुवर्तन करते हैं ? इस प्रकार | किम् इत्यादि प्रश्नसमूह जगत्की सृष्टिस्थितिम्रलयनियमहेतुः कि- | उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और नियमके मिति प्रश्नसंग्रहः ॥ १ ॥ | हेतुके विषयमें है ॥१॥
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५९ काल, स्वभाव आदिकी जगत्-कारणताका खण्डन इदानीं कालादीनि ब्रह्मकारण- | अब श्रुति ब्रह्मकारणवादके विरोधी वादप्रतिपक्षभूतानि विचारविषय- | कालादिको विचारके विषयरूपसे त्वेन दर्शयति— | प्रदर्शित करती है— कालः स्वभावो नियतिर्यदृच्छा भूतानि योनिः पुरुष इति चिन्त्या । संयोग एषां न त्वात्मभावा- दात्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ॥ २ ॥ काल, स्वभाव, नियति, यदृच्छा, भूत और पुरुष—ये कारण हैं [ या नहीं ] इसपर विचारना चाहिये । इनका संयोग भी [ अपने शेषी ] आत्माके अधीन होनेके कारण कारण नहीं हो सकता तथा जीवात्मा भी सुख-दुःखके हेतु [ पुण्यापुण्य कर्मों ] के अधीन है । [ इसलिये वह भी कारण नहीं हो सकता ] ॥ २ ॥ कालः स्वभाव इति । योनि- | ‘कालः स्वभावः'इत्यादि। इन सबके शब्दः संबध्यते । कालो योनिः | साथ 'योनिः' शब्दका सम्बन्ध है। क्या कारणं स्यात् ? कालो नाम सर्व- | काल योनि—कारण हो सकता है ? भूतानां विपरिणामहेतुः। स्वभावः, | सम्पूर्ण भूतोंकी रूपान्तर-प्राप्तिमें जो स्वभावो नाम पदार्थानां प्रति- | हेतु हैं उसको काल कहते हैं । इसी नियता शक्तिः; अग्नेरौष्ण्यमिव । | प्रकार क्या स्वभाव कारण है ? पदार्थों- नियतिरविषमपुण्यपापलक्षणं कर्म | की नियत शक्तिका नाम स्वभाव है, तद्वा कारणम् ? यदृच्छाकास्मिकी | जैसे अग्निका स्वभाव उष्णता । | अथवा क्या नियति कारण है ? पुण्य- | पापरूप जो अविषम कर्म हैं वे | ‘नियति' कहे जाते हैं ? या यदृच्छा— १. जिनका फल कभी विपरीत नहीं होता ।
६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
[संस्कृत-टीका] प्राप्तिः । भूतान्याकाशादीनि वा योनिः ? पुरुषो वा विज्ञानात्मा योनिः ? इतीत्थमुक्तप्रकारेण किं योनिरिति चिन्त्या चिन्त्यं निरूपणीयम् । केचिद्योनिशब्दं प्रकृतिं वर्णयन्ति । तस्मिन्यक्षे किं कारणं ब्रह्मेति पूर्वोक्तं कारण- पदमत्राप्यनुसंधेयम् । तत्र कालादीनामकारणत्वं (पार्श्व-टिप्पणी: कालादीनाम् अकारणत्वोपपादनम्) दर्शयति—संयोग एषामित्यादिना । अयमर्थः—किं काला- दीनि प्रत्येकं कारणमुत तेषां समूहः । न च प्रत्येकं कालादीनां कारणत्वं संभवति, दृष्टविरुद्ध- त्वात् । देशकालनिमित्तानां संह- तानामेव लोके कार्यकरत्वदर्श- नात् । न चाप्येषां कालादीनां संयोगः समूहः कारणम्, समूहस्य संहतेः परार्थत्वेन शेषत्वेन शेषिण आत्मनो विद्य-
[हिन्दी-अनुवाद] आकस्मिक घटना अथवा आकाशादि भूत कारण हैं ? या पुरुष यानी विज्ञानात्मा जगत्का कारण है ? इस प्रकार उपर्युक्त रीतिसे यह विचारना यानी बतलाना चाहिये कि इसमें कौन कारण है ? कोई 'योनिः' शब्दका अर्थ प्रकृति बतलाते हैं ? उस अवस्था में पूर्व मन्त्रमें 'किं कारणं ब्रह्म' इस प्रश्नमें आये हुए कारण- पदकी यहाँ भी अनुवृत्ति कर लेनी चाहिये । इसपर श्रुति 'संयोग एषाम्' इत्यादि वाक्यसे यह प्रदर्शित करती है कि काल आदि कारण नहीं है । इसका अभिप्राय यों समझना चाहिये—क्या काल, स्वभाव आदिमेंसे प्रत्येक ही कारण है अथवा उन सबका समूह ? कालादिमेंसे प्रत्येक तो कारण हो नहीं सकता, क्योंकि ऐसा मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध है । लोकमें देश-कालादि निमित्तोंको परस्पर मिलकर ही कार्य करते देखा गया है । और इन कालादिका संयोग यानी समूह भी कारण नहीं हो सकता है; क्योंकि समूह यानी संहति परार्थ अर्थात् शेष है और उसका शेषी आत्मा विद्यमान है, अतः स्वतन्त्र न
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
[अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६१
मानत्वादस्वातन्त्र्यात्सृष्टिस्थिति- | होनेके कारण वह सृष्टि, स्थिति, प्रलयनियमलक्षणकार्यकरणत्वा- | प्रलय और प्रेरणारूप कार्य करनेमें योगात् । | समर्थ नहीं है । आत्मा तर्हि कारणं स्यादे- | तब तो आत्मा कारण हो ही [आत्मनः सृष्टिकारणत्व-निरासः] वात आह—आत्मा- | सकता है, इसपर कहते हैं— प्यनीशः सुखदुःख- | 'आत्माप्यनीशः सुखदुःखहेतोः ।' हेतोरिति । आत्मा | अर्थात् आत्मा यानी जीव भी अनीश— जीवोऽप्यनीशोऽस्वतन्त्रो न कार- | अस्वतन्त्र है—वह भी सृष्टि आदिका णम्, अस्वातन्त्र्यादेव चात्मनो- | कारण नहीं है । तात्पर्य यह है ऽपि सृष्ट्यादिहेतुत्वं न संभव- | कि अस्वतन्त्रताके ही कारण आत्माका तीत्यर्थः । कथमनीशत्वम् ? सुख- | भी सृष्टि आदिमें हेतु होना सम्भव दुःखहेतोः सुखदुःखहेतुभूतस्य | नहीं है । इसकी अस्वतन्त्रता कैसे है ! पुण्यापुण्यलक्षणस्य कर्मणो विद्य- | [ सो बताते हैं-] सुखदुःखहेतोः- मानत्वात्कर्मपरवशतवेनास्वात- | सुख-दुःखके हेतुभूत पुण्यापुण्यरूप न्त्र्याच्च । त्रैलोक्यसृष्टिस्थितिनियमे | कर्म विद्यमान हैं, अतः उन कर्मोंके सामर्थ्यं न विद्यत एवेत्यर्थः । | अधीन होनेसे इसकी अस्वतन्त्रता है । अथवा सुखदुःखादिहेतुभूतस्या- | इसीसे त्रिलोकीकी सृष्टि, स्थिति और ध्यात्मिकादिभेदभिन्नस्य जगतो- | नियमनमें इसका सामर्थ्य नहीं ही ऽनीशो न कारणम् ॥ २ ॥ | है—यही इसका अभिप्राय है। अथवा | [ यों समझना चाहिये कि ] आत्मा | सुख-दुःखादिके हेतुभूत आध्यात्मि- | कादि भेदोंवाले जगत्का ईश— | कारण नहीं है* ॥ २ ॥
* क्योंकि जो आध्यात्मिकादि भेदोंवाला जगत् आत्माके बन्धन और दुःखका कारण है उसकी वह स्वतन्त्रतासे स्वयं ही क्यों रचना करेगा ?
६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १
६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १ ध्यानके द्वारा ऋषियोंको कारणभूता ब्रह्मशक्तिका साक्षात्कार एवं पक्षान्तराणि निराकृत्य | इस प्रकार अन्य सब पक्षोंका निराकरण कर अब श्रुति यह बतलाती प्रमाणान्तरागोचरे वस्तुनि प्रका- | है कि उन ब्रह्मवेत्ताओंने प्रमाणान्तरसे ज्ञात न होनेवाले उस मूलतत्त्वके रान्तरमपश्यन्तो ध्यानयोगानु- | विषयमें अन्य किसी उपायकी गति न देखकर ध्यानयोगके अनुशीलन- गमेन परममूलकारणं स्वयमेव | द्वारा उस परममूलकारणको स्वयं ही प्रतिपेदिर इत्याह— | अनुभव कर लिया— ते ध्यानयोगानुगता अपश्य- न्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् । यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥ ३ ॥ उन्होंने ध्यानयोगका अनुवर्तन कर अपने गुणोंसे आच्छादित परमात्माकी शक्तिका साक्षात्कार किया; जो (परमात्मा) कि अकेले ही कालसे लेकर आत्मापर्यन्त समस्त कारणोंके अधिष्ठान हैं ॥ ३ ॥ ते ध्यानयोगेति । ध्यानं नाम | ‘ते ध्यानयोगानुगताः’ इत्यादि ध्यान चित्तकी एकाग्रताको कहते चित्तैकाग्र्यं तदेव योगो युज्यते- | हैं; वही योग है—जिसके द्वारा चित्तको युक्त किया जाय इस ऽनेनेति ध्यातव्यस्वीकारोपायः, | व्युत्पत्तिके अनुसार ध्येय वस्तुके ग्रहणका उपाय ही योग है । उसका तमनुगताः समाहिता अपश्यन् | अनुगमन कर अर्थात् समाहित हो उन्होंने देवात्मशक्तिका दर्शन— दृष्टवन्तो देवात्मशक्तिमिति । | साक्षात्कार किया ।
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६३
[संस्कृत]
पूर्वोक्तमेव प्रश्नसमुदायपरि- हाराणां सूत्रमुत्तरत्र प्रत्येकं प्रप- ञ्चयिष्यते। तत्रायं प्रश्नसंग्रहः-किं ब्रह्म कारणम् ? आहोस्वित्कालादि? तथा किं कारणं ब्रह्माहोस्वित्कार्य- कारणविलक्षणम् ? अथवा कारणं वाऽकारणं वा ? कारणत्वेऽपि किमुपादानमुत निमित्तम् ? अथ- वोभयकारणं ब्रह्म किंलक्षणम् ? अकारणं वा ब्रह्म किंलक्षणम् ? इति। तत्रायं परिहारः—न कारणं नाप्यकारणं न चोभयं नाप्यनु- भयं न च निमित्तं न चोपादानं न चोभयम् । एतदुक्तं भवति— अद्वितीयस्य परमात्मनो न स्वतः कारणत्वमुपादानत्वं निमित्तत्वं च। यदुपाधिकमस्य कारणत्वादि तदेव कारणं निमित्तमुपपाद्य तदेव प्रयोजकं निष्कृष्य दर्श-
[हिन्दी भाष्यार्थ]
प्रश्नसमुदाय और उसके समा- धानोंका जो सूत्र पहले कहा जा चुका है उसीको अब आगे प्रत्येकका विस्तार करके कहा जायगा । इनमें प्रश्नसमुदाय तो इस प्रकार है— क्या ब्रह्म जगत्का कारण है अथवा कालादि? तथा ब्रह्म कारण है या कार्य- कारणसे अतीत ? अथवा ब्रह्म कारण है या नहीं ? यदि कारण है भी तो उपादान कारण है या निमित्त कारण ? अथवा दोनों प्रकारका कारण होनेपर भी ब्रह्मका लक्षण क्या है ? और यदि वह कारण नहीं है तो भी उसका क्या लक्षण है ? इस प्रश्नसमुदायका यह उत्तर है—ब्रह्म न कारण है, न अकारण है, न कारणाकारण उभयरूप है, न इन दोनोंसे भिन्न है, न निमित्त कारण है, न उपादान कारण है और न दोनों प्रकारका कारण है। यहाँ कहना यह है कि अद्वितीय परमात्मा- का कारणत्व, उपादानत्व अथवा निमित्तत्व स्वतः कुछ भी नहीं है। जिस उपाधिके कारण इसका कारणत्वादि है उसी कारण यानी निमित्तका उपपादन कर और उसीको प्रयोजक निश्चित करके