भारतकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

४३ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय १

तस्मादज्ञानमूलो हि | समस्त प्राणियोंको अज्ञानके कारण संसारः सर्वदेहिनाम् ॥ | ही संसारकी प्राप्ति हुई है । आत्मा नित्यः सर्वगतो ह्यात्मा | तो नित्य, सर्वगत, कूटस्थ और कूटस्थो दोषवर्जितः । | निर्दोष है । वह एक अपनी एकः स भिद्यते शक्त्या | मायाशक्तिके द्वारा ही भेदको प्राप्त मायया न स्वभावतः ॥ | होता है, स्वरूपतः नहीं । अतः तस्मादद्वैतमेवाहु- | मुनियोंने परमार्थतः अद्वैत ही बतलाया र्मुनयः परमार्थतः । | है; विद्वानोंने इस जगत्‌को ज्ञानस्वरूप ज्ञानस्वरूपमेवाहु- | ही कहा है । जिनकी दृष्टि दूषित है र्जगदेतद्विचक्षणाः ॥ | वे अन्यलोग ही अज्ञानवश इसे अर्थस्वरूपमज्ञाना- | परमार्थस्वरूप समझते हैं । चैतन्य त्पश्यन्त्यन्ये कुदृष्टयः । | आत्मा तो स्वभावतः कूटस्थ, निर्गुण कूटस्थो निर्गुणो व्यापी | और सर्वव्यापक है । भ्रान्तिदर्शी चैतन्यात्मा स्वभावतः ॥ | लोगोंको ही वह पदार्थाकार प्रतीत दृश्यते ह्यर्थरूपेण | होता है । जिस समय पुरुष आत्माका पुरुषैर्भ्रान्तदर्शिभिः । | परमार्थरूपसे साक्षात्कार करता है यदा पश्यति चात्मानं | और इस द्वैतप्रपञ्चको मायामात्र केवलं परमार्थतः ॥ | समझता है उसी समय उसे शान्ति मायामात्रमिदं द्वैतं | प्राप्त होती है । अतः केवल विज्ञान तदा भवति निर्वृतः । | ही है, प्रपञ्च या संसार नहीं है ।” तस्माद्विज्ञानमेवास्ति न प्रपञ्चो न संसृतिः ॥” एवं श्रुत्यादिना नामादिकारणो- | इस प्रकार श्रुति आदिके द्वारा [प्रपञ्चस्य] पन्यासमुखेन स्व- | नामादिके कारणोंका दिग्दर्शन कराने- [मिथ्यात्वम्] रूपेण च बाधित- | से तथा स्वरूपतः बाधित होनेके त्वात्प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वमवगम्यते । | कारण प्रपञ्चका मिथ्यात्व जाना जाता अस्थूलादिलक्षणस्य ब्रह्मण- | है। ब्रह्म अस्थूलादि लक्षणोंवाला है, स्तद्विपरीतस्थूलाकारो मिथ्या | अतः उससे विपरीत स्थूलाकार