भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 59

अध्याय १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४५


भवितुमर्हति । यथैकस्य | प्रपञ्च मिथ्या होना ही चाहिये । जिस चन्द्रमसस्तद्विपरीतद्वितीयाकार- | प्रकार एक चन्द्रमाका दूसरा आकार स्तद्वत् । | मिथ्या होता है उसी प्रकार इसे | समझना चाहिये । तथा च सूत्रकारो “न स्थान- | इसी प्रकार सूत्रकार भगवान् (पार्श्व टिप्पणी: सूत्रक्रमतोपन्यास-) तोऽपि परस्योभय- | व्यासने भी “न स्थानतोऽपि परस्यो- (पार्श्व टिप्पणी: पूर्वकं ब्रह्मणो) लिङ्गं सर्वत्र हि” | भयलिङ्गं सर्वत्र हि” इस सूत्रद्वारा स्व- (पार्श्व टिप्पणी: निर्विशेषत्व-) ( ब्र० सू० ३ । | रूपसे और उपाधिसे भी ब्रह्मके[सविशेष (पार्श्व टिप्पणी: समर्थनम्) २ । ११ ) | और निर्विशेष ] दो परस्पर-विरुद्ध रूप इति स्वरूपत उपाधितश्च विरुद्ध- | सम्भव न होनेके कारण ब्रह्म निर्विशेष रूपद्वयासम्भवान्निर्विशेषमेव ब्रह्मे- | ही है ऐसा उपपादन कर [ फिर “न | भेदादिति चेन्न प्रत्येकमद्वचनात्” त्युपपाद्य “न भेदात्”... ( ब्र० | इस सूत्रके ] ‘न भेदात्’ इस सू० ३ । २ । १२) इति भेद- | अंशद्वारा ऐसी आशंका कर कि ‘क्या | भेदश्रुतिके सामर्थ्यसे ब्रह्मको सविशेष श्रुतिबलात्किमिति सविशेषमपि | भी नहीं माना जा सकता’ “नै ब्रह्म नाभ्युपगम्यत इत्याशङ्क्य “न | प्रत्येकमद्वचनात्” इस अंशसे यह प्रत्येकमद्वचनात्” इत्युपाधि- | निश्चय किया है कि उपाधिजनित | भेद श्रुतिसे ही बाधित होनेके कारण भेदस्य श्रुत्यैव बाधितत्वादभेद- | अभेदश्रुतिके सामर्थ्यसे सविशेष श्रुतिबलात्सविशेषस्य ग्रहणायो- | ब्रह्मका ग्रहण नहीं किया जा सकता, गान्निर्विशेषमेवेत्युपपाद्य “अपि | इसलिये वह निर्विशेष ही है । इसके


१. परब्रह्म उपाधिसे भी [ सविशेष-निर्विशेष ] उभयरूप नहीं हो सकता, क्योंकि सर्वत्र उसका निर्विशेषरूपसे ही वर्णन किया गया है । २. [ यदि कहो ] ऐसा नहीं है, क्योंकि [ ‘चतुष्पाद् ब्रह्म’ ‘षोडशकलं ब्रह्म’ इत्यादि रूपसे ] प्रत्येक विद्यामें उसका भेदरूपसे वर्णन किया है । ३. तो ऐसा नहीं है, क्योंकि प्रत्येक औपाधिक भेदमें [ ‘अयमेव स योऽयमात्मा’ इत्यादि श्रुतिके द्वारा ] उसका अभेद ही बतलाया गया है ।